UP Board Exam Center विवाद: 28 KM दूर भेजी छात्राएं

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Ajit Kumar

भारत
UP Board Exam Center विवाद: 28 KM दूर भेजी छात्राएं

UP Board परीक्षा केंद्र नियमों का उल्लंघन? बेटियां परेशान

तीसरा पक्ष ब्यूरो यूपी ,5 जनवरी — उत्तर प्रदेश बोर्ड परीक्षाएँ लाखों विद्यार्थियों के भविष्य का आधार होती हैं. लेकिन जब परीक्षा व्यवस्था ही सवालों के घेरे में आ जाये, तो यह केवल प्रशासनिक चूक नहीं रह जाती है , बल्कि सामाजिक और संवैधानिक चिंता का विषय भी बन जाती है. भीम आर्मी प्रमुख और नगीना से सांसद चंद्रशेखर आज़ाद ने अपने आधिकारिक X (Twitter) हैंडल @BhimArmyChief के माध्यम से यूपी बोर्ड परीक्षा केंद्रों के निर्धारण पर गंभीर सवाल उठाये हैं. उनका आरोप है कि बिना भौतिक सत्यापन, केवल गूगल मैप के आधार पर ऐसे परीक्षा केंद्र बना दिया गया हैं, जो बोर्ड के तय मानकों का खुला उल्लंघन हैं,और इसका सबसे बड़ा खामियाजा छात्राओं को भुगतना पड़ रहा है.

क्या कहता है यूपी बोर्ड का नियम?

यूपी बोर्ड के स्पष्ट दिशा-निर्देशों के अनुसार छात्राओं का परीक्षा केंद्र उनके विद्यालय से अधिकतम 7 किलोमीटर की दूरी पर होना चाहिये.विशेष परिस्थितियों में यह दूरी 15 किलोमीटर तक बढ़ाई जा सकती है. इसका उद्देश्य साफ है कि,

छात्राओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना,

लंबी और असुरक्षित यात्रा से मानसिक-शारीरिक तनाव कम करना,

परीक्षा में समान अवसर उपलब्ध कराना, लेकिन जमीनी हकीकत इन नियमों से मेल नहीं खा रहा है.

लखनऊ का निगोहा मामला: नियमों का खुला उल्लंघन

चंद्रशेखर आज़ाद द्वारा उठाया गया उदाहरण बेहद गंभीर है. लखनऊ के निगोहा स्थित एसबीएन इंटर कॉलेज की छात्राओं को परीक्षा देने के लिए 28 किलोमीटर दूर भेजा जा रहा है. यह दूरी न सिर्फ बोर्ड के नियमों का उल्लंघन है, बल्कि छात्राओं की गरिमा और सुरक्षा के साथ सीधा खिलवाड़ भी है.

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि, छात्रों के लिए पास में परीक्षा केंद्र, छात्राओं के लिए दूरस्थ और असुरक्षित केंद्र.

यह भेदभाव प्रशासन की संवेदनशीलता पर बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करता है.

ग्रामीण और शहरी इलाकों में एक-सी समस्या

यह मामला केवल लखनऊ तक सीमित नहीं है. प्रदेश के कई शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों से ऐसी रिपोर्टें सामने आ रही हैं, जहाँ बेटियों को 20 से 28 किलोमीटर तक की यात्रा करने को मजबूर किया जा रहा है.
इन रास्तों पर, न तो पर्याप्त सार्वजनिक परिवहन है, न ही सुरक्षा की कोई ठोस व्यवस्था.

अभिभावकों की चिंताओं को नज़रअंदाज़ किया जा रहा है.

यह स्थिति परीक्षा को ज्ञान की नहीं, बल्कि हिम्मत और संघर्ष की परीक्षा बना रही है.

आपत्ति के बावजूद नहीं बदले गए केंद्र

पोस्ट के अनुसार, संबंधित विद्यालयों और अभिभावकों ने डीआईओएस (जिला विद्यालय निरीक्षक) कार्यालय में लिखित आपत्ति दर्ज कराई. इसके बावजूद परीक्षा केंद्रों में कोई बदलाव नहीं किया गया है.
यह दर्शाता है कि, प्रशासन की हठधर्मिता, समस्याओं के प्रति असंवेदनशील रवैया, जवाबदेही से बचने की प्रवृत्ति.

जब शिकायतों को भी अनसुना किया जाए, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था की आत्मा के खिलाफ है.

मुख्यमंत्री से सीधा सवाल

चंद्रशेखर आज़ाद ने यह मुद्दा सीधे माननीय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के समक्ष रखा है. उनका सवाल बेहद सीधा और असरदार है,
क्या बेटियों की परीक्षा, उनकी सुरक्षा से बड़ी है?

यह सवाल सिर्फ एक नेता का नहीं, बल्कि हर उस अभिभावक का है, जिसकी बेटी रोज़ाना असुरक्षित रास्तों से परीक्षा देने जा रही है.

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भीम आर्मी की प्रमुख माँगें

इस पूरे मामले में @BhimArmyChief ने उत्तर प्रदेश सरकार से स्पष्ट माँगें रखी हैं,

छात्राओं के परीक्षा केंद्र बोर्ड के मानकों के अनुरूप नज़दीक किया जाये .

दूरस्थ और अव्यवहारिक परीक्षा केंद्र तुरंत निरस्त किया जाये .

जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाये.

भविष्य में केंद्र निर्धारण से पहले भौतिक सत्यापन अनिवार्य किया जाये.

यह सिर्फ परीक्षा नहीं, सामाजिक न्याय का सवाल

भारत में शिक्षा को समानता का सबसे बड़ा औज़ार माना जाता है.लेकिन जब व्यवस्था ही बेटियों के लिए बाधा बन जाये , तो यह लैंगिक न्याय, सुरक्षा और अधिकारों का मुद्दा बन जाता है.
यदि समय रहते इस पर कार्रवाई नहीं हुई, तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं,

छात्राओं का परीक्षा छोड़ना, मानसिक दबाव और ड्रॉप-आउट दर में वृद्धि, प्रशासन पर जनविश्वास में कमी.

निष्कर्ष

यूपी बोर्ड परीक्षा केंद्रों का यह मामला केवल एक प्रशासनिक गलती नहीं, बल्कि नीतिगत विफलता का संकेत है. चंद्रशेखर आज़ाद द्वारा उठाई गई यह आवाज़ उन हजारों छात्राओं की आवाज़ है, जो चुपचाप असुरक्षा के बीच अपने भविष्य की परीक्षा दे रही हैं.
अब यह सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वे जल्द से जल्द इस मुद्दे पर ठोस कदम उठाये, ताकि परीक्षा ज्ञान की कसौटी बने—न कि बेटियों की हिम्मत की.

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