उन्नाव रेप केस: सेंगर केस से क्या सबक लेगा राजनीतिक तंत्र और समाज?

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Advocate Ajit Kumar

भारततीसरा पक्ष आलेख
उन्नाव रेप केस: सेंगर केस से क्या सबक लेगा राजनीतिक तंत्र और समाज?

सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख,भारतीय न्यायपालिका की नैतिक जिम्मेदारी?

तीसरा पक्ष डेस्क,नई दिल्ली, 29 दिसंबर 2025: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को 2017 के चर्चित उन्नाव बलात्कार मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी, जिसमें पूर्व बीजेपी विधायक कुलदीप सिंह सेंगर की उम्रकैद की सजा निलंबित कर उन्हें अपील लंबित रहने तक जमानत दे दी गई थी. मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली तीन जजों की बेंच ने यह फैसला सुनाया, जिसमें जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस ऑगस्टाइन जॉर्ज मसीह भी शामिल थे.

उन्नाव बलात्कार मामले में सुप्रीम कोर्ट का ताज़ा फैसला न सिर्फ कानूनी दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह भारतीय न्याय व्यवस्था की संवेदनशीलता और जवाबदेही को भी रेखांकित करता है. दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को जमानत दिए जाने के आदेश पर रोक लगाकर शीर्ष अदालत ने साफ संदेश दिया है कि गंभीर अपराधों में “तकनीकी आधार” पर राहत देना न्याय के मूल उद्देश्य के खिलाफ हो सकता है.

क्यों अहम है सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश

उन्नाव रेप केस: सेंगर केस से क्या सबक लेगा राजनीतिक तंत्र और समाज?

2017 के इस चर्चित मामले में सेंगर को नाबालिग से बलात्कार का दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी. हाईकोर्ट ने अपील लंबित रहने तक सजा निलंबित कर जमानत दे दी थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने रोक दिया. अदालत ने स्पष्ट किया कि आम तौर पर जमानत मिलने के बाद किसी दोषी को फिर से जेल भेजना असाधारण स्थिति होती है, लेकिन यहां परिस्थितियां अलग हैं। सेंगर पहले से ही पीड़िता के पिता की हिरासत में मौत से जुड़े मामले में सजा काट रहे हैं, इसलिए उन्हें रिहा करने का सवाल ही नहीं उठता.

यह टिप्पणी बताती है कि अदालत ने केवल प्रक्रिया नहीं, बल्कि मामले की संपूर्ण पृष्ठभूमि और सामाजिक प्रभाव को भी ध्यान में रखा.

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POCSO एक्ट और ‘पब्लिक सर्वेंट’ की बहस

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सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा कानूनी सवाल उठाया—क्या विधायक जैसे जनप्रतिनिधि POCSO एक्ट के तहत ‘पब्लिक सर्वेंट’ की श्रेणी में आते हैं या नहीं? दिल्ली हाईकोर्ट ने माना था कि सेंगर इस परिभाषा में नहीं आते, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क पर गंभीर सवाल खड़े किए.

यदि जनप्रतिनिधियों को इस कानून के तहत छूट दी जाती है, तो यह नाबालिगों की सुरक्षा के उद्देश्य को कमजोर कर सकता है. अदालत की यह टिप्पणी भविष्य में ऐसे मामलों की दिशा तय करने वाली साबित हो सकती है.

पीड़िता के लिए राहत, व्यवस्था के लिए संदेश

पीड़िता और उसके परिवार के लिए यह फैसला बड़ी राहत लेकर आया है. लंबे समय से न्याय की लड़ाई लड़ रहे परिवार के लिए यह संकेत है कि सर्वोच्च न्यायालय पीड़ित पक्ष की आवाज़ को अनदेखा नहीं करेगा.पीड़िता द्वारा न्याय व्यवस्था में विश्वास जताना इस बात का प्रमाण है कि अदालतों के फैसले केवल कानूनी नहीं, बल्कि मानवीय असर भी रखते हैं.

क्या कानून सबके लिए बराबर है?

यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति की जमानत या सजा तक सीमित नहीं है. यह उस सोच की परीक्षा है जिसमें ताकतवर और प्रभावशाली लोगों को कानून से ऊपर मान लिया जाता है. सुप्रीम कोर्ट का यह रुख साफ करता है कि बच्चों के यौन शोषण जैसे गंभीर अपराधों में कोई नरमी नहीं बरती जानी चाहिए, चाहे आरोपी कितना ही प्रभावशाली क्यों न हो.

निष्कर्ष

उन्नाव रेप केस में सुप्रीम कोर्ट का फैसला न्यायिक प्रक्रिया में संतुलन और संवेदनशीलता का उदाहरण है. यह आदेश न सिर्फ पीड़िता के लिए न्याय की उम्मीद को मजबूत करता है, बल्कि भविष्य के लिए यह संदेश भी देता है कि कानून का उद्देश्य कमजोर की रक्षा करना है, न कि ताकतवर को राहत देना.

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