सोनिया गांधी के संसद वक्तव्य से समझिए रोजगार गारंटी का असली अर्थ
तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना,23 दिसंबर — भारत के संसदीय इतिहास में कुछ दिन ऐसे होते हैं जो केवल तारीख नहीं, बल्कि नीति, नीयत और सामाजिक बदलाव का प्रतीक बन जाता हैं.ऐसा ही एक दिन था जब संसद से नेशनल रूरल एंप्लॉयमेंट गारंटी कानून (मनरेगा) पारित हुआ। इस अवसर पर लोकसभा में दिया गया श्रीमती सोनिया गांधी का वक्तव्य आज भी सामाजिक न्याय, ग्रामीण सशक्तिकरण और संवैधानिक जिम्मेदारी का मजबूत दस्तावेज माना जाता है.
मनरेगा केवल एक सरकारी योजना नहीं थी, बल्कि यह गरीब और ग्रामीण नागरिकों को सम्मान के साथ जीने का अधिकार देने की दिशा में उठाया गया ऐतिहासिक कदम था.
कांग्रेस का वादा और UPA का संकल्प
सोनिया गांधी ने अपने भाषण में स्पष्ट कहा कि मनरेगा, कांग्रेस पार्टी के 2004 के घोषणा पत्र का सबसे महत्वपूर्ण वादा था.साथ ही यह UPA सरकार के नेशनल कॉमन मिनिमम प्रोग्राम (NCMP) का भी केंद्रीय संकल्प था.
उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि भारत की लगभग दो-तिहाई आबादी गांवों में रहती है, जहां रोजगार की भारी कमी है और बुनियादी ढांचे की हालत कमजोर है.मनरेगा को इन दोनों समस्याओं,बेरोजगारी और ग्रामीण इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी—का एक साथ समाधान मानकर तैयार किया गया.
रोजगार: योजना नहीं, कानूनी अधिकार
मनरेगा की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि यह एग्जीक्यूटिव स्कीम नहीं बल्कि लीगल गारंटी पर आधारित कानून है.
इसका अर्थ है,
ग्रामीण नागरिकों को रोजगार मांगने का कानूनी हक.
काम न मिलने पर सरकार की जवाबदेही तय,
रोजगार को दया नहीं, अधिकार के रूप में मान्यता,
सोनिया गांधी ने इसे महाराष्ट्र की रोजगार गारंटी योजना की तर्ज पर तैयार बताया, जहां कानून के तहत रोजगार दिया जाता था.
मनरेगा की वैचारिक पृष्ठभूमि
अपने वक्तव्य में सोनिया गांधी ने बताया कि रोजगार गारंटी का विचार अचानक नहीं आया, बल्कि इसके पीछे दशकों का अनुभव और प्रयास रहा है.
1970 के दशक में महाराष्ट्र में वसंतराव नाइक द्वारा रोजगार गारंटी योजना.
1980 में इंदिरा गांधी द्वारा ग्रामीण भूमिहीन रोजगार कार्यक्रम.
1987 में राजीव गांधी की जवाहर रोजगार योजना.
1993 में डॉ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल में रोजगार आश्वासन योजना.
इन सभी योजनाओं में रोजगार की कार्यकारी गारंटी थी, लेकिन मनरेगा पहली योजना थी जिसने रोजगार को कानून का रूप दिया.
व्यापक विमर्श और लोकतांत्रिक प्रक्रिया
मनरेगा विधेयक को तैयार करने से पहले, सामाजिक कार्यकर्ताओं, स्वयंसेवी संस्थाओं, अनुभवी प्रशासकों, ग्रामीण समुदायों ,के साथ व्यापक विचार-विमर्श किया गया.
स्टैंडिंग कमेटी, विभिन्न मंत्रालयों और सार्वजनिक बहसों के बाद यह कानून अस्तित्व में आया.सोनिया गांधी ने इसे राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर समाज और सरकार के सहयोग का उदाहरण बताया.
काम के बदले अनाज: मानवीय सोच की शुरुआत
मनरेगा से पहले UPA सरकार ने काम के बदले अनाज कार्यक्रम को देश के 150 सबसे पिछड़े जिलों में लागू किया.
उस समय देश के गोदामों में 60 मिलियन टन से अधिक अनाज मौजूद था, लेकिन कई राज्य सूखे और भुखमरी से जूझ रहे थे.
सोनिया गांधी ने अपने वक्तव्य में यह भी कहा कि कांग्रेस ने NDA सरकार से बार-बार आग्रह किया था कि इस अनाज का उपयोग लोगों की जान बचाने के लिए किया जाए, लेकिन उस आग्रह को नजरअंदाज किया गया.
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महिलाओं और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
महाराष्ट्र की रोजगार गारंटी योजना का उदाहरण देते हुए सोनिया गांधी ने बताया कि,
मजदूरी दरों में बढ़ोतरी
महिलाओं की भागीदारी 40–50% तक
महिलाओं के जीवन स्तर में सुधार
सिंचाई सुविधाओं का विस्तार
1990 के दशक में लगभग 10 लाख हेक्टेयर भूमि को बागवानी योग्य बनाया गया
यही मॉडल मनरेगा के माध्यम से राष्ट्रीय स्तर पर लागू हुआ, जिसने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती दी.
निष्कर्ष
मनरेगा कानून भारतीय लोकतंत्र की उस भावना का प्रतीक है, जिसमें गरीब को अधिकार और सरकार को जिम्मेदारी दी जाती है.
सोनिया गांधी का यह संसद वक्तव्य आज भी याद दिलाता है कि विकास केवल आंकड़ों से नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा और अवसरों की समानता से मापा जाता है.
मनरेगा ने ग्रामीण भारत को आवाज़ दी,
और उस आवाज़ को कानूनी ताकत दी.

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