न्यायपालिका में SC ST OBC प्रतिनिधित्व क्यों कम?

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Ajit Kumar

भारततीसरा पक्ष आलेख
सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में SC ST OBC प्रतिनिधित्व पर सवाल

आज़ादी से एक ST जज, हाईकोर्ट डेटा और ट्रिब्यूनल-NCLT का सवाल

तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना : भारत की न्यायपालिका को संविधान का संरक्षक और नागरिकों के अधिकारों का अंतिम प्रहरी माना जाता है. अदालतों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे संविधान, कानून और मौलिक अधिकारों की रक्षा करें. लेकिन जब न्यायपालिका की सामाजिक संरचना पर नजर डाला जाता है, तो एक महत्वपूर्ण सवाल सामने आता है—क्या देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्थाओं में समाज के सभी वर्गों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिल रहा है?

इसी सवाल को लेकर हाल के दिनों में सांसद संजय सिंह ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर सवाल उठाए है.उन्होंने हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में SC, ST और OBC वर्गों की भागीदारी, सुप्रीम कोर्ट में ST समुदाय से न्यायाधीशों की संख्या, ट्रिब्यूनल्स में आरक्षण और NCLT की नियुक्ति व्यवस्था जैसे मुद्दों पर सवाल खड़े किए है.

यह बहस केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं है.इसके पीछे संविधान, न्यायिक नियुक्ति की प्रक्रिया, सामाजिक प्रतिनिधित्व और संस्थागत स्वतंत्रता जैसे कई महत्वपूर्ण प्रश्न जुड़ा हैं. इसलिए इस विषय को आंकड़ों और संवैधानिक व्यवस्था के संदर्भ में समझना जरूरी है.

उच्च न्यायपालिका में आरक्षण का संवैधानिक प्रावधान क्यों नहीं?

सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति संविधान के अनुच्छेद 124, 217 और 224 से संबंधित प्रावधानों के तहत होता है. इन प्रावधानों में SC, ST या OBC के लिए उसी तरह का जाति-आधारित आरक्षण नहीं है, जैसा कि सरकारी नौकरियों और शिक्षा के कई क्षेत्रों में देखने को मिलता है.

भारत में उच्च न्यायपालिका के न्यायाधीशों की नियुक्ति वर्तमान में कॉलेजियम व्यवस्था के माध्यम से होता है. सुप्रीम कोर्ट के मामले में वरिष्ठ न्यायाधीशों का कॉलेजियम उम्मीदवारों के नामों पर विचार करता है और नियुक्ति की प्रक्रिया आगे बढ़ती है. हाईकोर्ट के लिए भी संबंधित न्यायिक स्तर पर कॉलेजियम सिफारिश करता है.

सरकार की ओर से संसद में कई बार यह स्पष्ट किया गया है कि उच्च न्यायपालिका में SC, ST और OBC के लिए संवैधानिक रूप से निर्धारित आरक्षण व्यवस्था मौजूद नहीं है.

हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि सामाजिक प्रतिनिधित्व को पूरी तरह नजरअंदाज करने की बात कही गई है.सरकार की ओर से समय-समय पर हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों से आग्रह किया गया है कि न्यायाधीशों की सिफारिश करते समय समाज के विभिन्न वर्गों, महिलाओं और अल्पसंख्यकों को भी उचित अवसर दिया जाए.

यहीं पर सबसे महत्वपूर्ण अंतर सामने आता है,प्रतिनिधित्व को बढ़ाने की अपील और कानूनी रूप से बाध्यकारी आरक्षण, दोनों एक ही चीज नहीं हैं.

निचली अदालतों में आरक्षण की तस्वीर अलग

उच्च न्यायपालिका की तुलना में जिला और अधीनस्थ न्यायपालिका में स्थिति अलग है.निचली अदालतों में न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति और सेवा नियमों में राज्यों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है. कई राज्यों ने SC, ST, OBC और अन्य श्रेणियों के लिए आरक्षण की व्यवस्था लागू कर रखी है.

इसी वजह से निचली न्यायपालिका में सामाजिक प्रतिनिधित्व अपेक्षाकृत अधिक दिखाई देता है.उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार जिला स्तर की न्यायिक व्यवस्था में SC, ST और OBC वर्गों की संयुक्त हिस्सेदारी लगभग 45 प्रतिशत तक बताई गई है.

