बेटियों की लड़ाई रंग लाई: कुलदीप सिंह सेंगर की ज़मानत रद्द
तीसरा पक्ष ब्यूरो 29 दिसंबर 2025— पटना देश की न्याय व्यवस्था पर जब-जब सवाल खड़ा हुआ हैं, तब-तब जनआंदोलनों ने उसे आईना दिखाया है. उन्नाव रेप पीड़िता को न्याय दिलाने की लड़ाई में छात्र संगठन आइसा (AISA) का आंदोलन इसी जनसंघर्ष की एक मिसाल बनकर सामने आया है. बीजेपी के पूर्व विधायक और रेप व हत्या के दोषी कुलदीप सिंह सेंगर की ज़मानत रद्द होना केवल एक कानूनी फैसला नहीं, बल्कि देश की उन तमाम बेटियों की जीत है जो न्याय के लिए सालों तक संघर्ष करने को मजबूर होती हैं.
ज़मानत रद्द होना: न्याय की दिशा में अहम कदम
उन्नाव रेप केस ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था. एक तरफ सत्ता का संरक्षण, दूसरी तरफ पीड़िता और उसके परिवार पर लगातार हमले,यह मामला न्याय व्यवस्था की सबसे कठिन परीक्षाओं में से एक था. ऐसे में दोषी को सज़ा निलंबन या ज़मानत मिलना आम जनता के भरोसे को तोड़ने जैसा था.
सुप्रीम कोर्ट द्वारा कुलदीप सिंह सेंगर की आजीवन कारावास की सज़ा को बरकरार रखना और ज़मानत रद्द करना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि अब कानून सत्ता और प्रभाव से ऊपर खड़ा होने का साहस दिखा रहा है.
पटना में आइसा का रोषपूर्ण प्रदर्शन
इसी फैसले को लेकर और सज़ा निलंबन के विरोध में आइसा ने पटना के कारगिल चौक के पास जोरदार प्रदर्शन किया. यह प्रदर्शन केवल एक विरोध नहीं था, बल्कि न्याय की मांग को सड़कों तक ले जाने की प्रतिबद्धता का प्रतीक था.
पटना यूनिवर्सिटी आइसा नेताओं ऋषि कुमार और विश्वजीत कुमार ने संयुक्त बयान जारी कर कहा कि मौजूदा शासन और न्यायिक ढांचे में अक्सर अपराधियों को राजनीतिक संरक्षण मिलता रहा है, जिससे पीड़िताओं को बार-बार संघर्ष करना पड़ता है.
सत्ता-संरक्षण और न्याय पर सवाल
आइसा नेताओं ने आरोप लगाया कि देश में ऐसे कई उदाहरण मौजूद हैं जहां रेप जैसे जघन्य अपराधों में दोषियों को संरक्षण दिया गया.
चाहे बीएचयू गैंगरेप, बिलकिस बानो केस में दोषियों की रिहाई, या फिर आसाराम और राम रहीम जैसे मामलों में विशेष सुविधाएं.इन सभी घटनाओं ने यह सवाल खड़ा किया है कि क्या कानून सबके लिए बराबर है?
उन्नाव की पीड़िता के मामले में भी सत्ता का दबाव, गवाहों पर हमले और परिवार को डराने की कोशिशें इसी मानसिकता को उजागर करता हैं.
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पीड़िता की लड़ाई, पूरे देश की आवाज़
उन्नाव रेप पीड़िता की यह लड़ाई केवल व्यक्तिगत नहीं था.यह देश की हर उस महिला की लड़ाई बन गई जो असुरक्षा और अन्याय के खिलाफ खड़ी होना चाहती है.
यह कल्पना तक भयावह है कि एक दोषी बाहर रहे और पीड़िता न्याय की गुहार लगाती रहे. यही कारण है कि आइसा ने इस मुद्दे को सड़क से लेकर संसद तक उठाया और जनदबाव बनाया.
आइसा का संघर्ष और जनदबाव की ताकत
आइसा का आंदोलन इस बात का प्रमाण है कि संगठित छात्र-युवा शक्ति जब अन्याय के खिलाफ एकजुट होती है, तो सत्ता को झुकना पड़ता है.
दोषी की गिरफ्तारी, सज़ा सुनिश्चित करने और सत्ता-संरक्षण के खिलाफ लगातार आवाज़ उठाकर आइसा ने यह दिखाया कि लोकतंत्र में जनता की ताकत अभी ज़िंदा है.
न्याय व्यवस्था में भरोसे की वापसी
कुलदीप सिंह सेंगर की ज़मानत रद्द होना न्याय व्यवस्था में आम जनता के भरोसे को मजबूत करता है.यह फैसला स्पष्ट संदेश देता है कि बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों में दोषी चाहे कितना भी ताकतवर क्यों न हो, उसे सज़ा से बचाया नहीं जा सकता.
यह निर्णय न केवल उन्नाव की पीड़िता के संघर्ष को सम्मान देता है, बल्कि देश की सभी सर्वाइवरों को यह भरोसा भी दिलाता है कि लंबी और कठिन लड़ाई के बाद भी न्याय संभव है.
निष्कर्ष
उन्नाव रेप केस में आया यह फैसला भारतीय लोकतंत्र और न्याय व्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ है.आइसा के आंदोलन ने यह साबित कर दिया कि जब जनता संगठित होकर अन्याय के खिलाफ खड़ी होती है, तो बदलाव संभव है.
यह जीत सिर्फ एक संगठन की नहीं, बल्कि देश की उन सभी बेटियों की है जो न्याय, सुरक्षा और सम्मान के साथ जीने का अधिकार मांग रही हैं.

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