भारत का वैश्य समाज संकट में: छोटे व्यापारियों की पीड़ा और राहुल गांधी की चेतावनी

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Ajit Kumar

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भारत का वैश्य समाज संकट में: छोटे व्यापारियों की पीड़ा और राहुल गांधी की चेतावनी

हमारा व्यापार खत्म होने की कगार पर है – एक सिसकती सच्चाई

तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना,25 दिसंबर — भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले छोटे और मध्यम व्यापारी आज गंभीर संकट से गुजर रहा हैं.हाल ही में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने व्यापार संवाद के दौरान वैश्य समाज की पीड़ा को सामने रखते हुए एक तीखा और चिंताजनक संदेश दिया है. उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि जिस समाज ने सदियों से देश की आर्थिक धुरी को संभाला, आज वही समाज हताशा, भय और अनिश्चितता में जी रहा है.यह केवल व्यापारियों की समस्या नहीं, बल्कि भारत के भविष्य के लिए खतरे की घंटी है.

वैश्य समाज: भारतीय अर्थव्यवस्था की ऐतिहासिक रीढ़

भारत में वैश्य समाज का योगदान केवल व्यापार तक सीमित नहीं रहा है.

आज़ादी से पहले स्वदेशी आंदोलन

देश के कोने-कोने में रोजगार सृजन

MSME सेक्टर की मजबूती

स्थानीय बाजारों और सप्लाई चेन का संचालन

इन सबमें वैश्य समाज की भूमिका निर्णायक रहा है. छोटे दुकानदार, थोक व्यापारी, कारीगर, उद्योगपति – यही वर्ग ग्रामीण और शहरी अर्थव्यवस्था को जोड़ने वाली कड़ी रहा है.

हमारा व्यापार खत्म होने की कगार पर है – एक सिसकती सच्चाई

राहुल गांधी ने व्यापार संवाद में जो बात सुनी, वह केवल एक शिकायत नहीं थी, बल्कि हजारों-लाखों व्यापारियों की सामूहिक पीड़ा थी.
बढ़ती महंगाई, घटती मांग, ऑनलाइन मोनोपॉली, टैक्स का बोझ और प्रशासनिक जटिलताओं ने छोटे व्यापारियों को दम घुटने की स्थिति में ला खड़ा किया है.

Monopoly को खुली छूट, छोटे व्यापारी जंजीरों में

राहुल गांधी ने सीधे तौर पर सरकार की नीतियों पर सवाल उठाए.उनका कहना है कि,

बड़े कॉरपोरेट और मोनोपॉली कंपनियों को खुली छूट दी जा रही है.

छोटे-मध्यम व्यापारियों को GST की जटिलताओं में उलझा दिया गया है.

ब्यूरोक्रेसी, नोटिस, पेनल्टी और नियमों की मार से व्यापारी टूट रहे हैं.

जब बाजार पर कुछ चुनिंदा कंपनियों का कब्ज़ा हो जाता है, तो प्रतिस्पर्धा खत्म होती है और स्थानीय व्यापार दम तोड़ने लगता है.

गलत GST और प्रशासनिक आतंक

GST को एक देश, एक कर कहा गया, लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे अलग है.

बार-बार नियम बदलना

तकनीकी समस्याएं

छोटे व्यापारियों पर भारी जुर्माने

रिटर्न फाइलिंग की जटिल प्रक्रिया

इन सबने व्यापार को आसान नहीं, बल्कि और कठिन बना दिया. राहुल गांधी ने इसे साफ तौर पर नीतिगत विफलता बताया.

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यह सिर्फ व्यापार नहीं, रोजगार पर हमला है.

छोटा व्यापारी जब बंद होता है, तो.

कई परिवारों की रोज़ी-रोटी छिन जाती है

स्थानीय रोजगार खत्म होता है

उत्पादन और सप्लाई चेन टूटती है

राहुल गांधी के शब्दों में, यह केवल नीति की गलती नहीं, बल्कि उत्पादन, रोजगार और भारत के भविष्य पर सीधा हमला है.

BJP सरकार की सामंतवादी सोच पर सवाल

राहुल गांधी ने मौजूदा सरकार की सोच को सामंतवादी करार दिया है.उनका आरोप है कि,

सत्ता कुछ बड़े घरानों के हित में काम कर रही है.

आम व्यापारी, किसान और मजदूर हाशिये पर जा रहे हैं.

लोकतांत्रिक अर्थव्यवस्था की जगह कॉरपोरेट-केंद्रित मॉडल थोपा जा रहा है.

यह मॉडल न तो समावेशी है और न ही टिकाऊ.

वैश्य समाज के साथ खड़े होने का संकल्प

राहुल गांधी ने स्पष्ट कहा कि इस लड़ाई में वे देश के व्यापार की रीढ़ – वैश्य समाज – के साथ पूरी ताकत से खड़ा हैं.
उनका मानना है कि,

जब तक छोटे व्यापारी मजबूत नहीं होंगे

तब तक भारत आत्मनिर्भर नहीं बन सकता

और न ही युवाओं को स्थायी रोजगार मिल सकता है

निष्कर्ष: अब आवाज़ उठाना ज़रूरी है

आज वैश्य समाज की पीड़ा केवल एक वर्ग की समस्या नहीं रही। यह पूरी भारतीय अर्थव्यवस्था की चेतावनी है.
अगर छोटे-मध्यम व्यापार को बचाया नहीं गया, तो

बाजार कुछ हाथों में सिमट जाएगा

रोजगार घटेगा

और सामाजिक-आर्थिक असंतुलन बढ़ेगा

राहुल गांधी की यह चेतावनी केवल राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि नीति परिवर्तन की मांग है. अब ज़रूरत है कि सरकार ज़मीनी सच्चाई सुने, मोनोपॉली पर लगाम लगाए और छोटे व्यापारियों को राहत दे,वरना भारत की आर्थिक आत्मा को गहरा आघात लगेगा.

स्रोत: राहुल गांधी के X (Twitter) पोस्ट के हवाले से.

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