वंदे मातरम्, तिरंगे और स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास पर AAP नेता ने उठाए सवाल
तीसरा पक्ष ब्यूरो नई दिल्लीः आम आदमी पार्टी (AAP) के राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी (BJP) पर निशाना साधते हुए राष्ट्रवाद, वंदे मातरम्, तिरंगे और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के इतिहास से जुड़े कई सवाल उठाया हैं. अपने X पोस्ट में सिंह ने चुनौती दी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बिना टेलीप्रॉम्प्टर के पूरा वंदे मातरम् गाकर दिखाएं तो वह उनका अभिनंदन करेंगे. इसके साथ ही उन्होंने BJP से उसके ,चार पुरखों के नाम बताने को कहा, जो वंदे मातरम् का नारा लगाकर जेल गए हों.
संजय सिंह का पोस्ट केवल राजनीतिक तंज तक सीमित नहीं रहा.उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान श्यामा प्रसाद मुखर्जी की भूमिका, हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग के बीच राजनीतिक सहयोग, भाजपा के वरिष्ठ नेताओं लालकृष्ण आडवाणी और जसवंत सिंह द्वारा मोहम्मद अली जिन्ना के बारे में दिए गए बयानों तथा RSS के तिरंगे से जुड़े इतिहास पर भी सवाल उठाए हैं.
इन सवालों को समझने के लिए राजनीतिक आरोप और ऐतिहासिक तथ्यों के बीच अंतर करना जरूरी है.
श्यामा प्रसाद मुखर्जी और भारत छोड़ो आंदोलन का सवाल
संजय सिंह ने पूछा कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान बंगाल के गवर्नर को पत्र क्यों लिखा था.
इतिहास में इसका दस्तावेजी आधार मौजूद है. 26 जुलाई 1942 को बंगाल सरकार में मंत्री रहे श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने तत्कालीन गवर्नर सर जॉन हर्बर्ट को पत्र लिखा था.उपलब्ध ऐतिहासिक रिकॉर्ड के अनुसार पत्र में उन्होंने कांग्रेस द्वारा शुरू किए जाने वाले व्यापक आंदोलन से पैदा होने वाली स्थिति पर चर्चा की और सरकार से उसे नियंत्रित करने के उपायों पर विचार किया.
मुखर्जी उस समय ए.के. फजलुल हक के नेतृत्व वाली बंगाल की सरकार में वित्त मंत्री थे. उन्होंने 1942 में मंत्रालय से इस्तीफा भी दिया था.उनके समर्थक ऐतिहासिक विवरण में इस इस्तीफे को बंगाल के गवर्नर की दमनकारी नीतियों से जोड़ते हैं.
इसलिए इस पूरे प्रसंग को केवल एक राजनीतिक नारे में समेटने के बजाय यह देखना जरूरी है कि 1942 में मुखर्जी की राजनीतिक भूमिका क्या थी, उन्होंने ब्रिटिश प्रशासन को पत्र में क्या लिखा और बाद में उनकी राजनीतिक स्थिति किस तरह बदली.
मुस्लिम लीग के साथ हिंदू महासभा का राजनीतिक सहयोग
संजय सिंह ने यह भी सवाल उठाया कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी से जुड़ी हिंदू महासभा ने मुस्लिम लीग के साथ सरकारें क्यों बनाईं.
यहां भी इतिहास कुछ अधिक जटिल है. 1937 के प्रांतीय चुनावों के बाद राजनीतिक परिस्थितियां तेजी से बदलीं.1939 में कांग्रेस मंत्रिमंडलों के इस्तीफे के बाद विभिन्न प्रांतों में गैर-कांग्रेसी राजनीतिक गठजोड़ बनने लगे. इतिहासकारों के अनुसार हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग ने सिंध और उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत (NWFP) में गठबंधन सरकारों में साथ काम किया.
