अंकिता भंडारी हत्याकांड: न्याय या सत्ता-संरक्षित कवर-अप?
तीसरा पक्ष ब्यूरो नई दिल्ली पटना/ 4 जनवरी — उत्तराखंड की 19 वर्षीय अंकिता भंडारी की हत्या केवल एक आपराधिक घटना नहीं थी, बल्कि यह मामला सत्ता, प्रभाव और महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े गहरे सवालों का प्रतीक बन गया है.18 सितंबर 2022 को ऋषिकेश के यमकेश्वर क्षेत्र में स्थित वनंत्रा रिजॉर्ट से लापता हुई अंकिता का शव कुछ दिन बाद चीला नहर से बरामद हुआ है. इस घटना ने न केवल एक परिवार को तोड़ दिया, बल्कि पूरे देश में आक्रोश और अविश्वास की लहर पैदा कर दिया है.
मई 2025 में कोटद्वार की अदालत ने तीनों आरोपियों को उम्रकैद की सज़ा सुनाई, लेकिन इसके बावजूद यह सवाल आज भी बना हुआ है,क्या अंकिता को पूरा न्याय मिला?
मामले की शुरुआत: नौकरी, दबाव और हत्या
अंकिता भंडारी पौड़ी गढ़वाल की रहने वाली थीं. होटल मैनेजमेंट का कोर्स पूरा करने के बाद उन्होंने वनंत्रा रिजॉर्ट में रिसेप्शनिस्ट के रूप में काम शुरू किया. जांच में सामने आया कि रिजॉर्ट मालिक पुलकित आर्य और उसके सहयोगी अंकिता पर मेहमानों को तथाकथित, स्पेशल सर्विस देने का दबाव बना रहे थे.
अंकिता के इनकार के बाद विवाद बढ़ा और आरोप है कि इसी कारण उसकी हत्या कर शव को नहर में फेंक दिया गया था . यह तथ्य सामने आने के बाद राज्यभर में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया . लोगों का गुस्सा इसलिए भी बढ़ा क्योंकि रिजॉर्ट को बहुत जल्द बुलडोज़र से ध्वस्त कर दिया गया, जिसे कई लोगों ने सबूत मिटाने की कार्रवाई बताया.
जांच, सज़ा और अधूरा न्याय
सरकार ने दबाव में आकर एसआईटी का गठन किया. जांच में व्हाट्सएप चैट, कॉल डिटेल्स, सीसीटीवी फुटेज और गवाहों के बयान शामिल किया गया. अदालत ने इन्हीं साक्ष्यों के आधार पर पुलकित आर्य, सौरभ भास्कर और अंकित गुप्ता को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सज़ा सुनाई.
हालांकि, अंकिता के माता-पिता का कहना है कि यह न्याय अधूरा है.उनका तर्क है कि,
फांसी की सज़ा पर विचार नहीं किया गया.
वीवीआईपी एंगल की स्वतंत्र जांच नहीं हुई.
सबूत नष्ट करने वालों पर कोई बड़ी कार्रवाई नहीं हुई.
उनका दर्द आज भी यह सवाल पूछता है कि,क्या प्रभावशाली लोग कानून से ऊपर हैं?
वीवीआईपी एंगल: सबसे बड़ा विवाद
इस मामले में सबसे संवेदनशील और विवादित मुद्दा कथित,वीवीआईपी गेस्ट का है. शुरुआती जांच में पुलिस ने स्वीकार किया कि अंकिता पर एक खास मेहमान को सर्विस देने का दबाव था.बाद में पुलिस ने दावा किया कि वह कोई बड़ा नेता या अधिकारी नहीं, बल्कि एक सामान्य व्यक्ति था.
लेकिन जनता और विपक्ष इस दावे से संतुष्ट नहीं है.सोशल मीडिया पर लगातार यह सवाल उठता रहा कि अगर कोई वीवीआईपी नहीं था, तो:
नाम सार्वजनिक करने में हिचक क्यों?
रिजॉर्ट इतनी जल्दी क्यों गिराया गया?
सीबीआई जांच से परहेज़ क्यों?
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योगिता भयाना की एंट्री और मामला फिर गरमाया
समाजिक कार्यकर्ता योगिता भयाना, जो पहले भी उन्नाव जैसे मामलों में पीड़िताओं के साथ खड़ी रही हैं, ने इस केस को दोबारा राष्ट्रीय बहस में ला दिया. उनके अनुसार, यह मामला एक ,सत्ता-संरक्षित कवर-अप है.
योगिता की प्रमुख मांगें हैं,
कोर्ट निगरानी में नई एसआईटी जांच,
सबूत नष्ट करने वालों पर कड़ी कार्रवाई,
कथित वीवीआईपी का नाम सार्वजनिक करना’
उनकी अंकिता भंडारी के लिए न्याय मुहिम सोशल मीडिया पर व्यापक समर्थन पा रहा है.
जनता का सवाल: क्या न्याय केवल सज़ा है?
सरकार और पुलिस का दावा है कि अदालत के फैसले से न्याय पूरा हो गया, लेकिन जनता का एक बड़ा वर्ग मानता है कि न्याय केवल दोषियों को सज़ा देना नहीं, बल्कि पूरे सच को सामने लाना भी है.
जंतर-मंतर से लेकर उत्तराखंड की सड़कों तक उठती आवाज़ें यही कहता हैं कि,जब तक हर सच सामने नहीं आएगा, तब तक यह लड़ाई खत्म नहीं होगी.
निष्कर्ष: न्याय में देरी, लोकतंत्र की परीक्षा
अंकिता भंडारी हत्याकांड आज भी भारतीय लोकतंत्र, कानून व्यवस्था और महिलाओं की सुरक्षा की परीक्षा बना हुआ है.सज़ा के बावजूद अनुत्तरित सवाल यह दर्शाते हैं कि प्रभाव और सत्ता के सामने न्याय कितना मजबूत है.
यह मामला हमें याद दिलाता है कि हर बेटी की सुरक्षा सिर्फ कानून की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है.
जब तक पूरा सच सामने नहीं आता, तब तक #JusticeForAnkitaBhandari केवल एक हैशटैग नहीं, बल्कि एक ज़रूरत बना रहेगा.
यह समाचार विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स, अदालत के फैसलों, पुलिस जांच दस्तावेजों और सामाजिक कार्यकर्ता योगिता भयाना के सार्वजनिक बयानों/सोशल मीडिया पोस्ट्स पर आधारित है.

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