इससे एक महत्वपूर्ण सवाल पैदा होता है,अगर निचली न्यायपालिका में आरक्षण या प्रतिनिधित्व आधारित व्यवस्था के माध्यम से विभिन्न सामाजिक वर्गों की भागीदारी बढ़ाई जा सकती है, तो उच्च न्यायपालिका में इसका स्वरूप क्या होना चाहिए?

इसका कोई आसान उत्तर नहीं है, क्योंकि उच्च न्यायपालिका की नियुक्ति प्रक्रिया, न्यायिक स्वतंत्रता और संवैधानिक संरचना निचली न्यायपालिका से अलग है.

सुप्रीम कोर्ट में ST प्रतिनिधित्व का सवाल

सुप्रीम कोर्ट के सामाजिक प्रतिनिधित्व को लेकर सबसे अधिक चर्चा SC और ST समुदायों की संख्या को लेकर होता है.

उपलब्ध जानकारी के अनुसार, स्वतंत्रता के बाद सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त किए गए न्यायाधीशों की कुल संख्या 250 से अधिक रहा है.इसके मुकाबले ST समुदाय से न्यायाधीशों की संख्या बेहद कम रही है.

नगालैंड से संबंधित जस्टिस एच.के. सेमा को सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त ST समुदाय से जुड़े न्यायाधीश के रूप में अक्सर उद्धृत किया जाता है. उन्होंने वर्ष 2002 से 2008 के बीच सुप्रीम कोर्ट में सेवा दी.

SC समुदाय से भी उच्चतम न्यायालय में प्रतिनिधित्व सीमित रहा है.इसमें पूर्व मुख्य न्यायाधीश के.जी. बालाकृष्णन और न्यायाधीश बी.आर. गवई जैसे नाम प्रमुख हैं.

यहां एक सावधानी जरूरी है. किसी न्यायाधीश की सामाजिक पृष्ठभूमि से संबंधित आंकड़ों में आधिकारिक रिकॉर्ड और सार्वजनिक स्रोतों के बीच अंतर हो सकता है. इसलिए ऐसी संख्या को अंतिम सत्य मानने से पहले संबंधित सरकारी या न्यायिक दस्तावेजों से मिलान करना आवश्यक है.

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हाईकोर्ट में SC, ST और OBC प्रतिनिधित्व

हाईकोर्ट की तस्वीर भी सामाजिक प्रतिनिधित्व को लेकर बहस पैदा करती है. 2018 के बाद न्यायाधीशों की नियुक्ति से संबंधित आंकड़ों में उम्मीदवारों की सामाजिक पृष्ठभूमि का डेटा उपलब्ध कराया जाने लगा.

संसदीय जवाबों में उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 2018 से 2025-26 के बीच हाईकोर्ट में नियुक्त लगभग 840 से 850 न्यायाधीशों में SC, ST और OBC वर्गों की संख्या क्रमशः लगभग 33, 17 और 100 से 104 के बीच बताई गई है.

प्रतिशत के स्तर पर यह लगभग 4 प्रतिशत SC, करीब 2 प्रतिशत ST और लगभग 12 प्रतिशत OBC प्रतिनिधित्व के आसपास बैठता है.

इन आंकड़ों को केवल संख्या के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है. भारत की सामाजिक संरचना में इन वर्गों की आबादी का हिस्सा काफी बड़ा है. इसलिए प्रतिनिधित्व और जनसंख्या के बीच अंतर स्वाभाविक रूप से बहस का विषय बनता है.

हालांकि, यह भी समझना जरूरी है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति केवल जनसंख्या के अनुपात के आधार पर नहीं होता है. योग्यता, अनुभव, न्यायिक क्षमता, पेशेवर प्रतिष्ठा और संवैधानिक आवश्यकताएं भी नियुक्ति प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता हैं.

यही कारण है कि बहस का वास्तविक केंद्र यह होना चाहिए कि क्या योग्य उम्मीदवारों की तलाश समाज के सभी वर्गों तक पर्याप्त रूप से पहुंच रही है?

