मैं भारतीय हूँ, कहने के बावजूद एंजेल चकमा की हत्या, नस्लीय नफ़रत पर देश शर्मसार
तीसरा पक्ष ब्यूरो त्रिपुरा,30 दिसंबर — भारत विविधताओं का देश है,भाषा, संस्कृति, पहनावा और चेहरे सब अलग-अलग, लेकिन पहचान एक है, भारतीय. फिर भी समय-समय पर ऐसी घटनाएँ सामने आती हैं, जो इस मूल भावना को झकझोर देती हैं. त्रिपुरा से जुड़े एंजेल चकमा की हत्या ऐसी ही एक घटना है, जिसने पूरे देश को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या आज भी किसी को अपने ,भारतीय होने का सबूत देना पड़ता है?
X (Twitter) पर सामाजिक कार्यकर्ता एवं राजद के राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रियंका भारती (@priyanka2bharti) के पोस्ट के अनुसार, एंजेल चकमा बार-बार कहते रहे कि,
I am Indian, I’m from Tripura
इसके बावजूद नफ़रत से भरे लोगों ने उन्हें Chinese, Momo और Chinki जैसे नस्लीय शब्दों से अपमानित किया और अंततः उनकी हत्या कर दिया गया.
कौन थे एंजेल चकमा?
एंजेल चकमा पूर्वोत्तर भारत के त्रिपुरा से ताल्लुक रखते थे. वे एक साधारण परिवार से थे, जिनका सपना पढ़-लिखकर आगे बढ़ने का था. उनके परिवार ने उनकी शिक्षा के लिए एजुकेशन लोन लिया था,यह उस भरोसे का प्रतीक था कि मेहनत और पढ़ाई से भविष्य बदला जा सकता है.
सबसे दर्दनाक तथ्य यह है कि एंजेल के पिता BSF (Border Security Force) में कार्यरत हैं और देश की सीमाओं की रक्षा कर रहे हैं. जिस देश की रक्षा में पिता अपनी ज़िंदगी लगा रहा हैं, उसी देश में उनका बेटा नफ़रत की बलि चढ़ गया,यह विरोधाभास भारतीय समाज के लिए एक गहरी चोट है.
नस्लीय गालियाँ और हिंसा की जड़
पूर्वोत्तर भारत के लोगों को लंबे समय से नस्लीय टिप्पणियों का सामना करना पड़ता है.Chinki, Chinese, Momo जैसे शब्द सिर्फ अपमान नहीं, बल्कि मानव गरिमा पर हमला हैं.जब ऐसी भाषा सामान्य हो जाती है, तो वह धीरे-धीरे हिंसा का रूप ले लेती है.
एंजेल चकमा का मामला दिखाता है कि नस्लीय नफ़रत केवल शब्दों तक सीमित नहीं रहती है. यह सोच लोगों को इस हद तक अंधा कर देती है कि वे किसी की इंसानियत, उसकी पहचान और उसके परिवार को भूल जाते हैं.
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मैं भारतीय हूँ — फिर भी क्यों मारे गए?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि, अगर कोई व्यक्ति खुद को भारतीय बताता है, अपने राज्य का नाम लेता है, फिर भी उसे ,बाहरी कहकर मारा जाता है, तो समस्या व्यक्ति में नहीं—सोच में है.
यह घटना बताता है कि हमारे समाज में अभी भी , चेहरे और लहजे के आधार पर देशभक्ति को तौला जाता है.यह न केवल संविधान की भावना के खिलाफ है, बल्कि राष्ट्रीय एकता के लिए भी बेहद खतरनाक है.
परिवार का दर्द और समाज की ज़िम्मेदारी
प्रियंका भारती के पोस्ट में जिस संवेदनशीलता से परिवार की स्थिति बताई गई है, वह किसी को भी विचलित कर देती है.
परिवार ने पढ़ाई के लिए कर्ज़ लिया.
पिता देश की सुरक्षा में तैनात है,और बेटा नफ़रत की वजह से मारा गया.
यह सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि पूरे समाज की नैतिक विफलता है. सवाल यह है कि क्या हम सिर्फ सोशल मीडिया पर शोक जताकर अपनी ज़िम्मेदारी पूरी कर लेते हैं?
क़ानून, न्याय और जवाबदेही
, एंजेल चकमा की हत्या पर सख़्त और त्वरित न्याय ज़रूरी है.
दोषियों की पहचान, नस्लीय नफ़रत को अपराध मानकर कार्रवाई, और पीड़ित परिवार को न्याय व सुरक्षा
साथ ही, ऐसे मामलों में सिर्फ कानून नहीं, सामाजिक चेतना भी उतनी ही ज़रूरी है.स्कूलों, कॉलेजों और सार्वजनिक मंचों पर विविधता और समानता की शिक्षा देना अब विकल्प नहीं, आवश्यकता बन चुकी है.

प्रियंका भारती की आवाज़ क्यों अहम है?
प्रियंका भारती का यह पोस्ट सिर्फ एक घटना की जानकारी नहीं देता, बल्कि एक नैतिक सवाल खड़ा करता है,
क्या हम नफ़रत से अपने ही देश के बच्चों को बचा पा रहे हैं?
सोशल मीडिया पर ऐसी आवाज़ें इसलिए ज़रूरी हैं, क्योंकि वे उन कहानियों को सामने लाती हैं, जिन्हें अक्सर दबा दिया जाता है.
निष्कर्ष: नफ़रत के खिलाफ एकजुटता
एंजेल चकमा की हत्या हमें याद दिलाती है कि भारतीय होना किसी चेहरे, भाषा या खाने से तय नहीं होता। यह संविधान, समानता और इंसानियत से तय होता है.
अगर आज हम चुप रहे, तो कल यह नफ़रत किसी और के दरवाज़े पर दस्तक देगी.
न्याय, संवेदना और समानता—यही एंजेल चकमा को सच्ची श्रद्धांजलि होगी.

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