सामाजिक चुप्पी को अपराध बताकर योगिता भयाना ने क्यों समाज को झकझोरा.
तीसरा पक्ष ब्यूरो दिल्ली,26 दिसंबर — उन्नाव रेप केस भारतीय न्याय व्यवस्था के उन मामलों में से एक है, जिसने देश की अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया था. यह मामला केवल एक पीड़िता की न्याय-यात्रा नहीं है, बल्कि सत्ता, सिस्टम और संवेदनहीनता के गठजोड़ का प्रतीक बन चुका है.
26 दिसंबर 2025 को सामाजिक कार्यकर्ता और एंटी-रेप एक्टिविस्ट योगिता भयाना ने दिल्ली हाईकोर्ट के बाहर उन्नाव रेप पीड़िता के न्याय के लिए विरोध प्रदर्शन किया. उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि, चुप रहना अपराध है.
उनकी यह आवाज़ केवल एक नारा नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर सीधा सवाल है, जो वर्षों से पीड़िताओं को न्याय देने में विफल रहा है.

उन्नाव रेप केस की पृष्ठभूमि: सत्ता बनाम न्याय
उन्नाव रेप केस की शुरुआत वर्ष 2017 में उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले से हुई थी.एक नाबालिग लड़की ने तत्कालीन भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर पर बलात्कार का आरोप लगाया. पीड़िता का कहना था कि उसे नौकरी का झांसा देकर शोषण किया गया और बाद में उसके पूरे परिवार को डराया-धमकाया गया.
यह मामला तब और भयावह हो गया जब पीड़िता के पिता की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई, और 2019 में एक सड़क हादसे में पीड़िता की चाची और मौसी की जान चली गई. पीड़िता खुद गंभीर रूप से घायल हुई. इन घटनाओं ने देशभर में आक्रोश पैदा किया.
सीबीआई जांच के बाद 2019 में दिल्ली की एक अदालत ने कुलदीप सेंगर को उम्रकैद की सजा सुनाई थी.यह फैसला न्याय की एक किरण माना गया.
लेकिन दिसंबर 2025 में जब दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा सजा निलंबन का आदेश सामने आया, तो पीड़िता और समाज दोनों में गहरा आक्रोश फैल गया है.
जांच एजेंसियों पर उठते सवाल
इस केस में सीबीआई की भूमिका लगातार सवालों के घेरे में रहा है.आरोप है कि जांच के दौरान कई महत्वपूर्ण तथ्यों और सबूतों को गंभीरता से पेश नहीं किया गया.पीड़िता के परिवार पर हुए हमलों, धमकियों और सड़क हादसे की जांच में भी लापरवाही के आरोप लगा हैं.
पीड़िता की मां ने खुले तौर पर सवाल किया है कि,
अगर आज सीबीआई फैसले को चुनौती दे रही है, तो पहले उसने पूरी मजबूती से केस क्यों नहीं लड़ा?
यह सवाल केवल एक परिवार का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम पर सवाल है.
योगिता भयाना: चुप्पी के खिलाफ संघर्ष की आवाज़
योगिता भयाना भारत में लैंगिक हिंसा के खिलाफ संघर्ष की एक सशक्त पहचान हैं. वह PARI (People Against Rapes in India) की संस्थापक हैं और वर्षों से रेप पीड़िताओं को कानूनी, सामाजिक और भावनात्मक सहयोग दे रही हैं.
टेडएक्स स्पीकर, पॉश एक्सपर्ट और जानी-मानी सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में योगिता भयाना ने सोशल मीडिया को एक आंदोलन का माध्यम बनाया है.
उन्नाव केस में उन्होंने पीड़िता के परिवार के साथ खड़े होकर यह स्पष्ट किया कि न्याय की लड़ाई सड़क से अदालत तक लड़ी जाएगी.
23 दिसंबर 2025 को इंडिया गेट पर धरना और फिर 26 दिसंबर को दिल्ली हाईकोर्ट के बाहर विरोध,यह दिखाता है कि यह संघर्ष अभी थमा नहीं है.
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चुप रहना अपराध है: समाज के नाम संदेश
योगिता भयाना का यह वाक्य आज के भारत की सबसे बड़ी सच्चाई को उजागर करता है.
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के अनुसार, 2024 में देश में 30,000 से अधिक रेप केस दर्ज हुए, लेकिन दोषसिद्धि दर बेहद कम रही है.
डर, सामाजिक दबाव, राजनीतिक प्रभाव और लंबी न्याय प्रक्रिया के कारण अधिकतर पीड़िताएं चुप रह जाती हैं. यही चुप्पी अपराधियों को ताकत देती है.
सोशल मीडिया पर #JusticeForUnnaoVictim जैसे हैशटैग यह साबित करते हैं कि जनता अब सवाल पूछ रही है और चुप रहने को तैयार नहीं.
न्याय व्यवस्था में सुधार की ज़रूरत
उन्नाव रेप केस यह स्पष्ट करता है कि भारत की न्याय प्रणाली को गहन सुधार की आवश्यकता है.
राजनीतिक प्रभाव से मुक्त जांच
फास्ट-ट्रैक अदालतों की मजबूती
पीड़िता और गवाह सुरक्षा
जांच एजेंसियों की जवाबदेही
बिना इन सुधारों के, न्याय केवल कागज़ों तक सीमित रह जाएगा.
निष्कर्ष: न्याय की लड़ाई में साथ खड़े हों
उन्नाव रेप केस सिर्फ अतीत की घटना नहीं है, यह वर्तमान और भविष्य की चेतावनी है.
योगिता भयाना का विरोध प्रदर्शन हमें यह याद दिलाता है कि न्याय मांगना अपराध नहीं, बल्कि चुप रहना अपराध है.
अगर समाज, मीडिया और सिस्टम एक साथ खड़े हों, तभी पीड़िताओं को वास्तविक न्याय मिल सकता है.
एक सुरक्षित और संवेदनशील समाज ही सच्ची प्रगति की पहचान है.

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