जल-जंगल-जमीन, संस्कृति और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा को लेकर कांग्रेस अध्यक्ष का संदेश
तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना : हर साल 9 अगस्त को दुनिया भर में विश्व आदिवासी दिवस (International Day of the World’s Indigenous Peoples) मनाया जाता है. यह दिन आदिवासी और मूलनिवासी समुदायों की पहचान, संस्कृति, परंपराओं, अधिकारों और समाज में उनके योगदान को सम्मान देने का अवसर प्रदान करता है. वर्ष 2026 में भी यह दिवस आदिवासी समुदायों के अधिकारों और उनके पारंपरिक ज्ञान को संरक्षित करने के संकल्प के साथ मनाया जा रहा है.
भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में विश्व आदिवासी दिवस का महत्व और भी व्यापक हो जाता है. देश के अलग-अलग हिस्सों में आदिवासी समुदायों की अपनी विशिष्ट भाषाएं, लोक परंपराएं, जीवनशैली और प्रकृति से जुड़ी सामाजिक व्यवस्था है. आदिवासी समाज लंबे समय से जल, जंगल और जमीन को अपने जीवन, संस्कृति और आजीविका का आधार मानता आया है.
मल्लिकार्जुन खड़गे ने दी आदिवासी समाज को शुभकामनाएं
विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने देश के आदिवासी समाज को शुभकामनाएं दीं है. अपने संदेश में उन्होंने आदिवासी समुदाय के भारत की संस्कृति और प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व में योगदान को महत्वपूर्ण बताया.
खड़गे ने कहा कि आदिवासी समाज ने भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, प्रकृति के संरक्षण और विविधता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. उन्होंने आदिवासी समुदायों के जल-जंगल-जमीन, संस्कृति, परंपराओं और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा पर जोर दिया.
उन्होंने सामाजिक न्याय और सम्मान सुनिश्चित करने के प्रति कांग्रेस की प्रतिबद्धता भी दोहराई. अपने संदेश का समापन उन्होंने जय जोहार, जय हिंद के साथ किया.
9 अगस्त को ही क्यों मनाया जाता है विश्व आदिवासी दिवस?
विश्व आदिवासी दिवस की शुरुआत संयुक्त राष्ट्र के प्रयासों से हुई.संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 23 दिसंबर 1994 को प्रस्ताव 49/214 के माध्यम से 9 अगस्त को अंतरराष्ट्रीय विश्व के मूलनिवासी लोगों का दिवस घोषित किया.
9 अगस्त की तारीख का संबंध 1982 से है. इसी दिन जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र के आदिवासी आबादी से संबंधित कार्य समूह की पहली बैठक आयोजित हुई थी. इसके बाद यह दिन दुनिया भर के Indigenous Peoples यानी मूलनिवासी समुदायों के अधिकारों और समस्याओं के प्रति जागरूकता बढ़ाने का महत्वपूर्ण अवसर बन गया.
इस दिवस का उद्देश्य केवल सांस्कृतिक कार्यक्रमों तक सीमित नहीं है. इसके केंद्र में मूलनिवासी समुदायों के मानवाधिकार, सामाजिक न्याय, सांस्कृतिक पहचान, पारंपरिक ज्ञान और विकास में उनकी भागीदारी जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे भी हैं.
विश्व आदिवासी दिवस 2026 की थीम क्या है?
वर्ष 2026 के विश्व आदिवासी दिवस की थीम है:
Honouring Indigenous Midwives: Safeguarding Life and Well-being
हिंदी में इसका अर्थ है—स्वदेशी दाइयों का सम्मान: जीवन और कल्याण की सुरक्षा.
इस वर्ष की थीम विशेष रूप से आदिवासी समुदायों की पारंपरिक स्वास्थ्य प्रणालियों और ज्ञान को सामने लाती है. आदिवासी समाज में पारंपरिक दाइयों ने लंबे समय से गर्भावस्था, प्रसव और मातृ-शिशु देखभाल से जुड़े सामुदायिक ज्ञान को संरक्षित किया है.
यह थीम इस बात पर भी ध्यान आकर्षित करती है कि आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं के साथ-साथ स्थानीय और पारंपरिक ज्ञान की भूमिका को भी समझने तथा सम्मान देने की आवश्यकता है.
जल-जंगल-जमीन क्यों है आदिवासी समाज का प्रमुख सवाल?
आदिवासी समाज के संदर्भ में जल-जंगल-जमीन केवल प्राकृतिक संसाधनों का विषय नहीं है.यह उनकी आजीविका, सामाजिक पहचान, संस्कृति और पारंपरिक जीवन पद्धति से गहराई से जुड़ा हुआ है.
जंगल से मिलने वाले लघु वनोपज, खेती, पशुपालन और स्थानीय प्राकृतिक संसाधन बड़ी संख्या में आदिवासी परिवारों की आर्थिक व्यवस्था का हिस्सा हैं. जंगलों से जुड़े कई पारंपरिक ज्ञान और सांस्कृतिक practices पीढ़ियों से समुदायों के बीच हस्तांतरित होते रहे हैं.
