अडानी केस खारिज होने पर सुप्रिया श्रीनेत के सवाल: मोदी सरकार पर गंभीर आरोप

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Ajit Kumar

भारत
अडानी केस पर सुप्रिया श्रीनेत ने मोदी सरकार और अमेरिका से रिश्तों पर सवाल उठाए

अमेरिकी अदालत में अडानी केस खत्म होने के बाद सुप्रिया श्रीनेत ने मोदी सरकार की विदेश नीति और अमेरिकी दबाव पर उठाए सवाल

तीसरा पक्ष ब्यूरो नई दिल्लीः अडानी समूह से जुड़े अमेरिका के चर्चित रिश्वत और धोखाधड़ी मामले के खत्म होने के बाद भारत की राजनीति में एक बार फिर गौतम अडानी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबंधों को लेकर बहस तेज हो गई है. कांग्रेस नेता सुप्रिया श्रीनेत ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट के जरिए इस पूरे घटनाक्रम को भारत-अमेरिका संबंधों, व्यापारिक समझौतों और प्रधानमंत्री मोदी की विदेश नीति से जोड़ते हुए कई गंभीर सवाल उठाए हैं.

हालांकि, इन राजनीतिक आरोपों और अमेरिकी अदालत में हुई कानूनी कार्रवाई को अलग-अलग समझना जरूरी है. उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिकी जिला न्यायाधीश निकोलस गराउफिस ने अडानी के खिलाफ आपराधिक मामले को खारिज करने की अनुमति दी, लेकिन इससे पहले उन्होंने अमेरिकी न्याय विभाग की केस वापस लेने की प्रक्रिया और उसके तर्कों पर गंभीर सवाल उठाए थे.

अमेरिकी अदालत में आखिर हुआ क्या?

गौतम अडानी और उनके सहयोगियों के खिलाफ अमेरिकी अभियोग 2024 में सामने आया था. अमेरिकी अभियोजन पक्ष का आरोप था कि भारत में सौर ऊर्जा से जुड़े ठेके हासिल करने के लिए भारतीय अधिकारियों को रिश्वत देने की योजना बनाई गई और अमेरिकी निवेशकों को गुमराह किया गया. अडानी समूह और संबंधित पक्षों ने इन आरोपों से इनकार किया था.

2026 में अमेरिकी न्याय विभाग ने इस आपराधिक मामले में आगे संसाधन खर्च नहीं करने का निर्णय लिया और अदालत से आरोपों को खारिज करने का अनुरोध किया था.इसके बाद न्यायाधीश ने सरकार से इस फैसले के पीछे पर्याप्त तथ्य और कारण बताने को कहा था. जून में अदालत ने पाया था कि सरकार की शुरुआती दलीलें पर्याप्त रूप से स्पष्ट नहीं थीं.

10 अगस्त 2026 को न्यायाधीश गराउफिस ने मामले को खारिज करने की अनुमति दिया,लेकिन अपने फैसले में उन्होंने न्याय विभाग के वरिष्ठ अधिकारी ट्रेंट मैककॉट्टर की कार्यप्रणाली पर आलोचनात्मक टिप्पणी की और सरकार द्वारा मामले को छोड़ने की प्रक्रिया को असामान्य बताया. Reuters के अनुसार, न्यायाधीश ने यह भी स्पष्ट किया कि अडानी की अमेरिका में 10 अरब डॉलर के निवेश की प्रतिबद्धता को उन्होंने केस खत्म करने का कारण नहीं माना.

यही वह बिंदु है जिसने इस मामले को सिर्फ एक कानूनी खबर से आगे बढ़ाकर राजनीतिक बहस का विषय बना दिया है.

सुप्रिया श्रीनेत ने क्या सवाल उठाए?

कांग्रेस नेता सुप्रिया श्रीनेत ने X पर लिखा कि अमेरिकी अदालत द्वारा अडानी के खिलाफ चल रहे रिश्वत और धोखाधड़ी मामले को खत्म करने के दौरान न्यायाधीश ने इसे असामान्य बताया. इसके बाद उन्होंने सवाल उठाया कि जिस मामले की अमेरिकी एजेंसियां लंबे समय से जांच कर रही थीं, उसे अचानक खत्म करने की पैरवी क्यों की गई.

श्रीनेत का आरोप है कि अडानी को मिली इस कानूनी राहत के पीछे भारत के राष्ट्रीय हितों से समझौता किया गया.उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति और अमेरिका के साथ उनके संबंधों से जुड़े कई पुराने घटनाक्रमों को एक साथ रखकर पाठकों से कहा कि इन घटनाओं के बीच संबंधों को समझने की जरूरत है.

यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि श्रीनेत द्वारा लगाए गए राजनीतिक आरोप अभी आरोप ही हैं. उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी से यह साबित नहीं होता कि भारत सरकार और अमेरिकी प्रशासन के बीच अडानी मामले को खत्म करने के बदले कोई समझौता हुआ था.अदालत ने भी अडानी के 10 अरब डॉलर के निवेश वादे को केस खारिज करने का प्रमाणित कारण नहीं माना.

