अरावली पर्वतमाला पर खनन की अनुमति: पर्यावरण बनाम सरकार की नीति
तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना,22 दिसंबर — भारत की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में से एक अरावली पर्वतमाला एक बार फिर गंभीर बहस के केंद्र में है. इस बार विवाद की वजह बना है भारत सरकार के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा माननीय उच्चतम न्यायालय में प्रस्तुत वह हलफनामा, जिसमें कहा गया है कि 100 मीटर से कम ऊँचाई वाली पहाड़ियों को अरावली नहीं माना जाएगा और उन क्षेत्रों में खनन की अनुमति दी जा सकती है.
इस फैसले को लेकर भीम आर्मी प्रमुख और सांसद चंद्रशेखर आज़ाद ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व में ट्विटर) पर कड़ा विरोध दर्ज कराया है.उन्होंने इसे न सिर्फ पर्यावरण के लिए घातक बताया है , बल्कि देश की सुरक्षा और भविष्य की पीढ़ियों के लिए भी गंभीर खतरा करार दिया है.

यह लड़ाई सिर्फ कागज़ों तक सीमित नहीं रहेगी
अपने X पोस्ट में चंद्रशेखर आज़ाद ने साफ शब्दों में लिखा है कि,
यह लड़ाई सिर्फ़ काग़ज़ों तक सीमित नहीं रहेगी,सड़क से लेकर संसद तक लड़ी जाएगी.
यह बयान साफ संकेत देता है कि यह मुद्दा आने वाले समय में राजनीतिक और सामाजिक आंदोलन का रूप ले सकता है. उनका कहना है कि प्रकृति के विनाश पर चुप्पी कोई विकल्प नहीं है और जनता की आवाज़ को दबाया नहीं जा सकता है.
अरावली केवल ऊँचाई नहीं, एक संपूर्ण पारिस्थितिक तंत्र
सरकार के हलफनामे में अरावली की पहचान को केवल ऊँचाई (100 मीटर) से जोड़ना वैज्ञानिक और पर्यावरणीय दृष्टि से गंभीर रूप से त्रुटिपूर्ण माना जा रहा है. चंद्रशेखर आज़ाद ने अपने पोस्ट में स्पष्ट किया है कि,
अरावली पर्वतमाला लगभग 800 किलोमीटर लंबी है
इसका विस्तार दिल्ली के रायसीना हिल से गुजरात के पालनपुर तक है.
रायसीना हिल की ऊँचाई समुद्र तल से केवल लगभग 15 मीटर है, फिर भी वह अरावली का हिस्सा माना जाता है
इसका सीधा अर्थ यह है कि अगर ऊँचाई को ही मापदंड बना दिया गया, तो रायसीना हिल जैसे राष्ट्रीय महत्व के क्षेत्र भी इस परिभाषा से बाहर हो सकते हैं.
रायसीना हिल और राष्ट्रीय सुरक्षा का सवाल
रायसीना हिल सिर्फ एक पहाड़ी नहीं है, बल्कि:
राष्ट्रपति भवन, संसद भवन, प्रधानमंत्री कार्यालय
अन्य महत्वपूर्ण सरकारी संस्थानों, का केंद्र है. चंद्रशेखर आज़ाद ने सरकार से सीधा सवाल किया है कि अगर 100 मीटर से कम ऊँचाई वाली पहाड़ियों को अरावली नहीं माना जाएगा, तो क्या रायसीना हिल और उसके आसपास के क्षेत्रों को भी खनन माफियाओं के हवाले कर दिया जाएगा?
यह सवाल केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और संवैधानिक संस्थाओं की सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ है.
खनन से होने वाला संभावित पर्यावरणीय नुकसान
पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार, अरावली में खनन से,
भू-जल स्तर में भारी गिरावट
वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास का विनाश.
स्थानीय समुदायों की आजीविका पर संकट.
रेगिस्तान का फैलाव और प्रदूषण में वृद्धि.
जैसी समस्याएं और गंभीर होंगी. चंद्रशेखर आज़ाद का कहना है कि यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के पूर्व संरक्षणात्मक आदेशों की भावना के भी खिलाफ है, जिनका उद्देश्य अरावली को बचाना था, न कि उसे व्यावसायिक शोषण के लिए खोल देना.
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सरकार से पुनर्विचार की मांग
भीम आर्मी प्रमुख ने
@mygovindia और @moefcc से स्पष्ट मांग की है कि:
इस निर्णय पर तुरंत पुनर्विचार किया जाए,
केवल अल्पकालिक आर्थिक लाभ के बजाय दीर्घकालिक पर्यावरणीय प्रभावों को प्राथमिकता दी जाए.
आने वाली पीढ़ियों के लिए जलस्रोतों और प्राकृतिक संपदा की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए.
उनका मानना है कि यदि यह नीति लागू होती है, तो यह केवल अरावली ही नहीं, बल्कि पूरे उत्तर भारत के पर्यावरणीय संतुलन को खतरे में डाल देगी.
निष्कर्ष: विकास या विनाश?
अरावली पर खनन को लेकर उठ रहा यह विवाद एक बड़े सवाल को जन्म देता है.क्या विकास का मतलब प्रकृति का विनाश होना चाहिए?
चंद्रशेखर आज़ाद की यह आवाज़ केवल एक राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण की चेतावनी है.यदि आज अरावली को ऊँचाई के नाम पर काट दिया गया, तो कल देश की अन्य प्राकृतिक धरोहरें भी इसी तर्क की भेंट चढ़ सकती हैं.
अब यह देखना अहम होगा कि सरकार इस चेतावनी को कितनी गंभीरता से लेती है और क्या पर्यावरण को लेकर नीतियों में संतुलन स्थापित किया जाता है या नहीं.

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