यह धरना नहीं, न्याय की पुकार है: जंतर-मंतर पर योगिता भयाना का संघर्ष और देश से न्याय की अपील
तीसरा पक्ष ब्यूरो दिल्ली,28 दिसंबर— जब चुप रहना अपराध बन जाए : देश की राजधानी दिल्ली का जंतर-मंतर एक बार फिर गवाही दे रहा है — न्याय की पुकार की, संघर्ष की आवाज़ की और व्यवस्था से सवाल पूछने की हिम्मत की।
X (पूर्व में Twitter) पर सामाजिक कार्यकर्ता योगिता भयाना (@yogitabhayana) ने साफ शब्दों में लिखा है कि,
यह धरना नहीं, न्याय की पुकार है.
जब तक न्याय नहीं, तब तक संघर्ष जारी.
ये शब्द सिर्फ एक पोस्ट नहीं हैं, बल्कि उन लाखों लोगों की भावनाओं का प्रतिबिंब हैं, जो न्याय के इंतज़ार में वर्षों से खड़ा हैं.
जंतर-मंतर: प्रतीकात्मक स्थल, प्रतीकात्मक संघर्ष
जंतर-मंतर केवल एक जगह नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक प्रतिरोध का प्रतीक है. जब संसद की दीवारें सवालों से बचती हैं, तब जंतर-मंतर जनता की आवाज़ को मंच देता है.
योगिता भयाना का यहां खड़ा होना इस बात का संकेत है कि मामला सिर्फ एक व्यक्ति या एक घटना का नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था की संवेदनशीलता का है.
योगिता भयाना कौन हैं?
योगिता भयाना एक जानी-मानी सामाजिक कार्यकर्ता और पीड़ितों की आवाज़ के रूप में पहचानी जाती हैं.
वह लगातार ऐसे मामलों में सामने आई हैं जहाँ,
पीड़ित को न्याय मिलने में देरी हुई है.
सत्ता और व्यवस्था ने आंखें मूंद लीं है .
संवेदनशील मुद्दों को राजनीति की भेंट चढ़ा दिया गया हो .
उनका संघर्ष किसी पार्टी या विचारधारा से नहीं, बल्कि न्याय, संवेदना और मानवाधिकार से जुड़ा हुआ है.
यह धरना नहीं, न्याय की पुकार है — अर्थ और संदेश
इस एक पंक्ति में छिपा है पूरा आंदोलन.
धरना आमतौर पर राजनीतिक दबाव का माध्यम होता है, लेकिन योगिता भयाना इसे न्याय की पुकार कहती हैं, क्योंकि,
यह सत्ता गिराने का नहीं, व्यवस्था जगाने का प्रयास है.
यह नारेबाज़ी नहीं, पीड़ित की चीख है.
यह राजनीतिक लाभ नहीं, मानवीय न्याय की मांग है.
उनका कहना साफ है कि,जब तक न्याय नहीं मिलेगा, तब तक संघर्ष रुकेगा नहीं.
न्याय में देरी: लोकतंत्र पर सबसे बड़ा सवाल
भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में न्याय की अवधारणा संविधान से जुड़ी हुई है.
लेकिन जब,
केस सालों तक लटकता हैं
पीड़ित सड़कों पर उतरने को मजबूर होता हैं.
न्याय मांगने वालों को ही कठघरे में खड़ा किया जाता है.
तो यह सवाल उठता है कि,
क्या न्याय केवल किताबों तक सीमित रह गया है?
योगिता भयाना का यह आंदोलन इसी सवाल को देश के सामने रखता है.
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सोशल मीडिया से सड़क तक: संघर्ष की नई भाषा
X (Twitter) पर किया गया पोस्ट आज सिर्फ ऑनलाइन प्रतिक्रिया नहीं रहा.
यह पोस्ट, जंतर-मंतर तक पहुंचा
मीडिया की सुर्खियां बना, आम लोगों के बीच बहस का विषय बना
यह दिखाता है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म अब आंदोलन की शुरुआत बन चुका हैं, लेकिन असली लड़ाई आज भी सड़क पर लड़ी जा रही है.
सरकार और व्यवस्था से सवाल
योगिता भयाना का संघर्ष सीधे-सीधे कुछ अहम सवाल खड़ा करता है कि ,
न्याय के लिए धरने की ज़रूरत क्यों पड़ती है?
पीड़ित को सिस्टम के दरवाज़े खटखटाने के बजाय सड़क पर क्यों आना पड़ता है?
क्या त्वरित न्याय केवल वादों तक सीमित है?
ये सवाल किसी एक सरकार से नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था से हैं.
जब तक न्याय नहीं, तब तक संघर्ष जारी — भविष्य का संकेत
यह वाक्य सिर्फ जिद नहीं, बल्कि दृढ़ संकल्प है.
यह बताता है कि, संघर्ष लंबा हो सकता है.
रास्ता कठिन हो सकता है. लेकिन पीछे हटना विकल्प नहीं है.
इतिहास गवाह है कि हर बड़ा बदलाव ऐसे ही संघर्षों से जन्म लेता है.
निष्कर्ष: यह आवाज़ अनसुनी नहीं होनी चाहिए
योगिता भयाना का जंतर-मंतर पर खड़ा होना हमें याद दिलाता है कि,
न्याय मांगना कोई अपराध नहीं, बल्कि नागरिक का अधिकार है.
अगर लोकतंत्र में जनता को न्याय के लिए धरना देना पड़े, तो यह चेतावनी है,
व्यवस्था के लिए भी और समाज के लिए भी.
आज जरूरत है कि इस आवाज़ को, सुना जाए, समझा जाए, और न्याय में बदला जाए
क्योंकि यह धरना नहीं, सच में न्याय की पुकार है.

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