चित्तरंजन गगन ने कहा, विद्यालयों के नाम बदलने से संस्थापकों और भूमि दाताओं की भावनाएं आहत
तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना : बिहार सरकार द्वारा राज्य के 551 चयनित उच्च माध्यमिक विद्यालयों को आदर्श विद्यालय के रूप में विकसित करने की पहल के तहत मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने इन विद्यालयों का उद्घाटन किया. इस योजना का उद्देश्य विद्यालयों में बेहतर शैक्षणिक वातावरण, आधुनिक सुविधाएं और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना बताया गया है.
हालांकि उद्घाटन के साथ ही इन विद्यालयों के नामकरण को लेकर राजनीतिक विवाद भी सामने आ गया है. राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के प्रदेश प्रवक्ता चित्तरंजन गगन ने आरोप लगाया है कि कई पुराने विद्यालयों के मूल नाम के साथ, सरस्वती विद्या निकेतन जोड़ने से विद्यालयों की ऐतिहासिक पहचान प्रभावित हुई है और इससे संस्थापकों व भूमि दाताओं की भावनाएं आहत हुई हैं.
राजद ने क्या कहा?
राजद प्रवक्ता चित्तरंजन गगन ने जारी बयान में कहा कि जिन विद्यालयों का चयन आदर्श विद्यालय के रूप में किया गया है, उनमें अनेक ऐसे विद्यालय शामिल हैं जिनकी स्थापना वर्षों पहले स्थानीय लोगों, समाजसेवियों या भूमि दाताओं के सहयोग से हुई थी. इन विद्यालयों के नाम संस्थापकों या उनके पूर्वजों की स्मृति में रखे गए थे और सरकार ने भी उसी नाम से उन्हें मान्यता प्रदान की थी.
उनका कहना है कि अब इन विद्यालयों के नाम के साथ, सरस्वती विद्या निकेतन जोड़कर मूल पहचान को गौण कर दिया गया है, जिससे विद्यालय की ऐतिहासिक विरासत प्रभावित होती है.

अपने विद्यालय का उदाहरण देकर जताई आपत्ति
चित्तरंजन गगन ने अपने परिवार से जुड़े एक विद्यालय का उदाहरण भी दिया.उन्होंने बताया कि उनके पिता स्वर्गीय पंडित विन्ध्येश्वरी प्रसाद मिश्र ने अपनी निजी भूमि दान देकर वैशाली जिले के गोरौल प्रखंड स्थित श्री राम परीक्षण चन्द्र ज्योति (श्री आरपीसीजे) उच्च माध्यमिक विद्यालय, बेलबर घाट की स्थापना की थी.
उनके अनुसार अब इस विद्यालय का नाम “सरस्वती विद्या निकेतन (आदर्श विद्यालय) आरपीसीजे उच्च माध्यमिक विद्यालय, बेलबर घाट, गोरौल, वैशाली कर दिया गया है. उनका दावा है कि इस प्रकार का नाम न केवल लंबा और असंगत प्रतीत होता है, बल्कि इससे विद्यालय का मूल नाम भी पीछे छूट जाता है.
उन्होंने सुझाव दिया कि यदि नया नाम जोड़ना ही था तो श्री राम परीक्षण चन्द्र ज्योति सरस्वती विद्या निकेतन जैसे स्वरूप पर विचार किया जा सकता था, जिससे मूल पहचान भी बनी रहती और नई योजना का उद्देश्य भी पूरा होता.
केवल एक विद्यालय का नहीं, कई संस्थानों का मामला
राजद प्रवक्ता का कहना है कि यह मुद्दा केवल एक विद्यालय तक सीमित नहीं है. उनके अनुसार राज्य के कई ऐसे विद्यालय हैं जिनके संस्थापक, भूमि दाता और स्थानीय लोग इसी तरह की आपत्ति जता रहे हैं.
उन्होंने कहा कि जिन लोगों ने समाजहित में अपनी भूमि दान देकर विद्यालय स्थापित किए, उनके योगदान और स्मृति का सम्मान बनाए रखना भी सरकार की जिम्मेदारी है. यदि मूल नामों की पहचान कमजोर होती है तो इससे स्थानीय समाज में असंतोष बढ़ सकता है.
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सरकार से पुनर्विचार की मांग
राजद ने सरकार से अपील किया है कि विद्यालयों के नामकरण जैसे संवेदनशील विषय पर पुनर्विचार किया जाए.पार्टी का कहना है कि शिक्षा से जुड़ी योजनाओं में जनसहयोग महत्वपूर्ण होता है और यदि संस्थापकों व स्थानीय समुदाय की भावनाओं का सम्मान नहीं किया गया तो भविष्य में ऐसी योजनाओं के प्रति लोगों का सहयोग प्रभावित हो सकता है.
राजद ने सुझाव दिया कि यदि किसी योजना के तहत नया नाम जोड़ना आवश्यक हो तो ऐसा प्रारूप अपनाया जाए जिसमें विद्यालय का मूल नाम और उसकी ऐतिहासिक पहचान सुरक्षित रहे.
सरकार की ओर से आधिकारिक प्रतिक्रिया का इंतजार
फिलहाल बिहार सरकार की ओर से इस आरोप पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है.यह भी स्पष्ट नहीं किया गया है कि नामकरण की प्रक्रिया किन मानकों के आधार पर तय की गई और क्या इस विषय में किसी प्रकार के संशोधन की संभावना है.
आने वाले दिनों में सरकार की प्रतिक्रिया के बाद इस मुद्दे पर स्थिति और स्पष्ट हो सकती है.
निष्कर्ष
551 आदर्श विद्यालयों की शुरुआत बिहार की शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है. लेकिन विद्यालयों के नामकरण को लेकर उठे विवाद ने यह सवाल भी खड़ा कर दिया है कि विकास योजनाओं के साथ स्थानीय इतिहास, संस्थापकों के योगदान और सामाजिक भावनाओं के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। राजद ने इस विषय पर सरकार से पुनर्विचार की मांग की है, जबकि सरकार की आधिकारिक प्रतिक्रिया का अभी इंतजार है. ऐसे में यह मुद्दा आने वाले समय में राजनीतिक और सामाजिक चर्चा का विषय बना रह सकता है.

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