ट्रिब्यूनल्स में आरक्षण और प्रतिनिधित्व का प्रश्न

SC, ST और OBC प्रतिनिधित्व की चर्चा केवल सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट तक सीमित नहीं है. ट्रिब्यूनल्स भी इस बहस का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं.

ट्रिब्यूनल्स विशेष प्रकार के कानूनी और प्रशासनिक विवादों के निपटारे के लिए बनाए गए अर्ध-न्यायिक संस्थान हैं. इनमें न्यायिक सदस्यों के साथ-साथ कई मामलों में तकनीकी या विशेषज्ञ सदस्य भी शामिल होते हैं.

ट्रिब्यूनल्स की नियुक्ति व्यवस्था को लेकर भी समय-समय पर पारदर्शिता, स्वतंत्रता और सामाजिक प्रतिनिधित्व से जुड़े सवाल उठते रहा हैं.

2026 में ट्रिब्यूनल्स रिफॉर्म्स से जुड़ी प्रस्तावित व्यवस्था के संदर्भ में नेशनल ट्रिब्यूनल्स कमीशन की चर्चा सामने आई है. इस व्यवस्था में नियुक्तियों, प्रदर्शन और शिकायतों की निगरानी जैसे विषयों को एक संस्थागत ढांचे में लाने का प्रस्ताव है.

लेकिन नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) को लेकर स्थिति अलग है. NCLT को कंपनी कानून, दिवालियापन और संबंधित मामलों के निपटारे के लिए महत्वपूर्ण मंच माना जाता है. इसकी स्थापना Companies Act, 2013 के तहत हुई और 2016 में इसका संचालन शुरू हुआ.

NCLT से जुड़े सदस्यों की नियुक्ति में केंद्र सरकार की महत्वपूर्ण भूमिका है. यही कारण है कि इसके गठन और नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर कार्यपालिका के प्रभाव तथा न्यायिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन का प्रश्न उठता है.

NCLT पर विवाद क्यों महत्वपूर्ण है?

NCLT का महत्व केवल कंपनी विवादों तक सीमित नहीं है. Insolvency and Bankruptcy Code यानी IBC के तहत कंपनियों और वित्तीय संस्थानों से जुड़े कई महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई इसी व्यवस्था में होती है.

इसलिए NCLT के सदस्यों की नियुक्ति, उनकी विशेषज्ञता, स्वतंत्रता और संस्थागत जवाबदेही का सीधा संबंध कारोबारी क्षेत्र और वित्तीय व्यवस्था से भी है.

आलोचकों का कहना है कि ऐसे संस्थानों में कार्यपालिका की नियुक्ति भूमिका को लेकर पर्याप्त पारदर्शिता और स्वतंत्रता सुनिश्चित होनी चाहिए. वहीं दूसरी ओर समर्थकों का तर्क है कि NCLT जैसे संस्थानों को विशेषज्ञता और तेजी से निर्णय लेने के लिए एक प्रभावी प्रशासनिक व्यवस्था की जरूरत होती है.

इसलिए सवाल केवल यह नहीं है कि नियुक्ति का अधिकार किसके पास है. बड़ा सवाल यह है कि क्या नियुक्ति प्रक्रिया पारदर्शी, स्वतंत्र, जवाबदेह और सामाजिक रूप से पर्याप्त प्रतिनिधित्व वाली है?

न्यायपालिका में विविधता क्यों जरूरी है?

न्यायपालिका में सामाजिक विविधता का सवाल केवल संख्या या राजनीतिक प्रतिनिधित्व का विषय नहीं है. यह न्याय व्यवस्था में लोगों के भरोसे से भी जुड़ा है.

जब न्यायिक संस्थानों में समाज के अलग-अलग वर्गों से आने वाले योग्य लोग मौजूद होते हैं, तो इससे न्यायपालिका की सामाजिक पहुंच और प्रतिनिधित्व की भावना मजबूत हो सकती है.

लेकिन दूसरी तरफ न्यायपालिका की स्वतंत्रता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है. यदि नियुक्तियों में राजनीतिक या बाहरी दबाव बढ़ता है, तो न्यायपालिका की स्वायत्तता प्रभावित होने की आशंका पैदा हो सकता है.

इसलिए समाधान ऐसा होना चाहिए जिसमें प्रतिनिधित्व और योग्यता, सामाजिक विविधता और न्यायिक स्वतंत्रता,इन सभी के बीच संतुलन कायम हो.

