बिना बुलावे अमेरिका गए मोदी? ट्रंप के बयान पर कांग्रेस का बड़ा आरोप
तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना,7 जनवरी — कांग्रेस पार्टी के आधिकारिक X (पूर्व में ट्विटर) हैंडल @INCIndia से किए गए एक पोस्ट ने भारतीय राजनीति में एक बार फिर विदेश नीति और प्रधानमंत्री की अंतरराष्ट्रीय छवि को लेकर बहस तेज कर दिया है. पोस्ट में दावा किया गया है कि डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बिना औपचारिक निमंत्रण के अमेरिका गये थे और स्वयं ट्रंप से मिलने की अनुमति मांगी थी. कांग्रेस ने यह भी याद दिलाया कि कथित तौर पर ट्रंप ने दुनिया के अन्य नेताओं की तरह प्रधानमंत्री मोदी को एयरपोर्ट पर रिसीव नहीं किया था. यह मुद्दा केवल एक राजनीतिक आरोप नहीं, बल्कि भारत की कूटनीतिक प्रतिष्ठा, आत्मसम्मान और वैश्विक छवि से जुड़ा गंभीर सवाल बन गया है.
कांग्रेस का दावा क्या कहता है?
कांग्रेस के X पोस्ट के अनुसार, ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से यह कहा कि,
प्रधानमंत्री मोदी ने उनसे पूछा कि क्या वे उनसे मिलने आ सकते हैं.
ट्रंप ने हां कहकर अनुमति दी.
कांग्रेस का आरोप है कि यह घटनाक्रम भारत जैसे बड़े लोकतांत्रिक देश के प्रधानमंत्री की गरिमा के अनुरूप नहीं था.पार्टी का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में मुलाकातें बराबरी और सम्मान के आधार पर होती हैं, न कि व्यक्तिगत आग्रह पर.
एयरपोर्ट रिसेप्शन का मुद्दा क्यों अहम है?
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में प्रतीकों (symbols) का बहुत बड़ा महत्व होता है. किसी राष्ट्राध्यक्ष का एयरपोर्ट पर स्वागत कौन करता है, यह केवल औपचारिकता नहीं बल्कि रिश्तों की गंभीरता और सम्मान का संकेत माना जाता है. कांग्रेस का कहना है कि,
दुनिया के कई नेताओं को ट्रंप ने औपचारिक सम्मान दिया.
लेकिन प्रधानमंत्री मोदी को एयरपोर्ट पर रिसीव करने खुद ट्रंप नहीं आये.
कांग्रेस इसे भारत की कूटनीतिक हैसियत को कमतर दिखाने वाला उदाहरण बता रही है. पार्टी का तर्क है कि प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं को व्यक्तिगत प्रचार की बजाय राष्ट्रीय सम्मान से जोड़ा जाना चाहिये.
विदेश नीति बनाम इमेज पॉलिटिक्स
कांग्रेस ने इस मुद्दे को केवल एक मुलाकात तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे सरकार की समग्र विदेश नीति से जोड़ा है. पार्टी का आरोप है कि मौजूदा सरकार की विदेश नीति अक्सर इमेज पॉलिटिक्स पर केंद्रित रहता है, जहां फोटो-ऑप और व्यक्तिगत संबंधों को वास्तविक कूटनीतिक लाभ से ऊपर रखा जाता है. कांग्रेस का कहना है कि,
मजबूत विदेश नीति का मतलब केवल नेताओं की दोस्ती नहीं होता, इसका उद्देश्य व्यापार, सुरक्षा, तकनीक और रणनीतिक साझेदारी में ठोस लाभ हासिल करना होता है.
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भाजपा और सरकार की संभावित प्रतिक्रिया
भाजपा और सरकार की ओर से अक्सर ऐसे आरोपों को राजनीतिक दुर्भावना करार दिया जाता है.सरकार यह तर्क देती रही है कि,
भारत और अमेरिका के संबंध पहले से अधिक मजबूत हुआ हैं.
रक्षा, व्यापार और रणनीतिक सहयोग में अभूतपूर्व प्रगति हुआ है .
हालांकि, कांग्रेस का कहना है कि अगर रिश्ते इतने ही मजबूत हैं, तो प्रधानमंत्री को लेकर ऐसे बयान और घटनाएं क्यों सामने आती हैं जो भारत की गरिमा पर सवाल खड़ा करती हैं.
जनता के बीच उठते सवाल
कांग्रेस के इस पोस्ट के बाद सोशल मीडिया पर कई सवाल चर्चा में हैं,
क्या प्रधानमंत्री की विदेश यात्राएं वास्तव में राष्ट्रीय हित में होती हैं?
क्या भारत की विदेश नीति व्यक्ति-आधारित हो गई है?
क्या अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत को वह सम्मान मिल रहा है, जिसका दावा सरकार करती है?
ये सवाल केवल विपक्ष के नहीं, बल्कि आम नागरिकों के भी हैं जो देश की वैश्विक छवि को लेकर चिंतित रहते हैं.
निष्कर्ष: राजनीति से परे राष्ट्रीय सम्मान का मुद्दा
ट्रंप–मोदी मुलाकात को लेकर कांग्रेस का हमला एक बार फिर यह याद दिलाता है कि विदेश नीति केवल सत्ता और विपक्ष की राजनीति का विषय नहीं है. यह सीधे तौर पर देश की प्रतिष्ठा, आत्मसम्मान और वैश्विक भूमिका से जुड़ा हुआ है.
चाहे कांग्रेस का दावा सही हो या सरकार का पक्ष मजबूत हो, लेकिन यह बहस जरूरी है कि भारत जैसे बड़े देश की कूटनीति व्यक्तिगत छवि या कथित मित्रता पर नहीं, बल्कि संस्थागत सम्मान और राष्ट्रीय हित पर आधारित होनी चाहिए.
आखिरकार, सवाल यही है कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत को एक आत्मनिर्भर, आत्मसम्मान से भरा और बराबरी का भागीदार बनाकर पेश किया जा रहा है या नहीं। यही सवाल इस पूरी बहस का केंद्र है, और यही सवाल आने वाले समय में भी भारतीय राजनीति और जनता के बीच गूंजता रहेगा.

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