पटना में सावित्रीबाई फुले जयंती, 3 से 9 जनवरी तक बहनापा अभियान
तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना,3 जनवरी 2025 भारत के सामाजिक इतिहास में सावित्रीबाई फुले का नाम महिला शिक्षा, सामाजिक न्याय और बराबरी की लड़ाई का प्रतीक है. 3 जनवरी को उनकी जयंती के अवसर पर अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला एसोसिएशन (ऐपवा) और भाकपा(माले) ने पटना सहित बिहार के कई जिलों में कार्यक्रम आयोजित कर उनके विचारों को जन-जन तक पहुंचाने का संकल्प लिया. इस अवसर पर 3 से 9 जनवरी तक बहनापा अभियान चलाने की घोषणा की गई, जो महिलाओं के अधिकार, सम्मान और समानता के संघर्ष को नई ऊर्जा देने का प्रयास है.
पटना से बिहार तक जयंती समारोह
पटना के दरोगा राय पथ स्थित ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर कार्यक्रम की शुरुआत हुई. उपस्थित लोगों ने दो मिनट का मौन रखकर महान समाज सुधारकों को श्रद्धांजलि दी. इसी तरह दरभंगा, गया सहित राज्य के अन्य हिस्सों में भी सावित्रीबाई फुले की जयंती उत्साह और वैचारिक प्रतिबद्धता के साथ मनाई गई.
इस अवसर पर भाकपा(माले) के राज्य सचिव का. कुणाल, ऐपवा की महासचिव मीना तिवारी, के.डी. यादव, दिव्या गौतम, मीरा दत्त, जितेंद्र कुमार सहित अनेक सामाजिक कार्यकर्ता और महिला नेता मौजूद रहे.
बहनापा अभियान का उद्देश्य
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए ऐपवा की महासचिव मीना तिवारी ने कहा कि सावित्रीबाई फुले की विरासत को आगे बढ़ाते हुए लड़कियों के लिए मुफ्त और सुलभ शिक्षा, सभी धर्मों और समुदायों की महिलाओं के सम्मान, तथा सत्ता संरक्षित बलात्कार और पितृसत्तात्मक संस्कृति के खिलाफ संघर्ष को तेज करने के लिए बहनापा अभियान की शुरुआत की गई है.
उन्होंने स्पष्ट किया कि यह अभियान केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर महिलाओं को संगठित कर उनके अधिकारों के लिए आवाज़ बुलंद करने का प्रयास है.
सावित्रीबाई फुले और फातिमा शेख की साझी विरासत
वक्ताओं ने इस बात पर विशेष ज़ोर दिया कि फातिमा शेख और उनके भाई उस्मान शेख को याद किए बिना सावित्रीबाई और ज्योतिराव फुले के संघर्ष को पूरी तरह समझा नहीं जा सकता है . जब सावित्रीबाई फुले ने ब्राह्मणवादी और मनुवादी सामाजिक संरचनाओं को चुनौती देकर लड़कियों की शिक्षा की शुरुआत की, तब समाज के बड़े हिस्से ने उनका विरोध किया.
उस दौर में शासक अंग्रेजों ने उनके शैक्षणिक प्रयासों को कुछ हद तक समर्थन दिया, लेकिन आज़ाद भारत में शिक्षा को जिस तरह महंगा और निजीकरण आधारित बनाया गया है, उसने गरीब और वंचित तबके की लड़कियों के लिए उच्च शिक्षा को लगभग असंभव बना दिया है.
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आज की शिक्षा व्यवस्था पर सवाल
कार्यक्रम में वक्ताओं ने मौजूदा शिक्षा नीति पर भी गंभीर सवाल उठाया. उन्होंने कहा कि आज शिक्षा एक अधिकार से ज़्यादा मुनाफे का साधन बनती जा रही है.। सरकारी स्कूलों और कॉलेजों की उपेक्षा, बढ़ती फीस और निजी संस्थानों की मनमानी का सीधा असर लड़कियों की पढ़ाई पर पड़ रहा है.
ग्रामीण, दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक समुदायों की लड़कियां आज भी शिक्षा से वंचित हैं, जबकि सावित्रीबाई फुले का सपना था कि शिक्षा समाज में बराबरी की नींव बने.
महिला सम्मान और सुरक्षा का सवाल
बहनापा अभियान के तहत महिला सुरक्षा और सम्मान को भी केंद्र में रखा गया है.वक्ताओं ने कहा कि आज देश में महिलाओं के खिलाफ हिंसा, यौन उत्पीड़न और बलात्कार की घटनाएं बढ़ रही हैं, और कई मामलों में सत्ता और प्रशासन की चुप्पी या संरक्षण देखने को मिलता है.
ऐपवा और भाकपा(माले) ने स्पष्ट किया कि यह अभियान न्याय, जवाबदेही और संवेदनशील शासन की मांग को मजबूती से उठाएगा.
सामाजिक बदलाव की दिशा में कदम
सावित्रीबाई फुले की जयंती पर आयोजित यह कार्यक्रम केवल श्रद्धांजलि तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह सामाजिक बदलाव का आह्वान भी था. बहनापा अभियान के माध्यम से महिलाओं के बीच एकजुटता, आपसी सहयोग और साझा संघर्ष की भावना को मजबूत करने का प्रयास किया जा रहा है.
निष्कर्ष
सावित्रीबाई फुले ने जिस समाज का सपना देखा था, वहां शिक्षा, समानता और सम्मान हर व्यक्ति का अधिकार हो.आज जब शिक्षा का निजीकरण, महिलाओं पर बढ़ती हिंसा और सामाजिक असमानता जैसी चुनौतियां सामने हैं, तब बहनापा अभियान जैसे प्रयास उनकी विरासत को आगे बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हैं.
यह अभियान न सिर्फ महिलाओं की आवाज़ को मजबूती देगा, बल्कि समाज को यह याद दिलाएगा कि समानता और न्याय की लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है.

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