स्कूल की राह दलदल बनी तो बच्चों ने 5 किमी मार्च कर कलेक्ट्रेट में दिया धरना
तीसरा पक्ष ब्यूरो यूपीः उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिले में 11 अगस्त 2026 को सामने आई एक घटना ने ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क, शिक्षा और प्रशासनिक संवेदनशीलता से जुड़े कई सवाल खड़ा कर दिया है, चंदूपुर ग्राम पंचायत और आसपास के डेरों के स्कूली बच्चे तथा ग्रामीण हाथों में तिरंगा लेकर करीब 5 किलोमीटर पैदल चलकर कलेक्ट्रेट पहुंचे.उनकी मांग बेहद बुनियादी थी—स्कूल और गांव तक पहुंचने वाली सड़क को पक्का कराया जाए.
कलेक्ट्रेट पहुंचने के बाद बच्चों और ग्रामीणों ने करीब चार घंटे तक धरना दिया. प्रदर्शन का केंद्र कोई राजनीतिक मांग नहीं, बल्कि बारिश के मौसम में दलदल में बदल जाने वाला रास्ता था. ग्रामीणों के अनुसार यह समस्या लंबे समय से बनी हुई है और कई बार अधिकारियों को शिकायत तथा ज्ञापन दिए जाने के बावजूद स्थायी समाधान नहीं हो पाया.
बरसात में स्कूल जाने की राह बन जाती है मुश्किल
चंदूपुर मार्ग जिला मुख्यालय से करीब 4 किलोमीटर की दूरी पर बताया जा रहा है. इसके बावजूद रास्ते का लगभग 1.5 से 1.6 किलोमीटर हिस्सा बरसात के दौरान बेहद खराब हो जाता है. बारिश के बाद सड़क पर कीचड़ और दलदल जैसी स्थिति बनने से पैदल आवागमन कठिन हो जाता है.
इसका सीधा असर स्कूली बच्चों पर पड़ता है. ग्रामीणों का कहना है कि बच्चे कीचड़ भरे रास्ते से होकर स्कूल जाते हैं, जिससे उनकी यूनिफॉर्म खराब हो जाती है और कई बार वे समय पर विद्यालय नहीं पहुंच पाते है. रास्ते की स्थिति ज्यादा खराब होने पर बच्चों के सामने स्कूल जाने के बजाय घर पर रुकने की मजबूरी भी पैदा हो जाती है.
यह समस्या केवल विद्यार्थियों तक सीमित नहीं है. ग्रामीणों के मुताबिक गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों और बीमार लोगों के लिए भी यह रास्ता परेशानी का कारण बनता है.आपात स्थिति में एंबुलेंस या अन्य वाहन के गांव तक पहुंचने में कठिनाई हो सकती है.
पहले भी हुई शिकायत, लेकिन स्थायी समाधान नहीं
ग्रामीणों का दावा है कि सड़क की समस्या को लेकर वे पहले भी प्रशासन के सामने अपनी बात रख चुके हैं. 3 जुलाई को भी प्रदर्शन किया गया था.इसके बाद रास्ते को चलने लायक बनाने के लिए मिट्टी डाली गई, लेकिन बारिश के पानी ने अस्थायी व्यवस्था को फिर खराब कर दिया.
यही वजह रही कि 11 अगस्त को बच्चों और अभिभावकों ने दोबारा आवाज उठाई.इस बार प्रदर्शन का तरीका भी ध्यान खींचने वाला था.बच्चे हाथों में तिरंगा लेकर करीब 5 किलोमीटर पैदल चले और कलेक्ट्रेट पहुंचे.
बच्चों की मौजूदगी ने इस प्रदर्शन को अलग रूप दे दिया. प्राथमिक कक्षाओं में पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं के लिए इतनी दूरी पैदल तय करना अपने आप में चुनौती थी, लेकिन उनकी मांग स्पष्ट थी,ऐसी सड़क चाहिए जिससे वे नियमित रूप से स्कूल जा सकें.

