दलित बस्तियों पर कार्रवाई से उबाल, 200 अंचलों में सड़क पर उतरे लोग
तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना, 6 जनवरी 2026—बिहार में शीतलहरी के बीच दलित और गरीब परिवारों के घरों पर चलाए जा रहे बुलडोजर अभियान के खिलाफ राज्यभर में जबरदस्त जनआक्रोश देखने को मिला है.अखिल भारतीय खेत एवं ग्रामीण मजदूर सभा (खेग्रामस) और अन्य खेत मजदूर संगठनों के संयुक्त आह्वान पर 5 और 6 जनवरी को बिहार के 200 से अधिक आंचलों में एक साथ जुझारू प्रदर्शन किया. इन प्रदर्शनों के जरिए सरकार से स्पष्ट मांग की गई है कि दलित गरीबों की वसावटों को उजाड़ने की कार्रवाई तत्काल रोका जाये और वर्षों से बसे परिवारों को आवासीय अधिकार दिया जाये.
राज्यव्यापी आंदोलन में भाकपा (माले) से संबद्ध खेग्रामस और मनरेगा मजदूर सभा के हजारों कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया.सड़कों, अंचल कार्यालयों और प्रशासनिक केंद्रों पर हुए इन प्रदर्शनों ने यह साफ कर दिया कि वास,आवास का सवाल अब केवल सामाजिक मुद्दा नहीं, बल्कि एक बड़े राजनीतिक संघर्ष का रूप ले चुका है.
1948 के कानून के बावजूद आज भी भूमिहीन गरीब
पटना जिले के बिक्रम अंचल में आंदोलन की अगुवाई करते हुए खेग्रामस के राष्ट्रीय महासचिव धीरेंद्र झा ने सरकार की नीतियों पर तीखा सवाल उठाया है.उन्होंने कहा कि आज़ादी के बाद बिहार पहला राज्य था जिसने वर्ष 1948 में पीपीएच एक्ट बनाकर दर-रैयत और मजदूरों को आवासीय भूमि का अधिकार देने का प्रावधान किया था . इसके बावजूद आज राज्य की लगभग 30 प्रतिशत आबादी आवासीय भूमिहीन है.
धीरेंद्र झा ने इसे गरीबों से जुड़े कानूनों के ईमानदार क्रियान्वयन की विफलता बताया है. उन्होंने मांग किया है कि जहां-जहां दलित और गरीब परिवार दशकों से बसे हुए हैं, वहां समुचित सर्वे कराकर उन्हें पर्चा/पट्टा दिया जाये, साथ ही विकास परियोजनाओं के नाम पर विस्थापित परिवारों के लिए पंचायतों और शहरी वार्डों में मजदूर कॉलोनियों के निर्माण की मांग भी रखा है.
उन्होंने यह भी ऐलान किया कि आगामी बजट सत्र में गांव के दलित गरीबों की ओर से जुझारू विधानसभा घेराव किया जाएगा. इस दौरान मनरेगा को पूरी तरह लागू करने और चार श्रम संहिताओं (4 लेबर कोड) को रद्द करने की मांग भी आंदोलन का अहम हिस्सा रहा .
कॉरपोरेट हितों के लिए गरीबों की बेदखली का आरोप
सिवान जिले के दरौली अंचल में आंदोलन का नेतृत्व करते हुए खेग्रामस के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं पूर्व विधायक सत्यदेव राम ने सरकार पर गंभीर आरोप लगाये है. उन्होंने कहा कि सरकार अदानी–अंबानी जैसे बड़े कॉरपोरेट घरानों को जमीन देने के लिए गरीबों को उजाड़ रही है. उनके अनुसार यह केवल प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, बल्कि एक सोची-समझी नीति का हिस्सा है.
सत्यदेव राम ने कहा कि इस मुद्दे पर सदन में मुख्यमंत्री को घेरा जा चुका है और अब संघर्ष सड़कों पर तेज किया जाएगा.उन्होंने यह भी चेतावनी दी है कि भूमिसुधार का जिम्मा भाजपा को सौंपने के राजनीतिक नतीजों से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बच नहीं पाएंगे.
महिलाओं की भागीदारी ने आंदोलन को दी नई धार
खेग्रामस के राज्य सचिव शत्रुघ्न सहनी ने बताया कि राज्य के अधिकांश आंचलों में जुझारू प्रदर्शन हुआ और इनमें महिलाओं की बड़ी भागीदारी रही है.उन्होंने कहा कि दलित गरीबों के घरों पर बुलडोजर चलाने की कार्रवाई तुरंत रोकी जानी चाहिये, शत्रुघ्न सहनी के अनुसार, यह बुलडोजर अभियान सरकार के उस दावे की पोल खोलता है, जिसमें महिलाओं के नाम पर कल्याणकारी राजनीति की बात की जाती है.
उनका कहना था कि जमीन और आवास जैसे बुनियादी सवाल पर महिलाओं का सशक्त रूप से सामने आना इस आंदोलन को निर्णायक दिशा देगा.
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दशकों पुरानी दलित बस्तियों के नियमितीकरण की मांग
पालीगंज और दुल्हिन बाजार में आंदोलन की अगुवाई युवा विधायक संदीप सौरभ ने किया . उन्होंने कहा कि दशकों से बसी दलित बस्तियों को आज तक नियमित नहीं किया जाना न्याय और विकास दोनों पर बड़ा सवाल खड़ा करता है.उन्होंने विशेष रूप से मुशहर/भुईयां बस्तियों सहित सभी दलित बस्तियों के नियमितीकरण की मांग किया है .
संदीप सौरभ ने कहा कि अगर सरकार वास्तव में सामाजिक न्याय और समावेशी विकास की बात करता है, तो उसे सबसे पहले दलित गरीबों के वास–आवास की सुरक्षा सुनिश्चित करना होगा.
आंदोलन का दायरा और आगे की रणनीति
इस राज्यव्यापी प्रतिवाद में विभिन्न जिलों में गोपाल रविदास, बिरेंद्र गुप्ता, उपेंद्र पासवान, प्रदीप कुमार सहित कई नेताओं ने नेतृत्व किया. आंदोलनकारियों ने साफ संकेत दिया कि यदि बुलडोजर कार्रवाई नहीं रुकी और वसावटों का सर्वे कर पर्चा नहीं दिया गया, तो संघर्ष को और व्यापक किया जाएगा.
खेग्रामस और सहयोगी संगठनों का कहना है कि यह आंदोलन केवल घर बचाने का नहीं, बल्कि सम्मान, अधिकार और संवैधानिक न्याय की लड़ाई है. आने वाले दिनों में यह आंदोलन बिहार की राजनीति और नीति—दोनों को गहराई से प्रभावित कर सकता है.

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