बंगाल की स्थिति इससे अलग थी.वहां श्यामा प्रसाद मुखर्जी ए.के. फजलुल हक की Progressive Coalition Ministry में मंत्री बने थे.यह सीधे तौर पर जिन्ना और मुखर्जी की संयुक्त सरकार कहना ऐतिहासिक रूप से अधूरा होगा.
हिंदू महासभा के तत्कालीन अध्यक्ष विनायक दामोदर सावरकर ने इन राजनीतिक सहयोगों को व्यावहारिक राजनीति और reasonable compromises के संदर्भ में उचित ठहराया था.
यानी संजय सिंह का सवाल जिस ऐतिहासिक घटना की ओर इशारा करता है, उसका आधार मौजूद है, लेकिन तीनों प्रांतों की राजनीतिक परिस्थितियां एक जैसी नहीं थीं.इसलिए इस मुद्दे पर तथ्य और राजनीतिक व्याख्या को अलग-अलग देखना जरूरी है.
आडवाणी और जसवंत सिंह ने जिन्ना की तारीफ क्यों की?
संजय सिंह ने BJP के वरिष्ठ नेताओं लालकृष्ण आडवाणी और जसवंत सिंह के जिन्ना संबंधी बयानों को भी सवाल के रूप में उठाया.
2005 में लालकृष्ण आडवाणी ने पाकिस्तान यात्रा के दौरान जिन्ना के 11 अगस्त 1947 के भाषण को धर्मनिरपेक्ष राज्य की मजबूत पैरवी बताया था.इस बयान के बाद BJP के भीतर बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा हुआ और आडवाणी को पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना पड़ा.
चार साल बाद 2009 में जसवंत सिंह ने अपनी पुस्तक Jinnah: India-Partition-Independence में जिन्ना के राजनीतिक व्यक्तित्व का अलग मूल्यांकन किया. उन्होंने जिन्ना को great man बताया और उनके बारे में भारत में बनी ऐतिहासिक धारणा पर सवाल उठाए. इसके बाद BJP ने जसवंत सिंह को पार्टी से निष्कासित कर दिया था.
इससे स्पष्ट है कि जिन्ना के मूल्यांकन को लेकर BJP के भीतर भी समय-समय पर मतभेद सामने आया हैं.
RSS और तिरंगे का इतिहास
संजय सिंह का सबसे महत्वपूर्ण सवाल RSS के मुख्यालय पर तिरंगा फहराने को लेकर है.
उपलब्ध ऐतिहासिक रिपोर्टों के मुताबिक नागपुर स्थित RSS मुख्यालय पर राष्ट्रीय ध्वज 15 अगस्त 1947 और 26 जनवरी 1950 को फहराया गया था. इसके बाद लंबे अंतराल के बाद 26 जनवरी 2002 को वहां फिर तिरंगा फहराया गया.उस समय की रिपोर्टों ने इसे लगभग 52 वर्षों के अंतराल के बाद हुआ ध्वजारोहण बताया था.
RSS की शाखाओं में परंपरागत रूप से भगवा ध्वज को संगठन के प्रतीक के रूप में महत्व दिया जाता रहा है, जबकि तिरंगा भारत का राष्ट्रीय ध्वज है. इस अंतर को लेकर लंबे समय से राजनीतिक बहस होती रही है.
हालांकि RSS की ओर से इस अवधि को समझाने के लिए यह तर्क भी दिया गया है कि उस समय निजी संस्थाओं द्वारा राष्ट्रीय ध्वज फहराने से संबंधित नियम अधिक प्रतिबंधात्मक थे. इस दावे और उसके ऐतिहासिक संदर्भ पर भी अलग-अलग व्याख्याएं मौजूद हैं.
इसलिए यह कहना अधिक तथ्यपरक होगा कि RSS मुख्यालय पर 1950 के बाद 2002 तक तिरंगा नियमित रूप से नहीं फहराया गया, जबकि RSS स्वयं इस इतिहास की अलग व्याख्या प्रस्तुत करता है.
