जयंती पर याद की गई भारत की पहली शिक्षिका सावित्रीबाई फुले

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Ajit Kumar

बिहार
जयंती पर याद की गई भारत की पहली शिक्षिका सावित्रीबाई फुले

नई शिक्षा नीति 2020 के विरोध में पटना कॉलेज में विचार गोष्ठी का आयोजन

तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना, 03 जनवरी 2026 — भारत की पहली शिक्षिका, महान समाज सुधारक और महिला शिक्षा की अग्रदूत सावित्रीबाई फुले की जयंती के अवसर पर आज पटना कॉलेज के भाषा भवन में एक महत्वपूर्ण परिचर्चा एवं स्मरण कार्यक्रम का आयोजन किया गया. कार्यक्रम में छात्र-छात्राओं, शिक्षकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने बड़ी संख्या में भाग लेकर सावित्रीबाई फुले के संघर्ष, विचार और शिक्षा-दृष्टि को याद किया.

इस अवसर पर आयोजित परिचर्चा का विषय था,
पितृसत्तात्मक समाज और मनुवादी शिक्षा व्यवस्था के खिलाफ एक गौरवशाली लड़ाई.
जिसके माध्यम से सावित्रीबाई फुले के ऐतिहासिक योगदान को आज की शिक्षा व्यवस्था से जोड़कर देखा गया.

शिक्षा को हथियार बनाकर समाज परिवर्तन की शुरुआत

परिचर्चा की शुरुआत करते हुए आइसा राज्य परिषद सदस्य प्रीति पासवान ने संचालन करते हुए कहा कि सावित्रीबाई फुले केवल एक शिक्षिका नहीं थीं, बल्कि वे सामाजिक क्रांति की प्रतीक थीं. उन्होंने 19वीं सदी में उस समय लड़कियों और दलित-पिछड़े समुदायों को शिक्षा का अधिकार दिलाने का संघर्ष किया, जब समाज में शिक्षा पर मुट्ठीभर लोगों का एकाधिकार था.

उन्होंने कहा कि सावित्रीबाई फुले ने शिक्षा को शोषण से मुक्ति का सबसे बड़ा हथियार माना और जीवन भर उसी दिशा में संघर्ष किया.

नई शिक्षा नीति 2020 पर गंभीर सवाल

कार्यक्रम में वक्ताओं ने नई शिक्षा नीति 2020 (NEP 2020) को लेकर गंभीर चिंताएं व्यक्त कीं. वक्ताओं का कहना था कि यह नीति शिक्षा के भगवाकरण और निजीकरण को बढ़ावा देती है, जिससे वंचित तबकों के लिए शिक्षा और अधिक कठिन होती जा रही है.

पटना कॉलेज काउंसिल मेंबर कॉमरेड अदिति सिंह ने कहा,

सावित्रीबाई फुले मनुवादी व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष की जीवंत मिसाल हैं. आज जब सरकारी शिक्षा पर लगातार हमले हो रहे हैं, तब छात्र समुदायों को एकजुट होकर इसके खिलाफ खड़ा होना होगा.

उन्होंने यह भी कहा कि शिक्षा को बाजार के हवाले करना सामाजिक समानता के विचार के खिलाफ है और यह सावित्रीबाई फुले के सपनों के भारत से सीधा टकराव है.

उच्च शिक्षा में महिलाओं की घटती भागीदारी

आइसा नेत्री कॉमरेड सबा ने अपने संबोधन में कहा कि आज भी उच्च शिक्षा में महिलाओं की भागीदारी संतोषजनक नहीं है. उन्होंने कहा,

कैंपस आज भी महिलाओं के लिए पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं. असुरक्षा, लैंगिक भेदभाव और संसाधनों की कमी के कारण कई छात्राएं पढ़ाई छोड़ने को मजबूर हो रही हैं.

उन्होंने जोर देकर कहा कि सावित्रीबाई फुले की प्रेरणा से आइसा महिलाओं की शिक्षा और समान भागीदारी की लड़ाई को आगे बढ़ा रही है.

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सावित्रीबाई फुले की विरासत और आज की चुनौती

परिचर्चा में मौजूद अन्य वक्ताओं,सोनाक्षी, प्राची, स्वराज सहित कई छात्र-छात्राओं ने भी अपने विचार रखे. वक्ताओं ने कहा कि सावित्रीबाई फुले की लड़ाई आज भी अधूरी है. पितृसत्ता, जातिवाद और शिक्षा के निजीकरण के रूप में वही चुनौतियां नए रूप में सामने खड़ी हैं.

सावित्रीबाई फुले ने जिस समतामूलक और वैज्ञानिक शिक्षा व्यवस्था का सपना देखा था, वह आज भी संघर्ष की मांग करती है। ऐसे समय में उनके विचार केवल स्मरण का विषय नहीं, बल्कि संघर्ष का मार्गदर्शन हैं.

शिक्षा के लोकतंत्रीकरण की जरूरत

वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि शिक्षा को लोकतांत्रिक, समावेशी और समान अवसर आधारित बनाना समय की सबसे बड़ी जरूरत है. सरकारी शिक्षा संस्थानों को मजबूत करना, छात्रवृत्तियों का विस्तार करना और महिलाओं व वंचित वर्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करना ही सावित्रीबाई फुले को सच्ची श्रद्धांजलि होगी.

निष्कर्ष: सावित्रीबाई फुले आज भी प्रासंगिक

कार्यक्रम का समापन इस संकल्प के साथ हुआ कि सावित्रीबाई फुले के विचारों को केवल जयंती तक सीमित नहीं रखा जाएगा, बल्कि शिक्षा, समानता और सामाजिक न्याय की लड़ाई को निरंतर आगे बढ़ाया जाएगा.

आज जब शिक्षा को संकीर्ण विचारधाराओं के अधीन करने की कोशिशें हो रही हैं, तब सावित्रीबाई फुले की विरासत हमें याद दिलाती है कि शिक्षा सवाल पूछने, बराबरी सिखाने और अन्याय के खिलाफ खड़े होने का माध्यम है.

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