कलेक्ट्रेट पर धरना और प्रशासन का आश्वासन
कलेक्ट्रेट पहुंचने के बाद बच्चों और ग्रामीणों ने जिलाधिकारी से मुलाकात की मांग की और गेट पर धरना दिया. प्रदर्शन के दौरान पुलिस बल भी मौजूद रहा.
कुछ रिपोर्टों और सामने आए वीडियो को लेकर पुलिस की कार्यशैली पर सवाल उठे.आरोप है कि बच्चों को परिसर में प्रवेश करने से रोका गया और कुछ स्थानों पर धक्का-मुक्की जैसी स्थिति बनी. इसी मुद्दे को लेकर भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर आजाद ने भी सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए चिंता जताई है .
आजाद ने सवाल उठाया कि सड़क की मांग कर रहे बच्चों के साथ प्रशासन और पुलिस को संवेदनशील तरीके से पेश आना चाहिए.हालांकि, किसी भी वायरल वीडियो या आरोप को अंतिम तथ्य मानने से पहले उसके पूरे संदर्भ और आधिकारिक पक्ष को देखना जरूरी है.
प्रशासन की ओर से एडीएम राकेश कुमार ने बताया कि वन विभाग से एनओसी प्राप्त हो चुकी है.लोक निर्माण विभाग यानी पीडब्ल्यूडी की ओर से करीब 1.81 करोड़ रुपये की लागत का प्रस्ताव शासन को भेजे जाने की जानकारी भी दी गई.अधिकारियों ने प्रदर्शनकारियों को जल्द सड़क निर्माण शुरू होने का आश्वासन दिया.
अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि प्रस्ताव कब स्वीकृत होता है और जमीन पर निर्माण कार्य वास्तव में कब शुरू होता है.
बच्चों से सवाल पूछने के वीडियो पर भी उठे सवाल
प्रदर्शन के बाद कुछ वीडियो सोशल मीडिया पर चर्चा में आए, जिनमें अधिकारियों द्वारा बच्चों से पहाड़ा या व्याकरण से जुड़े सवाल पूछे जाने की बात सामने आई. इस व्यवहार को लेकर भी सोशल मीडिया पर आलोचना हुई.
ऐसी स्थिति में प्रशासन के सामने चुनौती केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखने की नहीं होती, बल्कि प्रदर्शन कर रहे बच्चों और उनके अभिभावकों के साथ संवाद स्थापित करने की भी होती है. खासकर तब, जब उनकी मांग शिक्षा तक पहुंचने के लिए जरूरी बुनियादी सुविधा से जुड़ी हो.
बच्चों के प्रदर्शन को राजनीतिक नजरिए से देखने के बजाय यह समझना जरूरी है कि वे आखिर सड़क पर क्यों पहुंचे. यदि किसी बच्चे को स्कूल पहुंचने के लिए बारिश में दलदल से गुजरना पड़े, तो सड़क की मांग उसके लिए केवल विकास का मुद्दा नहीं रह जाती, बल्कि उसकी रोजमर्रा की शिक्षा का सवाल बन जाती है.
सड़क और शिक्षा का सीधा संबंध
शिक्षा के अधिकार की चर्चा अक्सर स्कूल भवन, शिक्षक, किताब और छात्रवृत्ति जैसे मुद्दों तक सीमित रहती है. लेकिन किसी बच्चे का विद्यालय तक सुरक्षित और सुगम तरीके से पहुंचना भी शिक्षा की निरंतरता के लिए महत्वपूर्ण है.
अगर बारिश के मौसम में सड़क खराब होने के कारण बच्चे नियमित रूप से स्कूल नहीं पहुंच पाते, तो इसका असर उनकी पढ़ाई पर पड़ सकता है. ग्रामीण इलाकों में यह समस्या विशेष रूप से गंभीर हो सकती है, जहां वैकल्पिक परिवहन के साधन सीमित होते हैं.
सड़क केवल एक निर्माण परियोजना नहीं होती. वह स्कूल, अस्पताल, बाजार और रोजगार तक पहुंच का माध्यम भी होती है.इसलिए किसी गांव की सड़क का निर्माण स्थानीय विकास के साथ-साथ शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था को भी प्रभावित करता है.
