BSP नहीं होती तो बाबा साहेब का नाम मिटा दिया जाता! – मायावती

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Ajit Kumar

भारत
BSP नहीं होती तो बाबा साहेब का नाम मिटा दिया जाता! – मायावती

BSP और संविधान की रक्षा: मायावती के बयान का राजनीतिक और सामाजिक अर्थ

तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना,4 जनवरी बहुजन समाज पार्टी (BSP) की राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री आदरणीय बहन कु. मायावती ने अपने आधिकारिक X (Twitter) हैंडल @Bsp4u से एक सशक्त राजनीतिक बयान साझा किया है.इस बयान में उन्होंने सीधे तौर पर यह आरोप लगाया कि यदि BSP का गठन नहीं हुआ होता, तो आज देश में बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर के नाम, विचारधारा और संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों को खत्म कर दिया गया होता.

मायावती का यह बयान केवल एक राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि संविधान, सामाजिक न्याय और बहुजन अधिकारों की रक्षा से जुड़ा गहरा संदेश है.

मायावती का बयान: क्या कहा BSP प्रमुख ने?

मायावती ने अपने X पोस्ट में लिखा,

यदि बीएसपी नहीं बनी होती तो अब तक ये बाबा साहेब का नाम मिटा देते और जो संविधान में दबे-कुचले लोगों को कानूनी अधिकार मिले हैं, उन्हें खत्म कर देते. ये तो बीएसपी की वजह से इनकी मजबूरी है.

यह कथन सीधे तौर पर उन राजनीतिक और वैचारिक शक्तियों की ओर इशारा करता है, जिन पर BSP लंबे समय से संविधान विरोधी और मनुवादी सोच को बढ़ावा देने का आरोप लगाती रही है.

BSP की ऐतिहासिक भूमिका: सिर्फ पार्टी नहीं, एक आंदोलन

बहुजन समाज पार्टी की स्थापना कांशीराम साहब ने की थी, जिसका मूल उद्देश्य था – जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी.

BSP सिर्फ एक चुनावी पार्टी नहीं रही, बल्कि यह, दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों,के संवैधानिक अधिकारों की आवाज़ बनकर उभरी.

मायावती के नेतृत्व में BSP ने यह सुनिश्चित किया कि आरक्षण, सामाजिक न्याय और बराबरी के सवाल को राजनीतिक हाशिये पर न धकेला जाये.

बाबा साहेब अंबेडकर और संविधान का सवाल

डॉ. भीमराव अंबेडकर सिर्फ संविधान निर्माता नहीं थे, बल्कि वे, सामाजिक बराबरी के प्रतीक,जाति व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष, मानव गरिमा के समर्थक थे.

मायावती का यह कहना कि,बाबा साहेब का नाम मिटा दिया जाता, उस वैचारिक संघर्ष को दर्शाता है जिसमें इतिहास को बदलने, प्रतीकों को कमजोर करने और संविधान की आत्मा को खत्म करने की कोशिशें होती रही हैं.

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संविधान और दबे-कुचले वर्गों के अधिकार

भारतीय संविधान ने,अनुसूचित जाति/जनजाति को आरक्षण, समानता का अधिकार, शिक्षा और रोजगार में अवसर, सामाजिक सुरक्षा, जैसे कानूनी अधिकार दिया.

BSP का दावा रहा है कि सत्ता में बैठे कुछ वर्ग इन अधिकारों को कमज़ोर या खत्म करने की मानसिकता रखता हैं, लेकिन BSP की राजनीतिक मौजूदगी उन्हें ऐसा करने से रोकती है.

राजनीतिक मजबूरी या लोकतांत्रिक दबाव?

मायावती के बयान का एक अहम हिस्सा है — ये तो BSP की वजह से इनकी मजबूरी है.

इसका सीधा अर्थ यह है कि, संविधान का सम्मान, बाबा साहेब की जयंती, दलित प्रतीकों को स्वीकार करना

कुछ दलों की आस्था नहीं, बल्कि राजनीतिक मजबूरी है.

BSP का मानना है कि यदि बहुजन राजनीति कमजोर हुई, तो सामाजिक न्याय की यह दिखावटी प्रतिबद्धता भी खत्म हो सकता है.

मौजूदा राजनीतिक माहौल में बयान का महत्व

आज जब, संविधान बदलने की बहस, आरक्षण की समीक्षा, इतिहास के पुनर्लेखन, जैसे मुद्दे चर्चा में हैं, तब मायावती का यह बयान बहुजन समाज के लिए चेतावनी और एकजुटता का आह्वान माना जा रहा है.

यह बयान BSP के कोर वोटर्स को यह संदेश देता है कि पार्टी आज भी संविधान की ढाल बनकर खड़ी है.

निष्कर्ष: BSP बनाम संविधान विरोधी सोच

मायावती का X पोस्ट यह स्पष्ट करता है कि BSP खुद को, बाबा साहेब की विरासत की रक्षक, संविधान की प्रहरी

बहुजन समाज की राजनीतिक ताकत, के रूप में देखती है.

यह बयान न सिर्फ राजनीतिक बहस को तेज करता है, बल्कि यह सवाल भी उठाता है कि क्या संविधान और सामाजिक न्याय वास्तव में सुरक्षित हैं, या वे केवल मजबूरी में स्वीकार किए जा रहे हैं?

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