1100 रु पेंशन की घोषणा ,ये जनआंदोलन की जीत है ?

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kmSudha

बिहार
1100 रु पेंशन की घोषणा ,ये जनआंदोलन की जीत है – झूठे वादों की नहीं!

20 साल से राज, लेकिन महिलाओं के लिए सिर्फ़ डर और अन्याय?

न्याय के नाम पर धोखा – महिलाओं की इज़्ज़त, अब भी सवालों में!

तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना 21 जून :भाकपा-माले और ऐपवा ने आज एक संवाददाता सम्मेलन में भाजपा-जदयू सरकार के पिछले 20 वर्षों के शासनकाल के दौरान महिलाओं के साथ किए गए विश्वासघात को लेकर एक खुला आरोप पत्र जारी किया. यह आरोप पत्र ऐपवा की महासचिव का. मीना तिवारी, बिहार विधान परिषद की सदस्य एवं स्कीम वर्कर्स की नेता शशि यादव, बिहार महिला आयोग की पूर्व अध्यक्ष मंजू प्रकाश, तथा सरोज चौबे, अनुराधा देवी और मंजू शर्मा द्वारा संयुक्त रूप से जारी किया गया

बिहार में बढ़ता अपराध का स्तर बेहद चिंताजनक:मीना तिवारी

बिहार में बढ़ता अपराध का स्तर बेहद चिंताजनक:मीना तिवारी

ऐपवा महासचिव मीना तिवारी ने कहा कि पिछले दो दशकों में भाजपा-जदयू की सरकार महिलाओं को सामाजिक और आर्थिक न्याय दिलाने में पूरी तरह नाकाम रही है.आज बिहार में बढ़ता अपराध का स्तर बेहद चिंताजनक है.दलितों, अल्पसंख्यकों की महिलाओं और छोटी बच्चियों को लगातार निशाना बनाया जा रहा है.सरकार की उदासीनता और लापरवाही ने अपराधियों के हौसले और बुलंद कर दिए हैं.

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पेंशन रु. 1100 की घोषणा जनांदोलनों की जीत :ऐपवा

ऐपवा महासचिव मीना तिवारी ने कहा कि जन आंदोलनों के दबाव में सरकार ने सामाजिक सुरक्षा पेंशन की राशि ₹400 से बढ़ाकर ₹1100 करने की घोषणा की है, जो आंदोलन की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है. हालांकि, यह राशि अब भी बेहद कम है. कई अन्य राज्यों में महिलाओं को ₹4000 तक की मासिक पेंशन दी जा रही है.हमारी मांग थी कि पेंशन की राशि न्यूनतम ₹1500 की जाए, लेकिन सरकार ने इसे केवल ₹1100 तक ही सीमित रखा है.

मीना तिवारी ने कहा कि माइक्रोफाइनेंस कंपनियाँ आज महिलाओं की आर्थिक बदहाली का बड़ा कारण बन चुकी हैं. लाखों परिवार इन कर्ज़ों के बोझ तले अत्यंत गरीबी में जीवन जीने को मजबूर हैं.सरकार द्वारा महिला सशक्तिकरण के जो दावे किए जा रहे हैं, वे महज दिखावे से ज़्यादा कुछ नहीं हैं.

सरकार ने स्कीम वर्कर्स के साथ गंभीर अन्याय किया:शशि यादव

विधान परिषद सदस्य शशि यादव ने आरोप लगाया कि सरकार ने स्कीम वर्कर्स के साथ गंभीर अन्याय किया है.महागठबंधन सरकार के दौरान आशा कार्यकर्ताओं को प्रतिमाह ₹2500 देने की जो घोषणा की गई थी, उसे अब तक लागू नहीं किया गया, जिससे इन कर्मियों में गहरा आक्रोश है.

सरोज चौबे ने मध्याह्न भोजन रसोइयों की स्थिति को बेहद दयनीय बताते हुए कहा कि उन्हें मात्र ₹1650 प्रति माह मानदेय दिया जाता है, वह भी केवल दस महीनों के लिए.यह व्यवस्था पूरी तरह से अन्यायपूर्ण और अमानवीय है.

भाजपा-नीतीश सरकार ने महिला आयोग को निष्क्रिय बनाए रखा:मंजू प्रकाश

बिहार महिला आयोग की पूर्व अध्यक्ष मंजू प्रकाश ने कहा कि भाजपा-नीतीश सरकार ने महिला आयोग को जानबूझकर निष्क्रिय बनाए रखा. हाल की नियुक्तियों में भी अपात्र और राजनीतिक रसूख वाले लोगों को तरजीह दी गई, जिससे आयोग की स्वतंत्रता और विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठे हैं.

