बांग्लादेश में हिंदू, बौद्ध और ईसाई अल्पसंख्यकों पर बढ़ती बर्बरता: भारत सरकार की चुप्पी पर सवाल

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Ajit Kumar

भारत
बांग्लादेश में हिंदू, बौद्ध और ईसाई अल्पसंख्यकों पर बढ़ती बर्बरता: भारत सरकार की चुप्पी पर सवाल

प्रियंका गांधी का संसद में सवाल: पड़ोसी देश में अल्पसंख्यक असुरक्षित, भारत सरकार मौन क्यों?

तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना,23 — दिसंबर दक्षिण एशिया के राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य में बांग्लादेश एक महत्वपूर्ण देश है.भारत और बांग्लादेश के बीच ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और मानवीय रिश्ता रहा हैं. ऐसे में जब पड़ोसी देश बांग्लादेश में हिंदू, बौद्ध और ईसाई अल्पसंख्यकों के खिलाफ लगातार हिंसा, उत्पीड़न और बर्बरता की खबरें सामने आती हैं, तो यह केवल एक आंतरिक मुद्दा नहीं रह जाता, बल्कि क्षेत्रीय मानवाधिकार और अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारियों से भी जुड़ जाता है.

आज कांग्रेस पार्टी के आधिकारिक X (Twitter) हैंडल @INCIndia से किए गए पोस्ट में इस गंभीर मुद्दे को उठाया गया है.पोस्ट में कहा गया है कि बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचारों के बावजूद भारत सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पूरी तरह चुप हैं.

बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की स्थिति

बांग्लादेश में हिंदू, बौद्ध और ईसाई समुदाय लंबे समय से सामाजिक और राजनीतिक असुरक्षा का सामना कर रहा हैं. मंदिरों और चर्चों पर हमले, जबरन कब्ज़ा, धार्मिक पहचान के आधार पर हिंसा, महिलाओं के साथ अत्याचार और डर का माहौल,ये सभी घटनाएं समय-समय पर अंतरराष्ट्रीय मीडिया और मानवाधिकार संगठनों की रिपोर्टों में सामने आतीे रही हैं.

विशेषज्ञों का मानना है कि चुनावी माहौल, कट्टरपंथी तत्वों की सक्रियता और कमजोर प्रशासनिक कार्रवाई के कारण अल्पसंख्यक समुदाय सबसे अधिक निशाने पर रहता है .जब भी राजनीतिक अस्थिरता बढ़ती है, तब सबसे पहले धार्मिक अल्पसंख्यकों पर हमले तेज हो जाता हैं.

संसद में प्रियंका गांधी का हस्तक्षेप

16 दिसंबर 2024 को कांग्रेस महासचिव एवं सांसद श्रीमती प्रियंका गांधी वाड्रा ने संसद में इस मुद्दे को गंभीरता से उठाया था.उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के साथ हो रही हिंसा पर भारत सरकार को चुप नहीं रहना चाहिए.

प्रियंका गांधी ने यह भी रेखांकित किया कि भारत केवल अपने देश के अंदर ही नहीं, बल्कि पड़ोसी देशों में भी मानवाधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता के मुद्दों पर नैतिक जिम्मेदारी रखता है.संसद में उठाई गई यह आवाज़ उस समय खास इसलिए था , क्योंकि यह केवल राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना से जुड़ा सवाल था.

भारत सरकार और प्रधानमंत्री की चुप्पी

कांग्रेस के X पोस्ट में सबसे बड़ा सवाल यही उठाया गया है कि जब बांग्लादेश में हिंदू, बौद्ध और ईसाई अल्पसंख्यकों को उनके हाल पर छोड़ दिया गया है, तब भारत सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से कोई ठोस प्रतिक्रिया क्यों नहीं आई?

सरकार की विदेश नीति अक्सर “नेबरहुड फर्स्ट” की बात करती है, लेकिन जब पड़ोसी देश में अल्पसंख्यक समुदाय असुरक्षित महसूस कर रहे हों, तब यह नीति व्यवहार में कमजोर नजर आती है.आलोचकों का कहना है कि भारत सरकार को कूटनीतिक स्तर पर बांग्लादेश सरकार से बातचीत कर अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना चाहिए था.

कूटनीतिक जिम्मेदारी और अंतरराष्ट्रीय भूमिका

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और मानवाधिकारों की बात करने का नैतिक अधिकार भी रखता है. ऐसे में बांग्लादेश में धार्मिक अल्पसंख्यकों पर हो रही हिंसा पर चुप रहना भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि को भी प्रभावित करता है.

कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह मुद्दा केवल बयानबाज़ी तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि द्विपक्षीय वार्ता, अंतरराष्ट्रीय मंचों और मानवाधिकार परिषद जैसे संस्थानों के माध्यम से उठाया जाना चाहिए. इससे न केवल पीड़ित समुदायों को सुरक्षा का भरोसा मिलेगा, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता भी मजबूत होगी.

कांग्रेस का रुख और राजनीतिक संदेश

कांग्रेस पार्टी ने इस मुद्दे पर स्पष्ट और आक्रामक रुख अपनाया है। @INCIndia के पोस्ट के माध्यम से यह संदेश देने की कोशिश की गई है कि अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर राजनीति नहीं होनी चाहिए. चाहे वह भारत के अंदर का मामला हो या पड़ोसी देश का, मानवाधिकारों की रक्षा सर्वोपरि होनी चाहिए.

कांग्रेस का आरोप है कि मौजूदा सरकार चुनिंदा मुद्दों पर ही आवाज़ उठाती है और जब वास्तविक मानवीय संकट सामने आता है, तब रणनीतिक चुप्पी साध लेती है। यह चुप्पी न केवल नैतिक रूप से गलत है, बल्कि भारत की परंपरागत विदेश नीति के भी खिलाफ है.

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आम जनता और वैश्विक समुदाय की अपेक्षाएं

आज के डिजिटल दौर में जानकारी छुपी नहीं रहती है.बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हो रही हिंसा की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया के ज़रिए दुनिया भर में पहुंच रही हैं.ऐसे में भारत जैसे बड़े देश से यह उम्मीद की जाती है कि वह पीड़ितों की आवाज़ बने.

मानवाधिकार संगठनों, बुद्धिजीवियों और आम नागरिकों का मानना है कि सरकार को राजनीति से ऊपर उठकर मानवीय दृष्टिकोण अपनाना चाहिए. चुप्पी से न तो हिंसा रुकती है और न ही पीड़ितों को न्याय मिलता है.

निष्कर्ष

बांग्लादेश में हिंदू, बौद्ध और ईसाई अल्पसंख्यकों के साथ हो रही बर्बरता एक गंभीर और संवेदनशील मुद्दा है.इस पर भारत सरकार और प्रधानमंत्री की चुप्पी कई सवाल खड़ा करती है. 16 दिसंबर 2024 को प्रियंका गांधी द्वारा संसद में उठाई गई आवाज़ आज भी उतनी ही प्रासंगिक है.

जरूरत है कि भारत सरकार इस मुद्दे पर सक्रिय भूमिका निभाए, बांग्लादेश सरकार से स्पष्ट बातचीत करे और हर हाल में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए दबाव बनाए.यही भारत की लोकतांत्रिक और मानवीय पहचान के अनुरूप होगा.

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