पटना विश्वविद्यालय अधिनियम 1976 पर विवाद, आइसा ने उठाई स्वायत्तता की आवाज

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Ajit Kumar

बिहार
पटना कॉलेज में पटना विश्वविद्यालय की स्वायत्तता को लेकर आइसा की छात्र-शिक्षक-कर्मचारी परिचर्चा

छात्र–शिक्षक–कर्मचारी एकजुटता से पटना विश्वविद्यालय की स्वायत्तता बचाने का आह्वान

तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना, 13 अगस्त 2026: पटना विश्वविद्यालय की स्वायत्तता और उसके प्रशासनिक ढांचे को लेकर छात्र संगठनों के बीच बहस तेज होती दिखाई दे रही है. इसी मुद्दे पर ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) की पटना विश्वविद्यालय इकाई ने 13 अगस्त को पटना कॉलेज कैंटीन के सामने छात्र–शिक्षक–कर्मचारी परिचर्चा का आयोजन किया.कार्यक्रम में पटना कॉलेज और वाणिज्य महाविद्यालय के बड़ी संख्या में छात्र शामिल हुए.

परिचर्चा का मुख्य मुद्दा पटना विश्वविद्यालय अधिनियम, 1976 को समाप्त करने के प्रस्ताव का विरोध और विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता की रक्षा रहा. आइसा ने इसे केवल पटना विश्वविद्यालय तक सीमित विषय न बताते हुए बिहार की उच्च शिक्षा व्यवस्था में संस्थागत स्वायत्तता और लोकतांत्रिक भागीदारी से जुड़ा सवाल बताया है.

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आइसा ने छात्र–शिक्षक–कर्मचारी एकता पर दिया जोर

कार्यक्रम का संचालन आइसा पटना विश्वविद्यालय की सचिव कॉमरेड सबा आफ़रीन ने किया. परिचर्चा में विश्वविद्यालय के कर्मचारियों, पूर्व छात्रों और छात्र नेताओं ने अपने विचार रखे.

पटना विश्वविद्यालय कर्मचारी संघ के अध्यक्ष सुबोध ने कहा कि उनके अनुसार पटना विश्वविद्यालय अधिनियम, 1976 विश्वविद्यालय की स्वायत्तता, लोकतांत्रिक चरित्र और अकादमिक गरिमा का महत्वपूर्ण आधार है. उन्होंने आशंका जताई कि यदि विश्वविद्यालय के संचालन में नौकरशाही का नियंत्रण बढ़ता है, तो उच्च शिक्षा की स्वतंत्रता और संस्थागत निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित हो सकती है.

उन्होंने इस मुद्दे पर छात्र और कर्मचारी संगठनों की एकजुटता को महत्वपूर्ण बताते हुए साझा आंदोलन की आवश्यकता पर जोर दिया.

विश्वविद्यालयों में बढ़ते केंद्रीकरण का मुद्दा

एआईसीसीटीयू के नेता और पटना विश्वविद्यालय के पूर्ववर्ती छात्र कॉमरेड रणविजय ने भी विश्वविद्यालयों में बढ़ते केंद्रीकरण के खिलाफ व्यापक जनप्रतिरोध की जरूरत बताई.

वहीं आइसा नेताओं सबा आफ़रीन, आदर्श, आशीष, अनुज और आज़ाद ने छात्रों को संबोधित करते हुए कहा कि विश्वविद्यालय को केवल सरकारी विभाग के विस्तार के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. उनके अनुसार विश्वविद्यालय एक ऐसा शैक्षणिक और लोकतांत्रिक संस्थान है, जिसमें छात्रों, शिक्षकों और कर्मचारियों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है.

आइसा का तर्क है कि पटना विश्वविद्यालय की स्वायत्तता से जुड़ा सवाल व्यापक रूप से बिहार की उच्च शिक्षा व्यवस्था के भविष्य से जुड़ता है.संगठन का कहना है कि विश्वविद्यालयों के प्रशासनिक और अकादमिक निर्णयों में स्वायत्तता तथा लोकतांत्रिक भागीदारी बनी रहनी चाहिए.

