भारत की ग्रोथ रफ्तार और हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ का मिथक, प्रधानमंत्री मोदी का बयान
तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना,7 दिसंबर 2025— प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने हालिया X (Twitter) पोस्ट में भारत की तेज़ आर्थिक प्रगति पर टिप्पणी करते हुए कहा कि जब भारत की ग्रोथ धीमी होती थी, तब उसे हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ” कहकर हमारी आस्था के साथ जोड़ा गया.उन्होंने इसे गुलामी की मानसिकता का परिणाम बताया और कहा कि आज जब भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है, तब वही शब्दावली कहीं नहीं दिखाई देती है.
यह बयान सिर्फ एक टिप्पणी नहीं है, बल्कि भारत की आर्थिक विकास यात्रा, वैश्विक दृष्टिकोण, और विचारधारात्मक आख्यानों पर एक गहरा प्रश्न भी खड़ा करता है.
हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ शब्द की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ शब्द का उपयोग 1970 के दशक में अर्थशास्त्री राज कृष्णा ने किया था. इस शब्द का मकसद यह दिखाना था कि भारत की विकास दर (लगभग 3–4%) बहुत धीमी है. हालांकि बाद के वर्षों में यह शब्द आलोचनात्मक और सांप्रदायिक छवि भी बनाने लगा था .
इस शब्द पर कई अर्थशास्त्रियों ने आपत्ति भी जताई, क्योंकि,
आर्थिक नीतियों की वजह से हुई धीमी ग्रोथ को किसी धर्म से जोड़ना वैज्ञानिक नहीं था.
इससे एक संप्रदाय को झूठे ढंग से आर्थिक पिछड़ेपन के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता था.
यह औपनिवेशिक मानसिकता और विभाजनकारी सोच का हिस्सा बन गया था.
प्रधानमंत्री मोदी का बयान इस संदर्भ को सीधे चुनौती देता है.
आज भारत की ग्रोथ और बदलती धारणा
प्रधानमंत्री मोदी ने लिखा कि जब भारत की विकास दर तेज़ है, तब कोई इसे हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ नहीं कहता है .
यह बात आधुनिक भारत की आर्थिक स्थिति को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है.
भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल
पिछले कई वर्षों से भारत 6–8% की औसत GDP ग्रोथ बनाए हुए है.
यह कई बड़े एशियाई देशों से काफी आगे है.
भारत में व्यापक आर्थिक सुधार
डिजिटल इकोनॉमी का विस्तार
गरीबों को सीधे बैंकिंग और DBT से जोड़ना
GST और IBC जैसे संरचनात्मक सुधार
स्टार्टअप और नवाचार संस्कृति का तेज़ विकास
इन सभी ने मिलकर भारत की आर्थिक रफ्तार बढ़ाई है.
वैश्विक संस्थाओं की बदलती राय
जहां पहले भारत को एक धीमी, जटिल और नौकरशाही से जकड़ी अर्थव्यवस्था’ कहा जाता था,
आज वही IMF, World Bank, OECD, Morgan Stanley आदि भारत को अगले दशक की आर्थिक शक्ति बताते हैं.
प्रधानमंत्री मोदी का बयान क्यों महत्वपूर्ण है?
औपनिवेशिक शब्दावली की समीक्षा
मोदी का कहना है कि गुलामी की मानसिकता के कारण कमजोर ग्रोथ को धर्म से जोड़कर पेश किया गया.
यह भारत के मनोवैज्ञानिक और सामाजिक विकास की बहस को नई दिशा देता है.
नैरेटिव बदलने की कोशिश
यह बयान भारत के आर्थिक विमर्श को नकारात्मकता से हटाकर आत्मविश्वास और उपलब्धियों की ओर ले जाता है.
भारत की आस्था को तटस्थ और सम्मानजनक दृष्टि देने की मांग
ग्रोथ को धर्म से जोड़ना न केवल गलत था बल्कि इसका उद्देश्य भारत की पहचान को कमजोर करना भी माना जा सकता है.
क्या आज हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ का सिद्धांत अप्रासंगिक हो चुका है?
भारत की वर्तमान स्थिति पर नज़र डालें तो स्पष्ट रूप से दिखता है कि,
जनसांख्यिकी लाभांश
कौशलयुक्त युवा
तकनीकी प्रगति
उभरते उद्योग
तेज़ी से बढ़ता निवेश
इन सबके बीच हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ जैसा शब्द आज के भारत पर लागू होना असंभव है.
यह शब्द न तो वर्तमान पर फिट बैठता है और न ही यह किसी वैज्ञानिक आर्थिक विश्लेषण का हिस्सा माना जा सकता है.
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भारत की तेज़ ग्रोथ किन कारणों से अलग है?
डिजिटल इंडिया की क्रांति
UPI, आधार, और डिजिटल भुगतान ने आर्थिक संरचना को नई ऊर्जा दी है.
बुनियादी ढांचे में ऐतिहासिक निवेश
सड़क, रेल, पोर्ट, एयरपोर्ट, लॉजिस्टिक्स — हर क्षेत्र में तेजी से सुधार.
ग्लोबल सप्लाई चेन में भारत की उभरती भूमिका
चीन +1 रणनीति के बाद दुनिया भारत को एक बड़े विनिर्माण हब के रूप में देख रही है.
लोकल से ग्लोबल तक मेक इन इंडिया
मोबाइल निर्माण से लेकर रक्षा उत्पादन तक भारत ने नई ऊंचाइयां छुई हैं.
निष्कर्ष
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह बयान सिर्फ एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं है.
यह भारत की अर्थव्यवस्था और पहचान पर गहराई से सोचने के लिए प्रेरित करता है.
हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ जैसी अवधारणाएं एक दौर की सोच थीं,
लेकिन आज का भारत उनसे कहीं आगे निकल चुका है.
भारत की तेज़ ग्रोथ, बढ़ती वैश्विक अहमियत और सुधारों की लंबी सूची दिखाती है कि
अब पुराने नैरेटिव को चुनौती देने और नई आर्थिक कहानी लिखने का समय आ गया है.
भारत आज सिर्फ बढ़ नहीं रहा, बल्कि तेजी से आगे बढ़ रहा है ,
और यही नया भारत का आत्मविश्वास है.

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