ऑर्गेनाइजर और राष्ट्रगान पर सवाल
संजय सिंह ने 28 दिसंबर 1949 के Organiser के एक कथित लेख का हवाला देते हुए सवाल किया है कि उसमें राष्ट्रगान को अधिकारियों की पार्टी में Item of entertainment क्यों बताया गया.
यह आरोप महत्वपूर्ण है, लेकिन इस विशेष उद्धरण की पुष्टि के लिए मूल 28 दिसंबर 1949 के Organiser अंक को सामने रखकर संदर्भ सहित जांच करना आवश्यक है. किसी पुराने प्रकाशन से निकले एक वाक्य को प्रमाणित करने के लिए मूल अंक, पूरा लेख और उसके संदर्भ को देखना पत्रकारिता की दृष्टि से अधिक उचित होगा.
यही वह बिंदु है जहां राजनीतिक बयान को सीधे ऐतिहासिक तथ्य मान लेने के बजाय प्राथमिक स्रोतों की जांच जरूरी हो जाती है.
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राष्ट्रवाद की बहस आखिर किस दिशा में जा रही है?
संजय सिंह के सवालों का मूल राजनीतिक संदेश यह है कि राष्ट्रवाद का दावा करने वाले संगठनों और नेताओं के ऐतिहासिक रिकॉर्ड की भी सार्वजनिक जांच होनी चाहिए.
दूसरी तरफ BJP और RSS के समर्थक इन घटनाओं की अलग ऐतिहासिक व्याख्या करते हैं. उनके अनुसार स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान विभिन्न संगठनों की रणनीतियां उस समय की राजनीतिक और प्रशासनिक परिस्थितियों से प्रभावित थीं. इसी तरह RSS का तर्क रहा है कि भगवा ध्वज संगठन का सांस्कृतिक प्रतीक है और इसका अर्थ राष्ट्रीय ध्वज का विरोध करना नहीं है.
यहीं से वास्तविक लोकतांत्रिक बहस शुरू होती है.
वंदे मातरम् कौन गाता है, तिरंगा कौन फहराता है या कौन किस नेता की प्रशंसा करता है, इन सवालों से आगे बढ़कर बड़ा सवाल यह है कि स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास को आज की राजनीतिक जरूरतों के हिसाब से चुना जाएगा या दस्तावेजों और मूल स्रोतों के आधार पर समझा जाएगा?
संजय सिंह ने अपने X पोस्ट के जरिए यही पुराना लेकिन बेहद महत्वपूर्ण सवाल फिर सामने ला दिया है — राष्ट्रवाद की कसौटी आखिर क्या होनी चाहिए: नारे, प्रतीक और राजनीतिक दावे, या फिर इतिहास में दर्ज वास्तविक आचरण?
एक जिम्मेदार सार्वजनिक बहस के लिए जरूरी है कि इन सभी सवालों के जवाब राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि मूल दस्तावेजों, ऐतिहासिक शोध और प्रमाणित रिकॉर्ड से खोजे जाएं.
निष्कर्ष
संजय सिंह के X पोस्ट ने वंदे मातरम्, तिरंगे, RSS और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े पुराने ऐतिहासिक प्रसंगों को एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है.उनके सवालों में कई ऐसे मुद्दे हैं जिनका आधार ऐतिहासिक दस्तावेजों और सार्वजनिक रिकॉर्ड में मिलता है, लेकिन कुछ दावों को मूल स्रोतों के संदर्भ में जांचना भी जरूरी है. इसलिए इस बहस का निष्कर्ष केवल राजनीतिक आरोप या बचाव नहीं होना चाहिए। राष्ट्रवाद पर सबसे मजबूत जवाब नारों से नहीं, बल्कि इतिहास, दस्तावेजों और तथ्यात्मक रिकॉर्ड से मिलना चाहिए.
न्यूज़ स्रोत: संजय सिंह का X पोस्ट, Indian Express, India Today, Hindustan Times, Times of India और उपलब्ध ऐतिहासिक दस्तावेज के आधार पर आधारित विश्लेषण

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