इसी कारण भूमि अधिग्रहण, विस्थापन, वन संसाधनों पर अधिकार और विकास परियोजनाओं से जुड़े सवाल आदिवासी समुदायों के लिए बेहद संवेदनशील विषय रहा हैं.
भारत में वन अधिकार अधिनियम, 2006 जैसे कानूनों का उद्देश्य वन क्षेत्रों में रहने वाले अनुसूचित जनजातियों और अन्य परंपरागत वनवासियों के कुछ वन अधिकारों को मान्यता देना है. वहीं संविधान की पांचवीं और छठी अनुसूची के तहत कुछ आदिवासी क्षेत्रों के प्रशासन और संरक्षण के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं.
आदिवासी संस्कृति और पारंपरिक ज्ञान का संरक्षण
आदिवासी समुदायों की पहचान उनकी भाषाओं, लोकगीतों, नृत्य, कला, हस्तशिल्प, खान-पान, कृषि पद्धतियों और प्रकृति आधारित पारंपरिक ज्ञान से भी जुड़ी है.
आज जब जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता और पर्यावरण संरक्षण वैश्विक चिंता के विषय बने हुए हैं, तब आदिवासी समुदायों के पारंपरिक पर्यावरणीय ज्ञान की उपयोगिता पर भी चर्चा बढ़ी है.
प्रकृति के साथ संतुलित जीवन, स्थानीय जैव विविधता की समझ और सामुदायिक संसाधनों के उपयोग से जुड़ी परंपराएं कई आदिवासी समाजों में आज भी देखने को मिलती हैं. इसलिए आदिवासी संस्कृति का संरक्षण केवल किसी एक समुदाय की विरासत बचाने का सवाल नहीं, बल्कि व्यापक सांस्कृतिक और प्राकृतिक विरासत को सुरक्षित रखने से भी जुड़ा है.
संवैधानिक अधिकार और सामाजिक न्याय
भारत के संविधान में अनुसूचित जनजातियों के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक हितों की सुरक्षा के लिए कई प्रावधान किए गए हैं. शिक्षा, रोजगार, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े क्षेत्रों में आरक्षण सहित विभिन्न संवैधानिक व्यवस्थाएं आदिवासी समुदायों के उत्थान का महत्वपूर्ण आधार हैं.
इसके बावजूद शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, भूमि अधिकार और बुनियादी सुविधाओं तक पहुंच जैसे मुद्दे आज भी कई आदिवासी क्षेत्रों में महत्वपूर्ण बना हुआ है.
विश्व आदिवासी दिवस इन सवालों को केवल एक दिन की चर्चा तक सीमित रखने के बजाय नीति, प्रशासन और समाज के स्तर पर लगातार संवाद की जरूरत को रेखांकित करता है.
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2026 में विश्व आदिवासी दिवस का संदेश
विश्व आदिवासी दिवस 2026 की थीम जहां पारंपरिक स्वास्थ्य ज्ञान और आदिवासी महिलाओं की भूमिका पर ध्यान केंद्रित करती है, वहीं भारत में इस अवसर पर जल-जंगल-जमीन, संस्कृति और संवैधानिक अधिकारों का सवाल भी महत्वपूर्ण है.
मल्लिकार्जुन खड़गे का संदेश इसी व्यापक विमर्श को राजनीतिक रूप से सामने रखता है। उनका जोर आदिवासी समाज की सांस्कृतिक पहचान के साथ-साथ उनके अधिकारों और सामाजिक सम्मान की रक्षा पर रहा.
हालांकि विश्व आदिवासी दिवस का वास्तविक महत्व तभी सामने आएगा, जब आदिवासी समुदायों की भागीदारी विकास की नीतियों और निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में भी मजबूत हो.उनकी जमीन, संसाधनों, संस्कृति और पारंपरिक ज्ञान से जुड़े फैसलों में समुदाय की आवाज को महत्व देना इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है.
निष्कर्ष
विश्व आदिवासी दिवस 2026 आदिवासी समाज की संस्कृति और परंपराओं को सम्मान देने के साथ उनके अधिकारों पर गंभीरता से विचार करने का अवसर है. इस वर्ष की थीम पारंपरिक दाइयों और आदिवासी महिलाओं के ज्ञान व योगदान को केंद्र में रखती है.
भारत में यह दिवस जल-जंगल-जमीन, सांस्कृतिक पहचान, संवैधानिक संरक्षण और सामाजिक न्याय जैसे सवालों को भी सामने लाता है. मल्लिकार्जुन खड़गे की शुभकामनाओं और अधिकारों की रक्षा के संदेश के बीच सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि आदिवासी समाज को केवल सम्मान का प्रतीक नहीं, बल्कि अपने विकास और भविष्य से जुड़े फैसलों में सक्रिय भागीदार बनाया जाए.

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