ऑपरेशन सिंदूर और सीजफायर का सवाल

सुप्रिया श्रीनेत ने अपने पोस्ट में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान घोषित सीजफायर को भी इस पूरे राजनीतिक तर्क से जोड़ने की कोशिश की है.उन्होंने सवाल किया कि संघर्ष के दौरान अमेरिका की भूमिका क्या थी और सीजफायर की घोषणा को लेकर प्रधानमंत्री मोदी ने अमेरिकी भूमिका पर पर्याप्त जवाब क्यों नहीं दिया.

यह मुद्दा भारत की विदेश नीति और अमेरिका-पाकिस्तान संबंधों के संदर्भ में राजनीतिक रूप से संवेदनशील है. लेकिन अडानी मामले के साथ इसका कोई प्रत्यक्ष कानूनी या आधिकारिक संबंध सामने आया है, ऐसा प्रमाण उपलब्ध नहीं है.

इसलिए दोनों घटनाओं को जोड़ते समय तथ्य और राजनीतिक व्याख्या के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है.

व्यापार समझौते और अमेरिका पर निर्भरता का मुद्दा

श्रीनेत ने भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों को लेकर भी मोदी सरकार पर निशाना साधा है. उनका आरोप है कि सरकार ने ऐसी व्यापारिक शर्तें स्वीकार कीं जिनका नुकसान भारतीय किसानों, कारोबारियों और अर्थव्यवस्था को हो सकता है, जबकि अमेरिका को अधिक फायदा मिलता है.

यह आरोप व्यापक आर्थिक नीति से जुड़ा हुआ है. किसी भी व्यापार समझौते का वास्तविक प्रभाव समझने के लिए केवल राजनीतिक बयान पर्याप्त नहीं होते।. इसमें टैरिफ, आयात-निर्यात, कृषि उत्पाद, घरेलू उद्योग, निवेश और बाजार पहुंच जैसे अलग-अलग पहलुओं का विश्लेषण आवश्यक होता है.

इसलिए श्रीनेत के आरोपों को राजनीतिक प्रतिक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए, जबकि व्यापार समझौते के वास्तविक प्रभाव का मूल्यांकन अलग आर्थिक आंकड़ों के आधार पर किया जाना चाहिए.

अमेरिका में भारतीयों के साथ व्यवहार पर भी सवाल

कांग्रेस नेता ने अमेरिका में भारतीय नागरिकों के निर्वासन और कथित अमानवीय व्यवहार को लेकर भी प्रधानमंत्री मोदी की चुप्पी पर सवाल उठाया. उन्होंने आरोप लगाया कि भारतीयों को हथकड़ी और बेड़ियों में वापस भेजे जाने के बावजूद सरकार ने पर्याप्त कड़ा विरोध नहीं किया.

यह मुद्दा भारत-अमेरिका संबंधों में प्रवासी भारतीयों और मानवाधिकारों की भूमिका को सामने लाता है. श्रीनेत का तर्क है कि यदि सरकार अमेरिका के साथ मजबूत संबंधों का दावा करती है तो उसे भारतीय नागरिकों के सम्मान और अधिकारों के सवाल पर भी उतनी ही दृढ़ता दिखानी चाहिए.

ट्रंप के बयानों को लेकर कांग्रेस का हमला

श्रीनेत ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उन बयानों का भी उल्लेख किया जिनमें उन्होंने भारत और प्रधानमंत्री मोदी से जुड़े कई मुद्दों पर सार्वजनिक रूप से अपनी भूमिका या दावे रखे.

उनका सवाल मूलतः यह है कि यदि अमेरिकी राष्ट्रपति भारत की विदेश नीति, व्यापार और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर सार्वजनिक बयान देते हैं तो भारत सरकार की प्रतिक्रिया इतनी सीमित क्यों दिखाई देती है?

यहीं से कांग्रेस का राजनीतिक तर्क आगे बढ़ता है. विपक्ष का कहना है कि मोदी सरकार अमेरिका के साथ संबंधों को बनाए रखने के लिए कई मुद्दों पर अपेक्षित कठोरता नहीं दिखा रही है.

लेकिन यह भी ध्यान रखना होगा कि किसी प्रधानमंत्री की सार्वजनिक प्रतिक्रिया या चुप्पी को सीधे तौर पर किसी कारोबारी मामले में हस्तक्षेप का प्रमाण नहीं माना जा सकता.

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अडानी मामले में सबसे बड़ा सवाल क्या है?

पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि अमेरिकी न्याय विभाग ने एक हाई-प्रोफाइल आपराधिक मामले को आगे बढ़ाने के बजाय उसे खत्म करने का निर्णय क्यों लिया?

अमेरिकी सरकार ने मामले से पीछे हटने के लिए अभियोजन संबंधी विवेकाधिकार, मामले की कठिनाइयों और आगे संसाधन लगाने की प्राथमिकताओं जैसे कारण बताए. वहीं न्यायाधीश ने सरकार की प्रक्रिया और उसके तर्कों की पर्याप्तता पर सवाल उठाए.

यही विरोधाभास इस मामले को महत्वपूर्ण बनाता है.

