एजाज़ अहमद ने कहा, सुरक्षा के नाम पर किसी भी धर्म को निशाना बनाना गलत है
तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना,7जनवरी भारत एक ऐसा देश है, जिसकी पहचान उसकी विविधता, सहिष्णुता और संविधान द्वारा प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता से होती है. यहां हर नागरिक को अपने धर्म, आस्था और सांस्कृतिक पहचान के साथ जीने का अधिकार है. लेकिन हाल के दिनों में बिहार के कुछ इलाकों में ज्वेलरी दुकानदारों द्वारा हिजाब और नकाब पहनने वाली महिलाओं पर लगाया गया प्रतिबंध ने एक नई और चिंताजनक बहस को जन्म दे दिया है. यह मुद्दा अब केवल सुरक्षा व्यवस्था तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि संवैधानिक अधिकारों, धार्मिक भावनाओं और सामाजिक सद्भाव से जुड़ा गंभीर प्रश्न बन चुका है.
हिजाब-नकाब प्रतिबंध पर राजद की कड़ी आपत्ति
राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के प्रदेश प्रवक्ता एजाज़ अहमद ने इस प्रतिबंध को लेकर कड़ा विरोध दर्ज कराया है.उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह कदम भारत के संविधान और संवैधानिक परंपराओं के खिलाफ है. उनका कहना है कि किसी भी नागरिक को उसके पहनावे के आधार पर सार्वजनिक या निजी सेवाओं से वंचित करना न केवल असंवैधानिक है, बल्कि यह धार्मिक स्वतंत्रता पर सीधा हमला भी है.
एजाज़ अहमद ने यह भी कहा कि सुरक्षा के नाम पर किसी विशेष धार्मिक पहचान को निशाना बनाना लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्वीकार्य नहीं हो सकता. यदि सुरक्षा ही एकमात्र मुद्दा है, तो उसके लिए समान और गैर-भेदभावपूर्ण नियम बनाया जाना चाहिये, न कि किसी एक समुदाय को अलग करके देखा जाये.
संविधान क्या कहता है?
भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को अनुच्छेद 25 के तहत धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार देता है. इसमें अपने धर्म को मानने, आचरण करने और प्रचार करने की आज़ादी शामिल है. हिजाब और नकाब पहनना मुस्लिम महिलाओं के लिए धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है.ऐसे में इन पर प्रतिबंध लगाना संविधान की मूल भावना के विपरीत माना जा सकता है.
इसके अलावा अनुच्छेद 14 समानता का अधिकार देता है और अनुच्छेद 15 धर्म के आधार पर भेदभाव से रोकता है. किसी महिला को केवल उसके पहनावे के कारण दुकान में प्रवेश से रोकना इन अनुच्छेदों की भावना पर भी सवाल खड़ा करता है.
सुरक्षा बनाम धार्मिक स्वतंत्रता
अक्सर इस तरह के प्रतिबंधों को सुरक्षा कारणों से जोड़ा जाता है. यह सच है कि ज्वेलरी जैसी संवेदनशील दुकानों में सुरक्षा अहम मुद्दा है, लेकिन सवाल यह है कि क्या सुरक्षा के नाम पर सिर्फ एक धार्मिक समुदाय की महिलाओं को ही निशाना बनाया जाना उचित है?
एजाज़ अहमद का कहना है कि यदि सुरक्षा चिंता का विषय है, तो सीसीटीवी, महिला सुरक्षा कर्मी, पहचान सत्यापन जैसे समान उपाय सभी ग्राहकों पर लागू किए जा सकता हैं. किसी विशेष पहनावे या धार्मिक प्रतीक को प्रतिबंधित करना न तो न्यायसंगत है और न ही व्यावहारिक.
राजनीतिक और वैचारिक आरोप
राजद प्रवक्ता ने आरोप लगाया कि इस तरह के फैसलों के पीछे भाजपा और आरएसएस से जुड़ी वैचारिक सोच पहले से सक्रिय रही है, और अब कुछ कारोबारी उसी एजेंडे को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहा हैं. उन्होंने कहा कि यह महज एक दुकान का फैसला नहीं है, बल्कि समाज को धार्मिक आधार पर विभाजित करने की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा भी हो सकता है.
उनका मानना है कि जब निजी संस्थान या दुकानदार इस तरह के नियम लागू करता हैं, तो वे अप्रत्यक्ष रूप से सामाजिक भेदभाव को बढ़ावा देता हैं, जिससे समाज में तनाव और अविश्वास की स्थिति पैदा होती है.
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महिलाओं के अधिकार और सम्मान का सवाल
यह मुद्दा केवल धर्म या राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह महिलाओं के सम्मान और आत्मनिर्णय के अधिकार से भी जुड़ा हुआ है.किसी महिला को यह तय करने का पूरा अधिकार है कि वह क्या पहनना चाहती है. हिजाब या नकाब पहनने वाली महिलाओं को सार्वजनिक स्थानों पर असहज महसूस कराना उनके गरिमा के अधिकार का उल्लंघन है.
भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में महिलाओं को सशक्त बनाने की बात की जाती है, ऐसे में उनके पहनावे के आधार पर रोक-टोक करना एक पिछड़ी और असंवेदनशील सोच को दर्शाता है.
राजद की मांग और संदेश
एजाज़ अहमद ने ज्वेलरी दुकानदारों से मांग किया है कि वे तुरंत इस प्रतिबंध को वापस लें और सामाजिक जिम्मेदारी का परिचय दें. उन्होंने कहा कि यह मामला सिर्फ हिजाब और नकाब का नहीं है, बल्कि यह धार्मिक आज़ादी और संवैधानिक व्यवस्था की रक्षा का सवाल है.
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि राजद हमेशा से सामाजिक न्याय, धर्मनिरपेक्षता और संविधान की रक्षा के पक्ष में खड़ा रहा है और भविष्य में भी किसी भी प्रकार के भेदभावपूर्ण फैसलों का विरोध करता रहेगा.
निष्कर्ष
हिजाब और नकाब पर लगाया गया प्रतिबंध एक छोटा सा प्रशासनिक या कारोबारी निर्णय नहीं, बल्कि यह भारत की संवैधानिक आत्मा को छूने वाला विषय है.सुरक्षा और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन ज़रूरी है, लेकिन यह संतुलन भेदभाव और बहिष्कार के जरिए नहीं, बल्कि संवाद, समान नियम और संवेदनशीलता के साथ ही बनाया जा सकता है.
भारत की ताकत उसकी विविधता में है, और इस विविधता की रक्षा करना हम सभी की जिम्मेदारी है. संविधान, लोकतंत्र और सामाजिक सौहार्द तभी मजबूत होंगे, जब हर नागरिक को बिना डर और भेदभाव के अपनी पहचान के साथ जीने की आज़ादी मिले.

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