भाकपा (माले) ने STF और जिला पुलिस पर लगाए संगीन सवाल
तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना,3 जनवरी 2025— बिहार के बेगूसराय जिले के तेघड़ा प्रखंड अंतर्गत नोनपुर गांव में 31 दिसंबर 2025 को हुई दयानंद मालाकार की मौत ने राज्य की कानून-व्यवस्था और पुलिस कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़ा कर दिया हैं.भाकपा (माले) ने इस घटना को मुठभेड़ मानने से साफ इनकार करते हुए इसे एक सुनियोजित फर्जी एनकाउंटर और नृशंस हत्या करार दिया है. पार्टी द्वारा गठित जांच दल की रिपोर्ट ने पुलिस के आधिकारिक दावों को कटघरे में खड़ा कर दिया है.
क्या है पूरा मामला?
भाकपा (माले) के अनुसार, 31 दिसंबर 2025 को शाम लगभग 4 बजे STF और भारी संख्या में पुलिस बल ने नोनपुर गांव में दयानंद मालाकार के घर को घेर लिया. उस समय दयानंद अपने घर पर आग ताप रहे थे.जांच में सामने आया कि चार पुलिसकर्मी घर के अंदर दाखिल हुआ और दयानंद को पकड़कर उनके कपड़े उतरवाए और उन्हें पास के निर्माणाधीन मकान में ले गया.
जांच दल का दावा
भाकपा (माले) द्वारा गठित पांच सदस्यीय जांच दल—नवल किशोर सिंह, चंद्रदेव वर्मा, बैजू सिंह, सुजीत सिंह कुशवाहा और सोनू फर्नाज,
ने गांव पहुंचकर घटनास्थल का निरीक्षण किया और ग्रामीणों से बातचीत किया.
जांच दल का आरोप है कि निर्माणाधीन मकान में ले जाकर दयानंद मालाकार को पहले सिर में और फिर छाती में चार गोलियां मारी गईं. इसके बाद पुलिस ने ऊपर चढ़कर हवाई फायरिंग की और शव को वहीं छोड़ दिया, ताकि मुठभेड़ का झूठा दृश्य तैयार किया जा सके.
मुठभेड़ के दावे पर सवाल
जांच दल के अनुसार घटनास्थल या आसपास की किसी भी दीवार पर गोली लगने के निशान नहीं पाया गया है. यह तथ्य मुठभेड़ की कहानी को पूरी तरह संदेह के घेरे में डाल देता है.गांव के लोगों ने भी एक स्वर में किसी भी प्रकार की मुठभेड़ से इनकार किया है.
ग्रामीणों के आरोप
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि हत्या के बाद पुलिस एक बोलेरो वाहन से हथियार लेकर आई और शव के पास रखकर फोटो खिंचवाई गई.इससे यह आशंका और गहरी हो जाती है कि घटना के बाद सबूत गढ़ा गया है.
परिवार पर कार्रवाई और दबाव
घटना के बाद पुलिस ने मृतक की पत्नी, बेटे और एक मजदूर को गिरफ्तार कर लिया. ग्रामीणों के विरोध और दबाव के बाद बेटे को तो रिहा कर दिया गया, लेकिन पत्नी और मजदूर को जेल भेज दिया गया. भाकपा (माले) ने इसे पीड़ित परिवार को डराने और दबाव में लेने की कार्रवाई बताया है.
जमीन विवाद और सामाजिक पृष्ठभूमि
जांच में यह भी सामने आया कि नोनपुर गांव में लगभग पांच बीघा जमीन पर दलित और गरीब परिवार वर्षों से झोपड़ियां बनाकर रह रहा हैं. इसके अतिरिक्त करीब तीन बीघा जमीन को गांव के नौजवान खेल मैदान के रूप में उपयोग करता हैं.
आरोप है कि जमींदारी और दबंग तत्व इस जमीन को खाली कराकर बेचने का दबाव बना रहा था . भाकपा (माले) का कहना है कि इसी साजिश के तहत दयानंद मालाकार की हत्या की गई, ताकि दलित-गरीब समुदाय में दहशत फैलाई जा सके.
पुलिस की आलोचना से ध्यान भटकाने की कोशिश?
भाकपा (माले) का दावा है कि जिले में चोरी, डकैती, बलात्कार, अपहरण और हत्या जैसी घटनाओं को लेकर पुलिस पहले से ही जनता के निशाने पर थी. इसी आलोचना से ध्यान हटाने और सख्त कार्रवाई दिखाने के लिए एक निर्दोष व्यक्ति को फर्जी मुठभेड़ में मार दिया गया.
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भाकपा (माले) की प्रमुख मांगें
भाकपा (माले) ने इस घटना को लेकर सरकार और प्रशासन से कई ठोस मांगें रखी हैं,
इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय न्यायिक जांच हो.
दोषी STF और पुलिस अधिकारियों की गिरफ्तारी व सख्त कार्रवाई.
पीड़ित परिवार को न्याय और समुचित मुआवजा.
दलित-गरीबों की जमीन और जीवन की सुरक्षा की कानूनी गारंटी.
पार्टी ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि इन मांगों पर कार्रवाई नहीं हुई तो राज्यव्यापी और व्यापक जनआंदोलन छेड़ा जाएगा.
निष्कर्ष
दयानंद मालाकार कांड केवल एक व्यक्ति की मौत का मामला नहीं है, बल्कि यह बिहार में पुलिस जवाबदेही, दलित-गरीबों की सुरक्षा और कानून के शासन से जुड़ा बड़ा सवाल है.यदि जांच दल के आरोप सही साबित होते हैं, तो यह घटना राज्य की न्याय व्यवस्था पर गहरा धब्बा होगी. ऐसे मामलों में पारदर्शी जांच और दोषियों पर कार्रवाई ही लोकतंत्र और संविधान में जनता का भरोसा कायम रख सकती है.

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