हम सिर्फ ताली बजाने वाली भीड़ नहीं, बल्कि सवाल पूछने वाले नागरिक बनें?
भारत में रैलियां अब भीड़ का खेल बन चुकी हैं, न कि मुद्दों की लड़ाई
तीसरा पक्ष ब्यरो पटना 21 जून:भारत में सियासत का मौसम अब सिर्फ चुनावों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सालभर किसी न किसी बहाने से रैलियों की बयार बहती रहती है.विशाल जनसमूह, झंडों की बाढ़, नेताओं के नारे और मंचों से उछाले गए वादों की बारिश—यह सब अब आम हो चुका है. मगर इस पूरे शोर में एक सवाल गूंजता है की क्या इन रैलियों का मकसद अब भी जनता की भलाई है, या यह सिर्फ राजनीतिक मार्केटिंग का हथियार बन चुकी हैं?

राजनीति का प्रदर्शन या जनसरोकार की परख?
अगर बीते 5 वर्षों पर नजर डालें तो भारत में औसतन हर महीने कम से कम एक बड़ी रैली हुई है, जो या तो सरकार की “उपलब्धियों” का गुणगान करती है या फिर विपक्ष द्वारा सरकार की “नाकामियों” का पर्दाफाश करने का दावा.लेकिन इन दोनों ही हालातों में जनता की असली समस्याएं—बेरोजगारी, स्वास्थ्य, शिक्षा, महंगाई—मंच के पीछे कहीं छुप जाती हैं.
2024-25 की पहली तिमाही में ही अलग-अलग राज्यों में 45 से ज्यादा बड़ी राजनीतिक रैलियां आयोजित की गईं. लेकिन इनका ठोस सामाजिक असर क्या पड़ा? नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS-6) के प्रारंभिक आंकड़ों के अनुसार, ग्रामीण भारत के 36% परिवारों को अभी भी पीने का साफ पानी नियमित रूप से नहीं मिल रहा.

जनता के खर्च पर सियासी तमाशा?
हर रैली की लागत लाखों से करोड़ों में जाती है. विशेषज्ञों के मुताबिक एक औसत रैली पर 50 लाख से लेकर 5 करोड़ रुपये तक खर्च होता है. यह पैसा कहां से आता है? कुछ हिस्सा राजनीतिक दलों के फंड से, और बाकी अप्रत्यक्ष रूप से जनता की जेब से—सरकारी संसाधनों, ट्रैफिक प्रबंधन, पुलिस ड्यूटी और लोकल इंफ्रास्ट्रक्चर के माध्यम से.
बड़ी विडंबना यह है कि जिन रैलियों का आयोजन “जनता की भलाई” के लिए किया जाता है, वे ही कई बार आम लोगों के लिए सिरदर्द बन जाती हैं—सड़कें बंद, अस्पतालों की ऐंबुलेंस अटक जाती हैं, और बच्चों की परीक्षाएं तक प्रभावित होती हैं.
यह भी पढ़े :-तेजस्वी यादव ने कहा लालू जी का सपना साकार
यह भी पढ़े :-मोदी बनाम तेजस्वी: वंदे भारत नहीं, बंद मिल चाहिए चालू!
पर्यावरण की कीमत पर राजनीतिक मुनाफा?
2025 में दिल्ली NCR में गर्मियों की भीषण लहर के दौरान हुई दो बड़ी रैलियों में प्रति रैली औसतन 150 टन कार्बन फुटप्रिंट उत्पन्न हुआ—वाहनों, जेनरेटरों और साउंड सिस्टम्स के उपयोग से. हजारों की संख्या में प्लास्टिक बोतलें, डिस्पोजेबल प्लेटें और बैनर शहर की सड़कों और नालियों में फेंक दिए गए.एक ओर सरकार “ग्रीन इंडिया मिशन” की बात करती है, और दूसरी ओर रैलियां उसके ही उद्देश्य को ठेंगा दिखाती हैं.

क्या जनता को चाहिए नई सियासी भाषा?
डिजिटल युग में सवाल यह नहीं कि रैली जरूरी है या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि क्या रैली के पारंपरिक रूप की अब भी जरूरत है? लाखों की भीड़, अरबों का खर्च और जमीन पर ना के बराबर असर—क्या सोशल मीडिया, लोकल जनसभाओं, और क्षेत्रीय संवाद मंचों से जनता तक सीधे नहीं पहुंचा जा सकता?
नॉर्वे, न्यूजीलैंड और जर्मनी जैसे देशों में अब चुनावी कैंपेन में फिजिकल रैलियों का प्रयोग धीरे-धीरे कम हो रहा है. इसके बजाय डेटा-ड्रिवन संवाद, पॉलिसी बेस्ड बहस और ऑनलाइन टाउनहॉल मीटिंग्स को तवज्जो दी जा रही है. भारत भी इस दिशा में सोच सकता है—यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति हो.

निष्कर्ष: भीड़ के पीछे की खामोशी को पहचानिए
भारत में रैलियां अब भीड़ का खेल बन चुकी हैं, न कि मुद्दों की लड़ाई। जब तक नेताओं से मंच पर जवाबदेही नहीं मांगी जाएगी, जब तक जनता मंच से नीचे खड़े होकर सवाल नहीं पूछेगी, तब तक यह राजनीतिक तमाशा यूं ही चलता रहेगा.
रैली की गूंज में अक्सर जनता की सिसकियाँ दब जाती हैं.अब वक्त है कि हम सिर्फ ताली बजाने वाली भीड़ नहीं, बल्कि सवाल पूछने वाले नागरिक बनें.
क्या आपको भी लगता है कि रैलियों का स्वरूप अब बदलना चाहिए? अपनी राय कमेंट सेक्शन में जरूर साझा करें
I am a blogger and social media influencer. I am engaging to write unbiased real content across topics like politics, technology, and culture. My main motto is to provide thought-provoking news, current affairs, science, technology, and political events from around the world.



