एक तरफ अमेरिकी सरकार कहती है कि वह मामले में आगे संसाधन नहीं लगाना चाहती. दूसरी तरफ अदालत इस निर्णय के पीछे पर्याप्त तथ्य और प्रक्रिया को लेकर सवाल करती है. इसके साथ अडानी की अमेरिका में बड़े निवेश की प्रतिबद्धता का संदर्भ सामने आता है, भले ही अदालत ने इसे केस खत्म करने का प्रमाणित कारण नहीं माना.

क्या अडानी को पूरी तरह कानूनी क्लीन चिट मिल गई?

यहां भी सावधानी जरूरी है. आपराधिक मामले का खारिज होना और सभी आरोपों से हर स्तर पर क्लीन चिट मिल जाना एक ही बात नहीं है.

Reuters के अनुसार, अडानी ने संबंधित अमेरिकी नागरिक मामले में 6 मिलियन डॉलर का भुगतान करने पर सहमति जताई, जबकि उनके भतीजे सागर अडानी ने 12 मिलियन डॉलर का भुगतान किया.Adani Enterprises ने ईरान प्रतिबंधों से जुड़े आरोपों को लेकर 275 मिलियन डॉलर के समझौते पर भी सहमति जताई.

इसलिए पूरे घटनाक्रम को केवल,अडानी केस खत्म कहकर छोड़ देना अधूरा होगा. आपराधिक कार्यवाही, नागरिक कार्रवाई और प्रतिबंध संबंधी मामलों की कानूनी स्थिति अलग-अलग है.

अब राजनीतिक बहस किस दिशा में जाएगी?

सुप्रिया श्रीनेत का X पोस्ट इसी कानूनी घटनाक्रम को एक बड़े राजनीतिक सवाल में बदल देता है,क्या भारत की विदेश नीति में कारोबारी हितों और राष्ट्रीय हितों के बीच कोई टकराव पैदा हुआ है?

कांग्रेस का आरोप है कि प्रधानमंत्री मोदी ने अडानी को राहत दिलाने के लिए भारत के हितों से समझौता किया. लेकिन इस दावे को साबित करने के लिए किसी प्रत्यक्ष दस्तावेज, आधिकारिक समझौते या अदालत द्वारा स्थापित तथ्य की जरूरत होगी. फिलहाल सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी ऐसी किसी डील को स्थापित नहीं करती है .

इसलिए इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू आरोप नहीं, बल्कि पारदर्शिता है.

अमेरिकी अदालत ने जिस तरह न्याय विभाग की प्रक्रिया पर सवाल उठाए, उससे यह जरूर स्पष्ट होता है कि केस वापस लेने का फैसला सामान्य कानूनी प्रक्रिया से जुड़ा हुआ एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम था.

भारत में अब सवाल यह है कि सरकार इस पूरे घटनाक्रम पर कितनी जानकारी सार्वजनिक करती है और विपक्ष के आरोपों का क्या जवाब देती है.

अडानी मामले की कानूनी कहानी भले ही अमेरिकी अदालत में एक महत्वपूर्ण मोड़ पर पहुंच गई हो, लेकिन इसके राजनीतिक सवाल भारत में अभी खत्म नहीं हुए हैं। सुप्रिया श्रीनेत ने जिन अलग-अलग घटनाओं को जोड़कर सवाल खड़े किए हैं, उनका आपस में सीधा संबंध साबित करना अभी बाकी है. लेकिन उनके सवालों ने एक बड़ी बहस जरूर शुरू कर दी है,विदेश नीति, राष्ट्रीय हित और बड़े कारोबारी समूहों के बीच सरकार की प्राथमिकताएं आखिर तय कैसे होती हैं?

यही सवाल आने वाले दिनों में इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक केंद्र बन सकता है.

निष्कर्ष

अडानी मामले में अमेरिकी अदालत की कार्यवाही ने एक गंभीर कानूनी और राजनीतिक बहस को जन्म दिया है. कांग्रेस नेता सुप्रिया श्रीनेत ने इस घटनाक्रम को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति, अमेरिका के साथ संबंधों और राष्ट्रीय हितों से जोड़ते हुए कई सवाल उठाए हैं. हालांकि, अडानी को राहत दिलाने के लिए भारत सरकार ने किसी समझौते के तहत राष्ट्रीय हितों से समझौता किया,इस दावे का अभी सार्वजनिक रूप से कोई निर्णायक प्रमाण सामने नहीं आया है.

फिर भी अमेरिकी न्याय विभाग द्वारा मामले को आगे न बढ़ाने का फैसला और अदालत की असामान्य प्रक्रिया पर टिप्पणी पारदर्शिता की मांग को मजबूत करती है. अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि सरकार इन आरोपों पर क्या जवाब देती है और क्या वह पूरे घटनाक्रम से जुड़े तथ्यों को सार्वजनिक करने के लिए तैयार है. राजनीतिक आरोपों से अलग, जनता के लिए जरूरी है कि अडानी मामले, भारत-अमेरिका संबंधों और राष्ट्रीय हित से जुड़े हर दावे की जांच तथ्यों और आधिकारिक दस्तावेजों के आधार पर हो.

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