ABVP vs NSUI के बीच दीपांशु शौकीन ने कैसे पलटा पूरा खेल?

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kmSudha

तीसरा पक्ष आलेखभारत
ABVP vs NSUI के बीच दीपांशु शौकीन ने कैसे पलटा पूरा खेल?

DUSU Election 2026: NSUI से टिकट नहीं मिला, फिर भी 30 हजार वोट! कौन हैं दीपांशु शौकीन?

तीसरा पक्ष न्यूज़ डेस्क,नई दिल्ली | DUSU Election 2026: दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव में ABVP ने चार केंद्रीय पदों में से तीन पर जीत दर्ज की, लेकिन उपाध्यक्ष पद पर निर्दलीय उम्मीदवार दीपांशु शौकीन की जीत ने पूरे चुनाव का समीकरण बदल दिया। शौकीन ने ABVP और NSUI दोनों के उम्मीदवारों को पीछे छोड़ते हुए बड़ी जीत दर्ज की.

NSUI से टिकट नहीं मिला, तो निर्दलीय मैदान में उतरे

दीपांशु शौकीन पहले NSUI से जुड़े रहे थे और छात्र राजनीति में संगठन के लिए सक्रिय रहे। 2026 में उपाध्यक्ष पद के लिए उन्हें NSUI का टिकट नहीं मिला. इसके बाद उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ने का फैसला किया.

यहीं से चुनाव की कहानी में बड़ा बदलाव आया. जिस उम्मीदवार को संगठन का टिकट नहीं मिला, वही बाद में उसी पद पर संगठन के उम्मीदवार से काफी आगे निकल गया.

वोटों के आंकड़ों ने क्या बताया?

ABVP vs NSUI के बीच दीपांशु शौकीन ने कैसे पलटा पूरा खेल?

उपाध्यक्ष पद के नतीजे काफी स्पष्ट रहे.

  • दीपांशु शौकीन (निर्दलीय): 30,615 वोट
  • ईशु मौर्य (ABVP): 16,910 वोट
  • वीर चतरथ (NSUI): 4,313 वोट

शौकीन ने ABVP उम्मीदवार को 13,705 वोटों के अंतर से हराया.

यानी मुकाबला सिर्फ ABVP और NSUI के बीच सीमित नहीं रहा। एक निर्दलीय उम्मीदवार ने दोनों संगठनों के उम्मीदवारों को पीछे छोड़कर उपाध्यक्ष पद हासिल कर लिया.

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    चार साल की छात्र राजनीति का असर?

    रिपोर्टों के अनुसार शौकीन लंबे समय से DU की छात्र राजनीति और छात्र गतिविधियों में सक्रिय रहे हैं. उन्होंने पहले NSUI के उम्मीदवारों के लिए भी प्रचार किया था. 2026 में टिकट न मिलने के बाद उन्होंने अपने पुराने छात्र संपर्कों और समर्थकों के आधार पर स्वतंत्र अभियान शुरू किया.

    उनके अभियान में छात्र मुद्दों को प्रमुखता देने की बात सामने आई. रिपोर्टों में सत्य निकेतन हादसे के बाद छात्रों के लिए न्याय की मांग और उनके पैदल/नंगे पैर प्रचार अभियान का भी उल्लेख है.

    ‘बागी उम्मीदवार’ से जीत तक

    दीपांशु की कहानी का सबसे अहम पहलू यही रहा कि वह किसी बड़े छात्र संगठन के आधिकारिक उम्मीदवार नहीं थे। इसके बावजूद उन्हें 30 हजार से ज्यादा वोट मिले.

    आखिर ऐसा कैसे हुआ?

    रिपोर्टों में इसके पीछे कई कारकों का उल्लेख किया गया है—उनका पहले से छात्र राजनीति में सक्रिय होना, कैंपस में व्यक्तिगत पहचान, पुराने समर्थकों का साथ और NSUI से टिकट न मिलने के बाद पैदा हुई राजनीतिक स्थिति.

    हालांकि इन कारणों में से किसका कितना प्रभाव रहा, इसे निश्चित रूप से अलग-अलग मापना मुश्किल है। चुनाव परिणाम यह जरूर दिखाते हैं कि उपाध्यक्ष पद पर मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा दोनों प्रमुख छात्र संगठनों के उम्मीदवारों से अलग विकल्प की ओर गया।

    DUSU चुनाव का बड़ा संदेश

    2026 के चुनाव में ABVP ने अध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव के पद जीते, जबकि उपाध्यक्ष पद निर्दलीय दीपांशु शौकीन के खाते में गया.

    इस तरह DUSU के केंद्रीय पैनल में एक तरफ ABVP की तीन सीटें रहीं, तो दूसरी तरफ एक निर्दलीय उम्मीदवार ने अपनी जगह बनाई.

    निष्कर्ष

    दीपांशु शौकीन की जीत को केवल ABVP बनाम NSUI की लड़ाई के रूप में देखना पूरी तस्वीर नहीं बताता. इस चुनाव में एक तीसरा रास्ता भी सामने आया—एक ऐसा उम्मीदवार जिसने पहले एक छात्र संगठन के साथ काम किया, टिकट नहीं मिलने के बाद निर्दलीय चुनाव लड़ा और अंततः दोनों प्रमुख संगठनों के उम्मीदवारों से ज्यादा वोट हासिल किए.

    DUSU 2026 का उपाध्यक्ष पद इसलिए खास रहा क्योंकि यहां मुकाबला संगठन की ताकत से ज्यादा उम्मीदवार की व्यक्तिगत पहचान, छात्र संपर्क और चुनावी समर्थन के अलग-अलग समीकरणों का उदाहरण बनकर सामने आया.

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