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हमीरपुर की घटना बड़े सवाल की ओर इशारा करती है
चंदूपुर के बच्चों का प्रदर्शन एक स्थानीय सड़क की समस्या से शुरू हुआ, लेकिन इससे ग्रामीण विकास की व्यापक तस्वीर पर सवाल उठता है. अगर जिला मुख्यालय से कुछ किलोमीटर की दूरी पर रहने वाले ग्रामीणों को सड़क के लिए बार-बार प्रदर्शन करना पड़े, तो प्रशासनिक व्यवस्था की प्राथमिकताओं पर चर्चा होना स्वाभाविक है.
यहां यह भी जरूरी है कि विकास के दावों और जमीनी स्थिति के बीच अंतर को समझा जाए. किसी सड़क के लिए बजट प्रस्ताव तैयार होना सकारात्मक कदम है, लेकिन ग्रामीणों के लिए वास्तविक बदलाव तब होगा जब सड़क जमीन पर बनकर तैयार होगी और बारिश के मौसम में भी बच्चों की आवाजाही आसान होगी.
इसलिए 1.81 करोड़ रुपये के प्रस्ताव से आगे बढ़कर उसकी मंजूरी, टेंडर, निर्माण की शुरुआत और गुणवत्ता—हर चरण पर निगरानी जरूरी होगी.
अब प्रशासन के सामने क्या जिम्मेदारी है?
सबसे पहली जरूरत है कि सड़क परियोजना की प्रक्रिया को अनावश्यक रूप से लंबा न खींचा जाए.यदि संबंधित विभागों से जरूरी अनुमति मिल चुकी है और प्रस्ताव शासन को भेजा गया है, तो आगे की कार्रवाई की समयसीमा स्पष्ट होनी चाहिए.
दूसरी जरूरत है कि स्थायी सड़क बनने तक अंतरिम व्यवस्था को प्रभावी बनाया जाए.केवल मिट्टी डालना पर्याप्त साबित नहीं हुआ है, क्योंकि बारिश में वह बह गई.ऐसे में ऐसा अस्थायी समाधान तलाशना जरूरी है जिससे बच्चे कम से कम सुरक्षित तरीके से स्कूल पहुंच सकें.
तीसरी और महत्वपूर्ण बात प्रशासनिक संवेदनशीलता है. प्रदर्शन चाहे किसी भी कारण से हो, बच्चों और अभिभावकों से संवाद शांतिपूर्ण और सम्मानजनक तरीके से होना चाहिए. पुलिस की भूमिका कानून-व्यवस्था बनाए रखना है, लेकिन प्रशासन का दायित्व शिकायत सुनकर उसका समाधान निकालना भी है.
निष्कर्ष: तिरंगा लेकर सड़क पर उतरने की नौबत क्यों आई?
हमीरपुर के चंदूपुर में बच्चों का तिरंगा मार्च केवल सड़क निर्माण की मांग नहीं है. यह उस बुनियादी सवाल को सामने रखता है कि क्या हर बच्चे को अपने स्कूल तक सुरक्षित और सम्मानजनक तरीके से पहुंचने का अवसर मिल रहा है?
बच्चों का यह कहना कि सड़क बन जाए तो वे पढ़ेंगे और आगे चलकर अफसर बनेंगे, ग्रामीण भारत की आकांक्षा को सामने रखता है. उनकी मांग बड़ी नहीं है— वे केवल ऐसी सड़क चाहते हैं जिस पर बारिश के दिनों में भी स्कूल जाना संभव हो.
अब जिम्मेदारी प्रशासन की है कि प्रदर्शन के दौरान दिए गए आश्वासन को कागज से निकालकर जमीन पर उतारा जाए. सड़क का निर्माण समय पर और गुणवत्तापूर्ण तरीके से हो, यही इस पूरे विवाद का वास्तविक समाधान होगा.
क्योंकि विकास की असली परीक्षा बड़े शहरों की चमक में नहीं, बल्कि उस गांव की सड़क पर होती है जहां एक बच्चा कीचड़ से बचते हुए अपनी स्कूल की किताबें लेकर भविष्य की ओर बढ़ने की कोशिश कर रहा है.

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