तेजस्वी का बड़ा आरोप, बिहार-बंगाल में फिर चुनाव की मांग

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Ajit Kumar

बिहार
तेजस्वी यादव पटना में संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए

चुनाव आयोग में मतभेद की रिपोर्ट के बाद तेजस्वी ने CEC पर सवाल उठाए और दो राज्यों में दोबारा चुनाव की मांग की

तीसरा पक्ष ब्यूरो: पटना स्थित 1, पोलो रोड आवास पर 23 सितंबर 2026 को संवाददाता सम्मेलन में राष्ट्रीय जनता दल के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष और बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी प्रसाद यादव ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर आरोप लगाए.उन्होंने कहा कि दो चुनाव आयुक्तों द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की कार्यप्रणाली पर आपत्ति दर्ज किए जाने की रिपोर्ट के बाद कई गंभीर सवाल खड़े हुए हैं.

तेजस्वी यादव ने आरोप लगाया कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने दोनों अन्य चुनाव आयुक्तों के अधिकार क्षेत्र को कमजोर किया और चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था का इस्तेमाल भाजपा के पक्ष में किया गया. उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का नाम लेते हुए आरोप लगाया कि बिहार और पश्चिम बंगाल में चुनाव उनकी कथित भूमिका के प्रभाव में कराए गए.

इन आरोपों को लेकर तेजस्वी ने बिहार और पश्चिम बंगाल में दोबारा चुनाव कराने की मांग की. उनकी यह मांग 23 सितंबर को सामने आई उस रिपोर्ट के बाद आई, जिसमें चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी द्वारा चुनावी प्रक्रिया से जुड़े फैसलों पर कम-से-कम 14 बार आपत्ति दर्ज किए जाने की बात कही गई थी.

दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों पर क्या सामने आया?

द इंडियन एक्सप्रेस की 23 सितंबर की रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम-से-कम 14 मौकों पर चुनाव आयोग के फैसलों और आदेशों पर आपत्ति दर्ज की.रिपोर्ट में मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने और बहाल करने, फॉर्म-6 में बदलाव तथा मतदाता सूची प्रबंधन से जुड़े मुद्दों का उल्लेख किया गया.

रिपोर्ट सामने आने के बाद विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए.इसी राजनीतिक विवाद के बीच तेजस्वी यादव ने कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त को इन सवालों पर सामने आकर जवाब देना चाहिए.

हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि रिपोर्ट में दर्ज आपत्तियों को चुनाव में धांधली या किसी राजनीतिक दल को चुनाव जिताने का प्रमाण नहीं बताया गया है. यह एक महत्वपूर्ण अंतर है.

चुनाव आयोग ने क्या जवाब दिया?

चुनाव आयोग ने इन रिपोर्टों के बाद अपने तीनों सदस्यों की ओर से स्पष्टीकरण दिया. आयोग के मुताबिक बहुसदस्यीय संवैधानिक संस्था में विचार-विमर्श के दौरान अलग-अलग राय, टिप्पणियां और सुझाव सामने आना सामान्य प्रक्रिया है.आयोग ने कहा कि अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए.

इसलिए वर्तमान विवाद के दो अलग-अलग पक्ष हैं. एक ओर रिपोर्ट के आधार पर चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों को लेकर विपक्ष सवाल उठा रहा है, वहीं दूसरी ओर चुनाव आयोग का कहना है कि आंतरिक विचार-विमर्श को अंतिम संस्थागत निर्णय से अलग करके नहीं देखा जाना चाहिए.

SIR को लेकर भी तेजस्वी ने उठाए सवाल

तेजस्वी यादव ने बिहार में हुए Special Intensive Revision यानी SIR का मुद्दा भी उठाया.उन्होंने दावा किया कि बिहार, पश्चिम बंगाल और अन्य राज्यों में मतदाता सूची से जुड़े फैसलों का इस्तेमाल चुनावी परिणामों को प्रभावित करने के लिए किया गया.

हालांकि, इन आरोपों के समर्थन में उन्होंने कोई ऐसा सार्वजनिक प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया जिससे यह स्थापित हो कि चुनाव आयोग ने किसी राजनीतिक दल को चुनाव जिताने के उद्देश्य से मतदाता सूची में बदलाव किए. चुनाव आयोग ने भी SIR से जुड़े अपने फैसलों को कानूनी प्रक्रिया और आयोग की सर्वसम्मत मंजूरी के अनुरूप बताया है.

