वंदे मातरम् के 150 वर्ष: श्रद्धा, इतिहास और राजनीति पर शिवपाल सिंह यादव का तीखा सवाल

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Ajit Kumar

भारत
वंदे मातरम् के 150 वर्ष: श्रद्धा, इतिहास और राजनीति पर शिवपाल सिंह यादव का तीखा सवाल

वंदे मातरम् के 150 वर्ष: शिवपाल सिंह यादव का सवाल और राष्ट्रवाद की सच्चाई

तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना,22 दिसंबर — भारत की आज़ादी के संघर्ष में कुछ शब्द ऐसे हैं, जो केवल शब्द नहीं रहे, बल्कि आंदोलन, बलिदान और आत्मसम्मान का प्रतीक बन गया. वंदे मातरम् उन्हीं शब्दों में से एक है. आज जब संसद में इसके 150 वर्ष पूरे होने पर चर्चा हो रही है, तो समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता शिवपाल सिंह यादव ने X (Twitter) पर एक ऐसा सवाल उठाया है, जो केवल वर्तमान राजनीति नहीं, बल्कि इतिहास की आत्मा को भी चुनौती देता है.

शिवपाल सिंह यादव का बयान: एक सीधा लेकिन गहरा प्रश्न

Shivpal Singh Yadav ने अपने X पोस्ट में लिखा कि वंदे मातरम् पर चर्चा होना स्वागतयोग्य है और यह गीत सभी के सम्मान के योग्य है. लेकिन उन्होंने यह भी पूछा कि, जो लोग आज इस गीत पर घंटों भाषण दे रहे हैं, उनके वैचारिक पूर्वज उस समय कहाँ थे, जब क्रांतिकारी वंदे मातरम् गाते हुए फाँसी के फंदों पर झूल गए थे?

यह सवाल केवल एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं है, बल्कि यह इतिहास बनाम अवसरवादी राष्ट्रवाद की बहस को जन्म देता है.

वंदे मातरम्: केवल गीत नहीं, आज़ादी का घोष

वंदे मातरम्’ की रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 1870 के दशक में की थी. यह गीत 1905 के बंग-भंग आंदोलन से लेकर 1947 तक भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की धड़कन बना रहा है .
क्रांतिकारी आंदोलनों में यह गीत केवल गाया नहीं जाता था, बल्कि इसे बोलते हुए लोग जेल गए, कोड़े खाए और फाँसी तक चढ़ गए.

इतिहास का आईना: कौन था साथ, कौन था दूर?

शिवपाल सिंह यादव के सवाल का मूल यही है कि आज जो खुद को राष्ट्रवाद का सबसे बड़ा ठेकेदार बताते हैं, उनका वैचारिक इतिहास क्या कहता है?
इतिहास के दस्तावेज़ बताते हैं कि कई संगठनों और विचारधाराओं ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान,

अंग्रेज़ी हुकूमत का खुला विरोध नहीं किया है,

वंदे मातरम्’ जैसे क्रांतिकारी नारों से दूरी बनाए रखा,

कांग्रेस और समाजवादी-क्रांतिकारी आंदोलनों को कमज़ोर करने का प्रयास किया,

ऐसे में आज संसद में खड़े होकर उसी गीत पर लंबे भाषण देना, शिवपाल सिंह यादव के अनुसार, इतिहास से कटे हुए राष्ट्रवाद का उदाहरण है.

प्रतीकों की राजनीति बनाम वास्तविक बलिदान

आज की राजनीति में प्रतीक बहुत अहम हो गया हैं—गीत, नारे, झंडे और आयोजन. लेकिन शिवपाल सिंह यादव का बयान इस ओर इशारा करता है कि,

क्या हम केवल प्रतीकों का उपयोग कर रहे हैं या उनके पीछे छिपे बलिदानों को भी ईमानदारी से स्वीकार कर रहे हैं?

जो क्रांतिकारी वंदे मातरम् कहते हुए फाँसी पर चढ़े, वे सत्ता के नहीं, संघर्ष के पक्ष में थे. उनका राष्ट्रवाद सत्ता-प्राप्ति का साधन नहीं, बल्कि आज़ादी का स्वप्न था.

संसद में चर्चा और बाहर का सच

संसद में वंदे मातरम के 150 वर्ष पर चर्चा होना निश्चित रूप से ऐतिहासिक है. लेकिन शिवपाल सिंह यादव यह सवाल उठाते हैं कि,

क्या आज की सत्ता उन्हीं मूल्यों पर चल रही है?

क्या आज असहमति को भी उतना ही सम्मान मिल रहा है, जितना आज़ादी के समय?

क्या राष्ट्रवाद अब सवाल पूछने से डरने लगा है?

उनका बयान मौजूदा राजनीतिक विमर्श को एक नई दिशा देता है.

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समाजवादी राजनीति और ऐतिहासिक चेतना

समाजवादी आंदोलन हमेशा से इतिहास की सही व्याख्या और जनसंघर्षों की स्मृति पर जोर देता रहा है. शिवपाल सिंह यादव का यह ट्वीट उसी परंपरा की कड़ी है, जहां, राष्ट्रवाद को जनता के अधिकारों से जोड़ा जाता है.

इतिहास को सत्ता की सुविधा से नहीं, सच्चाई से देखा जाता है.

बलिदान देने वालों को केवल मंचों तक सीमित नहीं किया जाता.

निष्कर्ष: सम्मान के साथ ईमानदारी भी ज़रूरी

वंदे मातरम् का सम्मान करना हर भारतीय का कर्तव्य है.लेकिन जैसा कि शिवपाल सिंह यादव ने संकेत दिया है, सम्मान तभी पूर्ण होता है जब उसके इतिहास के प्रति भी ईमानदारी हो. आज जरूरत है कि,

हम गीत को भी समझें

उसके पीछे छिपे संघर्ष को भी स्वीकारें

और राष्ट्रवाद को केवल भाषणों से नहीं, लोकतांत्रिक मूल्यों से परिभाषित करें.

शिवपाल सिंह यादव का यह बयान एक याद दिलाता है कि देशभक्ति शोर से नहीं, सत्य से मजबूत होती है.

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