क्या केवल आरक्षण ही समाधान है?

यह बहस का सबसे कठिन हिस्सा है.

एक पक्ष का तर्क है कि अगर निचली अदालतों और सरकारी संस्थानों में आरक्षण के जरिए सामाजिक प्रतिनिधित्व बढ़ाया जा सकता है, तो उच्च न्यायपालिका में भी किसी प्रभावी तंत्र पर विचार होना चाहिए.

दूसरा पक्ष मानता है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति एक विशेष संवैधानिक प्रक्रिया है और इसमें सीधे आरक्षण लागू करने से न्यायपालिका की स्वतंत्रता तथा नियुक्ति के मौजूदा ढांचे पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है.

संभव समाधान केवल आरक्षण तक सीमित नहीं होना चाहिए. योग्य SC, ST और OBC वकीलों की पहचान, न्यायिक क्षेत्र में उनके अवसरों का विस्तार, निचली अदालतों से उच्च न्यायपालिका तक प्रतिभाओं की मजबूत पाइपलाइन और कॉलेजियम प्रक्रिया में अधिक पारदर्शिता जैसे उपायों पर भी गंभीरता से विचार किया जा सकता है.

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आगे क्या होना चाहिए?

न्यायपालिका में सामाजिक प्रतिनिधित्व की बहस को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से आगे ले जाने की जरूरत है.

सबसे पहले नियुक्तियों से जुड़े आंकड़ों को नियमित और पारदर्शी तरीके से सार्वजनिक किया जाना चाहिए. इससे यह पता लगाने में आसानी होगी कि अलग-अलग सामाजिक वर्गों का प्रतिनिधित्व वास्तव में किस स्तर पर है.

दूसरा, योग्य उम्मीदवारों की पहचान की प्रक्रिया को व्यापक बनाया जाना चाहिए. केवल कुछ सीमित संस्थानों या नेटवर्क तक उम्मीदवारों की पहुंच रहने से प्रतिभा का दायरा सीमित हो सकता है.

तीसरा, निचली न्यायपालिका से उच्च न्यायपालिका तक योग्य न्यायिक प्रतिभाओं को आगे बढ़ाने के लिए संस्थागत व्यवस्था विकसित की जा सकती है.

चौथा, ट्रिब्यूनल्स की नियुक्तियों में भी योग्यता, स्वतंत्रता, पारदर्शिता और सामाजिक विविधता के बीच संतुलन सुनिश्चित करना जरूरी है.

निष्कर्ष

संजय सिंह द्वारा उठाए गए सवालों ने न्यायपालिका में SC, ST और OBC प्रतिनिधित्व की बहस को फिर चर्चा में ला दिया है.लेकिन इस मुद्दे को केवल किसी एक राजनीतिक दल या नेता के बयान के रूप में देखना उचित नहीं होगा.

उपलब्ध आंकड़े यह संकेत जरूर देते हैं कि उच्च न्यायपालिका में सामाजिक विविधता को लेकर अभी भी महत्वपूर्ण अंतर मौजूद है. वहीं संवैधानिक व्यवस्था यह भी स्पष्ट करती है कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में सरकारी नौकरियों की तरह सीधा जाति-आधारित आरक्षण लागू नहीं है.

इसलिए असली चुनौती यह है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता को सुरक्षित रखते हुए योग्य और प्रतिभाशाली उम्मीदवारों के लिए अवसरों का दायरा कैसे बढ़ाया जाए.

लोकतंत्र में न्यायपालिका पर लोगों का भरोसा उसकी स्वतंत्रता जितना ही उसकी निष्पक्षता और व्यापक सामाजिक स्वीकार्यता पर भी निर्भर करता है. इसलिए यह बहस किसी एक वर्ग बनाम दूसरे वर्ग की नहीं, बल्कि ऐसी न्याय व्यवस्था बनाने की होनी चाहिए जिसमें योग्यता के साथ समान अवसर और संस्थागत स्वतंत्रता,दोनों सुरक्षित रहें.

न्यूज़ स्रोत: संसद में दिए गए सरकारी जवाब, सुप्रीम कोर्ट/केंद्र सरकार के आधिकारिक दस्तावेज और सांसद संजय सिंह की X पोस्ट के आधार पर

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