ग्रामीण रोजगार और संविधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए सड़कों पर उतरे मजदूर-किसान
तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना, 22 दिसंबर 2025 — ग्रामीण भारत के सबसे महत्वपूर्ण रोजगार सुरक्षा कानून मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम) की पुनर्बहाली, उसकी जगह लाए गए ग्रामजी (विकसित भारत–गारंटी फॉर रोजगार एवं आजीविका मिशन ग्रामीण) कानून को रद्द करने और गरीबों पर हो रही बुलडोजर कार्रवाई पर तत्काल रोक की मांग को लेकर खेग्रामस के बैनर तले बिहार भर में राज्यव्यापी विरोध प्रदर्शन आयोजित किया गया.
इस व्यापक आंदोलन का मुख्य केंद्र राजधानी पटना रहा, जहां स्टेशन गोलंबर के पास हजारों मजदूर, किसान, ग्रामीण गरीब और सामाजिक कार्यकर्ता एकजुट होकर सरकार की नीतियों के खिलाफ सड़क पर उतरे.प्रदर्शन ने यह स्पष्ट कर दिया कि ग्रामीण रोजगार और सम्मानजनक आजीविका का सवाल अब केवल नीति नहीं, बल्कि अस्तित्व का प्रश्न बन चुका है.
पटना में हुआ जोरदार प्रदर्शन, कई प्रमुख नेता रहे मौजूद
पटना में हुए प्रदर्शन में खेग्रामस के महासचिव धीरेंद्र झा, अध्यक्ष सत्यदेव राम, विधान परिषद सदस्य शशि यादव, पूर्व विधायक गोपाल रविदास, शत्रुघ्न साहनी, वंदना प्रभा, अकलू पासवान, जितेंद्र कुमार, केडी यादव, उमेश सिंह, आर.एन. ठाकुर, सत्यनारायण प्रसाद, नागेश्वर पासवान, मुर्तजा अली, प्रमोद यादव सहित अनेक जनप्रतिनिधि और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हुए.
प्रदर्शनकारियों के हाथों में तख्तियां थीं, जिन पर मनरेगा हमारा अधिकार है, ग्रामजी नहीं, रोजगार की गारंटी चाहिए और बुलडोजर नहीं, इंसाफ चाहिए जैसे नारे लिखे थे.
मनरेगा: ग्रामीण गरीबों की जीवनरेखा
वक्ताओं ने कहा कि मनरेगा देश का सबसे बड़ा और सबसे प्रभावी ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून रहा है, जिसने करोड़ों गरीब परिवारों को न्यूनतम रोजगार, आय की सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन का सहारा दिया.यह कानून केवल रोजगार ही नहीं, बल्कि संविधान में निहित सामाजिक न्याय और समानता के सिद्धांतों का भी प्रतीक है.
लेकिन बीते वर्षों में केंद्र सरकार की नीतियों के कारण मनरेगा को जानबूझकर कमजोर किया गया है. बजट में कटौती, समय पर भुगतान न होना और काम के अवसर सीमित करना इसके उदाहरण हैं. अब ग्रामजी कानून के जरिए मनरेगा को पूरी तरह समाप्त करने की कोशिश को मजदूरों के अधिकारों पर सीधा हमला बताया गया है.
ग्रामजी कानून: दिखावटी वादे, खोखली गारंटी
खेग्रामस नेताओं ने ग्रामजी कानून की कड़ी आलोचना करते हुए कहा है कि इसमें रोजगार की कोई ठोस कानूनी गारंटी नहीं है.सरकार द्वारा 100 से 125 दिन काम देने का दावा केवल कागजी है, जबकि जमीनी हकीकत यह है कि आज भी मजदूरों को साल में 40–50 दिन से अधिक काम नहीं मिल पा रहा है.
इसके अलावा कृषि मौसम में काम रोकने, मजदूरी का बोझ राज्यों पर डालने, पंचायती राज संस्थाओं को कमजोर करने और न्यूनतम मजदूरी की संवैधानिक गारंटी को खत्म करने जैसे प्रावधान ग्रामीण गरीबों को और अधिक असुरक्षित बनाता हैं.
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बुलडोजर कार्रवाई पर उठा सवाल
प्रदर्शन के दौरान गरीबों और मजदूरों पर हो रही बुलडोजर कार्रवाई का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया गया. वक्ताओं ने कहा कि बिना उचित कानूनी प्रक्रिया के घर और रोज़गार छीनना संविधान, कानून और मानवाधिकारों का खुला उल्लंघन है.
उनका कहना था कि विकास के नाम पर गरीबों को उजाड़ना किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्वीकार्य नहीं हो सकता.रोजगार और आवास दोनों पर हमला कर सरकार सामाजिक असमानता को और गहरा कर रही है.
खेग्रामस की प्रमुख मांगें
राज्यव्यापी प्रदर्शन के माध्यम से खेग्रामस ने केंद्र सरकार से स्पष्ट रूप से मांग की कि,
मनरेगा की तत्काल पुनर्बहाली की जाए और इसे और मजबूत किया जाए.
ग्रामजी कानून को बिना किसी देरी के रद्द किया जाए.
मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी और समय पर भुगतान की कानूनी गारंटी दी जाए.
गरीबों पर हो रही बुलडोजर कार्रवाई पर तुरंत रोक लगाई जाए.
अधिकारों की लड़ाई जारी रहेगी
अंत में खेग्रामस ने मजदूरों, किसानों और ग्रामीण गरीबों से अपील किया कि वे अपने अधिकारों की रक्षा के लिए एकजुट रहें. संगठन ने साफ कहा कि मनरेगा और श्रम अधिकारों पर हो रहे हमलों के खिलाफ यह संघर्ष आगे भी जारी रहेगा, और जरूरत पड़ी तो आंदोलन को और व्यापक रूप दिया जाएगा.
यह प्रदर्शन केवल विरोध नहीं, बल्कि ग्रामीण भारत की आवाज़ था—रोज़गार, सम्मान और न्याय की आवाज़.

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