आरोप पत्र – प्रमुख बिंदु (महिला अधिकारों और सम्मान से जुड़े मुद्दों पर)

  • महिलाओं के प्रति अपराधों में तेजी से वृद्धि, जिसमें बलात्कार, घरेलू हिंसा और उत्पीड़न की घटनाएँ लगातार बढ़ रही हैं.
  • पीड़ित महिलाओं को आवश्यक कानूनी और संस्थागत सहायता न मिल पाना, जिससे न्याय की प्रक्रिया बाधित होती है.
  • बेटियों की उपेक्षा और लैंगिक भेदभाव, जो उनके विकास और सशक्तीकरण में बड़ी बाधा बनता है.
  • जीविका समूहों और महिला कार्यकर्ताओं के सशक्तीकरण का केवल खोखला प्रचार, ज़मीनी स्तर पर कोई ठोस बदलाव नहीं.
  • माइक्रोफाइनेंस कंपनियों द्वारा महिलाओं का आर्थिक शोषण और उत्पीड़न, जिससे कई परिवार कर्ज़ के बोझ तले दब गए हैं.
  • श्रमबल में महिलाओं की न्यूनतम भागीदारी, नीति-निर्माण में लैंगिक संतुलन का अभाव.
  • कार्यस्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव और असमान अवसर, जिससे उनका करियर विकास बाधित होता है.
  • आशा, आंगनवाड़ी, मिड-डे मील और अन्य स्कीम वर्कर्स के साथ अपमानजनक व्यवहार और आर्थिक शोषण.
  • असंगठित क्षेत्र की महिला मजदूरों की उपेक्षा, उन्हें न सामाजिक सुरक्षा मिल रही है और न ही कोई स्थिर आय.
  • कृषि मजदूरी में महिलाओं को पुरुषों की तुलना में कम पारिश्रमिक, जबकि श्रम में उनकी भागीदारी बराबर या अधिक है.
  • महिला किसानों को कानूनी पहचान और सरकारी योजनाओं से वंचित रखा जाना, जिससे वे अधिकार और सहायता दोनों से दूर हैं.
  • ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली, जिससे गर्भवती महिलाओं, किशोरियों और वृद्ध महिलाओं को विशेष कष्ट होता है.
  • महिला शिक्षा का लगातार गिरता स्तर, खासकर ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में.
  • शराबबंदी की आड़ में महिलाओं पर दमन और उत्पीड़न, पुलिसिया कार्रवाई में लैंगिक संवेदनशीलता का अभाव.
  • रसोई गैस और आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में निरंतर वृद्धि, जिससे घरेलू महिलाएं आर्थिक संकट से जूझ रही हैं.
  • सांप्रदायिक घटनाओं में महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने में प्रशासन की विफलता, खासकर दंगों और तनाव के समय.
  • महिलाओं के लोकतांत्रिक अधिकारों का दमन, जैसे चुनाव लड़ने या विरोध दर्ज करने पर दबाव या हिंसा.
  • राज्य महिला आयोग को निष्क्रिय और प्रभावहीन बनाए रखना, जिससे पीड़िताओं को राहत मिलने में देरी या असंभवता.

भाकपा-माले और ऐपवा की साझा घोषणा

भाकपा-माले और ऐपवा ने ऐलान किया है कि आने वाले दिनों में महिलाओं के मुद्दों को लेकर व्यापक जनसंघर्ष और आंदोलन चलाया जाएगा.इन आंदोलनों का मकसद महिला अधिकारों की रक्षा और सरकार पर जवाबदेही तय करना है.

घोषित प्रमुख माँगें इस प्रकार हैं:

  • महिलाओं पर बढ़ते अत्याचार को रोकने के लिए पुलिस और प्रशासन को जवाबदेह बनाया जाए.
  • सभी महिलाओं को बिना शर्त ₹2500 मासिक आर्थिक सहायता की गारंटी दी जाए.
  • रसोई गैस की कीमत ₹500 तक सीमित की जाए.
  • सामाजिक सुरक्षा पेंशन को बढ़ाकर न्यूनतम ₹1500 किया जाए.
  • सभी स्कीम वर्करों को सम्मानजनक मानदेय दिया जाए और उन्हें स्थायी कर्मचारी का दर्जा मिले.
  • महिलाओं के लिए रोजगार और स्वरोजगार के पर्याप्त और टिकाऊ अवसर उपलब्ध कराए जाएं.
  • बिहार की महिलाओं की एकजुट आवाज़ — सरकार बदलो, बिहार बदलो!

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