ED बनाम ममता: जांच एजेंसी की छापेमारी और सत्ता की खुली टकराहट

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kmSudha

भारततीसरा पक्ष आलेख
ED बनाम ममता: जांच एजेंसी की छापेमारी और सत्ता की खुली टकराहट

कानून का राज या केंद्रीय दबाव? IPAC छापे ने फिर छेड़ी एजेंसियों की निष्पक्षता पर बहस

तीसरा पक्ष डेस्क,कोलकाता: पश्चिम बंगाल में आगामी विधानसभा चुनाव से ठीक पहले प्रवर्तन निदेशालय (ED) की एक कार्रवाई ने राज्य की राजनीति में भूचाल ला दिया है. चुनावी रणनीति बनाने वाली चर्चित संस्था इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमिटी (IPAC) के कोलकाता स्थित मुख्यालय पर ED की छापेमारी ने न सिर्फ सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (TMC) को आक्रामक बना दिया, बल्कि यह सवाल भी खड़ा कर दिया कि क्या यह कदम कानून के दायरे में की गई जांच है या फिर चुनाव से पहले की गई राजनीतिक कार्रवाई.

इस पूरे घटनाक्रम में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का सड़कों पर उतरकर विरोध करना और जांच एजेंसी के काम में हस्तक्षेप के आरोप, भारतीय संघीय ढांचे और लोकतांत्रिक संस्थाओं की सीमाओं पर नई बहस छेड़ रहे हैं.

पूरा मामला क्या है?

ED ने कोलकाता के साल्ट लेक क्षेत्र में स्थित IPAC के मुख्यालय और उसके वरिष्ठ पदाधिकारी प्रतीक जैन से जुड़े ठिकानों पर छापा मारा. एजेंसी का कहना है कि यह कार्रवाई कोयला तस्करी से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले की जांच के तहत की गई है. आरोप है कि अवैध कोयला कारोबार से अर्जित धन हवाला नेटवर्क के जरिए IPAC तक पहुंचा और उसका इस्तेमाल राजनीतिक गतिविधियों में किया गया.

ED का दावा है कि यह जांच कोई नई नहीं है, बल्कि वर्षों पुराने मामले की कड़ी है और इसका समय चुनाव से जोड़कर देखना गलत है. एजेंसी ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी राजनीतिक पार्टी कार्यालय पर छापा नहीं डाला गया.

IPAC और TMC का राजनीतिक संदर्भ

IPAC देश की सबसे प्रभावशाली राजनीतिक परामर्श एजेंसियों में से एक है, जिसकी स्थापना रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने की थी. 2021 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में TMC की शानदार जीत के पीछे IPAC की रणनीति को अहम माना गया. यही वजह है कि चुनाव से पहले IPAC पर हुई कार्रवाई को TMC सीधे अपनी चुनावी तैयारी पर हमला मान रही है.

ममता बनर्जी का विरोध और टकराव
ED बनाम ममता: जांच एजेंसी की छापेमारी और सत्ता की खुली टकराहट

छापेमारी की खबर मिलते ही मुख्यमंत्री ममता बनर्जी स्वयं मौके पर पहुंचीं और ED की कार्रवाई का खुलकर विरोध किया. उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्रीय एजेंसी TMC की चुनावी रणनीति, उम्मीदवारों की सूची और डिजिटल डेटा जब्त करने की कोशिश कर रही है.

प्रतीक जैन के आवास और बाद में IPAC कार्यालय जाने के दौरान उनके हाथ में एक हरी फाइल और हार्ड डिस्क देखी गई, जिसने विवाद को और बढ़ा दिया.

उन्होंने गृह मंत्री अमित शाह पर निशाना साधते हुए कहा,

“क्या ED और अमित शाह का काम पार्टी की हार्ड डिस्क और उम्मीदवारों की सूची उठाना है? अगर यही काम BJP के दफ्तर में हो तो क्या होगा?”

ममता ने इस कार्रवाई को “राजनीतिक डकैती” बताया और राज्यभर में विरोध प्रदर्शन का ऐलान किया. TMC ने उसी दिन सभी ब्लॉकों में प्रदर्शन किए और अगले दिन कोलकाता में मुख्यमंत्री के नेतृत्व में बड़े मार्च की घोषणा की.

ममता बनर्जी ने इसे “राजनीतिक बदले की कार्रवाई” बताते हुए कहा कि केंद्र सरकार विपक्षी दलों को डराने के लिए ED और CBI जैसी एजेंसियों का इस्तेमाल कर रही है. इसके बाद TMC ने राज्यभर में विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिए और केंद्र सरकार पर संघीय व्यवस्था को कमजोर करने का आरोप लगाया.

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ED का आरोप: जांच में हस्तक्षेप?

ED का कहना है कि मुख्यमंत्री और उनके सहयोगियों की मौजूदगी से जांच प्रक्रिया बाधित हुई और कुछ महत्वपूर्ण दस्तावेजों व इलेक्ट्रॉनिक सबूतों को हटाने की कोशिश की गई. एजेंसी ने इसे कानून के शासन में सीधा हस्तक्षेप बताया, जिसके बाद मामला न्यायालय तक पहुंच गया.

क्या यह कार्रवाई राजनीति से प्रेरित है?

यह सवाल अब बंगाल की राजनीति के केंद्र में है.

TMC का तर्क है कि चुनाव से पहले ऐसी कार्रवाई साफ तौर पर राजनीतिक है और इसका उद्देश्य विपक्ष को कमजोर करना है.

BJP और ED का दावा है कि कानून अपना काम कर रहा है और जांच को राजनीतिक रंग देना गलत है.

देश के अन्य राज्यों में भी चुनाव के समय केंद्रीय एजेंसियों की सक्रियता को लेकर इसी तरह के आरोप पहले लगते रहे हैं, जिससे इस बहस को और बल मिलता है.

संघीय ढांचे पर खतरा या राज्य का अधिकार?

यह पूरा प्रकरण भारतीय संघीय व्यवस्था की जटिलता को उजागर करता है. एक ओर केंद्रीय एजेंसियां कानून के तहत काम करने का दावा करती हैं, तो दूसरी ओर राज्य सरकारें इसे राज्य के अधिकारों पर हमला मानती हैं.

विशेषज्ञों का मानना है कि

यदि केंद्रीय एजेंसियां राजनीतिक दबाव में काम करती दिखें, तो यह संघीय ढांचे को कमजोर करता है.

वहीं, यदि कोई मुख्यमंत्री जांच प्रक्रिया के दौरान हस्तक्षेप करता है, तो यह कानून के शासन पर सवाल खड़े करता है.

यानी, दोनों ही स्थितियां लोकतंत्र के लिए चिंताजनक हैं.

निष्कर्ष

IPAC पर ED की छापेमारी अब सिर्फ एक जांच नहीं रह गई है, बल्कि यह राजनीतिक संघर्ष, संघीय अधिकार और लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता का मुद्दा बन चुकी है. चुनावी माहौल में इस तरह की घटनाएं स्वाभाविक रूप से संदेह और टकराव को जन्म देती हैं.

आखिरकार सच्चाई क्या है, यह अदालत और जांच एजेंसियां तय करेंगी. लेकिन, इतना तय है कि लोकतंत्र में जांच की निष्पक्षता और केंद्र–राज्य संबंधों की मर्यादा दोनों का संतुलन बनाए रखना आज की सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है.

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