चुनावी रिकॉर्ड और EVM पर भी सवाल

तेजस्वी यादव ने चुनाव परिणाम के बाद इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों और चुनावी रिकॉर्ड को सुरक्षित रखने से जुड़े नियमों में बदलाव पर भी सवाल उठाया. उन्होंने आरोप लगाया कि रिकॉर्ड सुरक्षित रखने की अवधि कम किए जाने से भविष्य में चुनावी अनियमितताओं के आरोपों की जांच प्रभावित हो सकती है.

उन्होंने इसे संभावित सबूतों के संरक्षण से जोड़ते हुए चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल उठाया.इस मुद्दे पर भी उनका बयान एक राजनीतिक आरोप है; इसे चुनावी गड़बड़ी के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता.

CEC की नियुक्ति प्रक्रिया पर भी सवाल

तेजस्वी यादव ने मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति की प्रक्रिया को लेकर भी केंद्र सरकार पर निशाना साधा. उन्होंने कहा कि पहले मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति प्रक्रिया में भारत के मुख्य न्यायाधीश की भूमिका को लेकर अलग व्यवस्था थी, लेकिन बाद में कानून में बदलाव किया गया.

उनका तर्क था कि नियुक्ति प्रक्रिया में सरकार की भूमिका बढ़ने से चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को लेकर सवाल खड़े होते हैं. इसी मुद्दे को लेकर उन्होंने चुनाव आयोग को संवैधानिक संस्थाओं के राजनीतिक इस्तेमाल से जोड़ने का आरोप लगाया.

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₹10 हजार के भुगतान को लेकर भी आरोप

तेजस्वी यादव ने बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान महिलाओं के खातों में ₹10,000 की राशि पहुंचने का मुद्दा भी उठाया.उन्होंने आरोप लगाया कि मतदान के दिन तक यह भुगतान जारी रहा और विपक्ष की शिकायतों पर चुनाव आयोग ने पर्याप्त कार्रवाई नहीं की.

यह भी उनके द्वारा लगाया गया राजनीतिक आरोप है.इसे चुनाव परिणाम को प्रभावित करने का स्थापित तथ्य मानने से पहले संबंधित आधिकारिक रिकॉर्ड और चुनाव आयोग की कार्रवाई को देखना जरूरी होगा.

बिहार और पश्चिम बंगाल में फिर चुनाव की मांग

प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान तेजस्वी यादव ने बिहार और पश्चिम बंगाल में दोबारा चुनाव कराने की मांग को दोहराया. उन्होंने आरोप लगाया कि दोनों राज्यों में चुनाव प्रक्रिया निष्पक्ष तरीके से नहीं हुई और इसके लिए उन्होंने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को जिम्मेदार ठहराया.

उनके बयान के बाद यह मुद्दा एक बड़े राजनीतिक विवाद में बदल गया है. दूसरी ओर चुनाव आयोग ने अपने फैसलों को सर्वसम्मत बताते हुए आंतरिक मतभेदों को सामान्य संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा बताया है.

अब विवाद का मुख्य सवाल क्या है?

पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि चुनाव आयुक्तों द्वारा दर्ज की गई आपत्तियों का वास्तविक संस्थागत प्रभाव क्या था और क्या इन आपत्तियों से जुड़े दस्तावेज सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हैं.दूसरा सवाल यह है कि SIR, मतदाता सूची और चुनावी रिकॉर्ड से जुड़े फैसलों की वैधानिक प्रक्रिया क्या थी.

इन सवालों का अंतिम निष्कर्ष केवल राजनीतिक आरोपों से नहीं, बल्कि उपलब्ध दस्तावेजों, चुनाव आयोग के आधिकारिक रिकॉर्ड और आवश्यकता पड़ने पर न्यायिक समीक्षा से निकलेगा.

निष्कर्ष

23 सितंबर 2026 को सामने आई रिपोर्ट ने चुनाव आयोग की आंतरिक कार्यप्रणाली को लेकर राजनीतिक बहस तेज कर दी है.तेजस्वी यादव ने इसे लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता से जोड़ते हुए बिहार और पश्चिम बंगाल में पुनः चुनाव की मांग की है.वहीं चुनाव आयोग का कहना है कि अलग-अलग राय आंतरिक विचार-विमर्श का हिस्सा हैं और अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए.

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