क्या है विवाद का केंद्र?

इस पूरे मामले में मुख्य बहस पटना विश्वविद्यालय अधिनियम, 1976 को लेकर प्रस्तावित बदलाव और उसके संभावित प्रभावों पर केंद्रित है. आइसा का विरोध इसी प्रस्ताव के खिलाफ है.

हालांकि, उपलब्ध प्रेस विज्ञप्ति में प्रस्तावित नए प्रावधानों की विस्तृत कानूनी भाषा, सरकार की ओर से अंतिम निर्णय या प्रस्ताव के सभी बिंदुओं का उल्लेख नहीं किया गया है. इसलिए इस विषय पर अंतिम कानूनी स्थिति स्पष्ट करने के लिए संबंधित सरकारी दस्तावेज, विधेयक या आधिकारिक अधिसूचना को देखना आवश्यक होगा.

यही कारण है कि इस मुद्दे पर छात्र संगठनों की मांग और सरकार की आधिकारिक स्थिति के बीच अंतर को समझना महत्वपूर्ण होगा.

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सेव पटना यूनिवर्सिटी अभियान होगा व्यापक

परिचर्चा के बाद आइसा ने अपने अभियान को और व्यापक करने की घोषणा की. संगठन ने एक इंच पीछे नहीं हटेंगे! PU की स्वायत्तता की गारंटी लेकर रहेंगे!के संकल्प के साथ सेव पटना यूनिवर्सिटी अभियान को आगे बढ़ाने की बात कही है.

इस घोषणा से संकेत मिलता है कि आने वाले दिनों में विश्वविद्यालय की स्वायत्तता का मुद्दा छात्र राजनीति में और प्रमुख हो सकता है. छात्र–शिक्षक–कर्मचारी संगठनों की संयुक्त सक्रियता इस बहस को विश्वविद्यालय परिसर से बाहर भी ले जा सकती है.

कार्यक्रम में ये लोग रहे मौजूद

कार्यक्रम में आइसा पटना विश्वविद्यालय की सचिव कॉमरेड सबा आफ़रीन, उपाध्यक्ष कॉमरेड आशीष, पटना कॉलेज सचिव कॉमरेड आदर्श, दरभंगा हाउस अध्यक्ष कॉमरेड आज़ाद के अलावा मोनू, रोहन, अनुज, विवेक आनंद सुंदर, अमृता, शीनू और जुनैद सहित कई छात्र कार्यकर्ता उपस्थित रहे.

आगे क्या?

पटना विश्वविद्यालय अधिनियम, 1976 में प्रस्तावित बदलाव को लेकर आगे की तस्वीर सरकार और संबंधित संस्थानों के आधिकारिक कदमों से स्पष्ट होगी. फिलहाल आइसा ने इस मुद्दे को छात्र–शिक्षक–कर्मचारी एकता के साथ उठाने का फैसला किया है.

यह विवाद केवल किसी एक अधिनियम में बदलाव का सवाल नहीं है, बल्कि इसके केंद्र में यह व्यापक प्रश्न भी है कि विश्वविद्यालयों की प्रशासनिक स्वायत्तता, अकादमिक स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक भागीदारी का स्वरूप भविष्य में कैसा रहेगा.

निष्कर्ष:

13 अगस्त की परिचर्चा के जरिए आइसा ने पटना विश्वविद्यालय अधिनियम, 1976 को लेकर अपनी आपत्ति स्पष्ट कर दी है. संगठन अब ‘सेव पटना यूनिवर्सिटी’ अभियान को व्यापक बनाने की तैयारी में है. ऐसे में आने वाले दिनों में छात्र संगठनों, विश्वविद्यालय समुदाय और सरकार के बीच इस मुद्दे पर बहस और तेज होने की संभावना है.

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