नदी किनारे से सत्ता के गलियारों तक: बिहार में निषाद समाज की नई पहचान

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Kumar Ranjit

बिहार
नदी किनारे से सत्ता के गलियारों तक: बिहार में निषाद समाज की नई पहचान

अब किस्मत नदी में नहीं, सत्ता की चाबी में है!मुकेश सहानी का बुलंद संदेश

तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना, 3 सितंबर 2025 – बिहार की राजनीति में एक नई कहानी लिखी जा रही है – वह कहानी जो कभी नाव पर सवार होकर नदी में मछली पकड़ने से शुरू हुई थी. आज सत्ता के दरवाज़ों तक दस्तक दे रही है.निषाद समाज, जिसे पारंपरिक रूप से मल्लाह, मछुआरा या नाविक समुदाय के रूप में जाना जाता रहा है. अब अपनी पहचान और अधिकारों को लेकर मुखर हो रहा है. इस परिवर्तन की अगुवाई कर रहे हैं विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) के संस्थापक और पूर्व मंत्री मुकेश सहानी – जिन्हें लोग आज सन ऑफ मल्लाह के नाम से जानते हैं.

अब किस्मत नदी में नहीं, सत्ता की चाबी में है!

मुकेश सहानी ने अपने सोशल मीडिया (X) हैंडल @sonofmallah पर एक वीडियो पोस्ट किया, जिसमें उन्होंने एक शक्तिशाली संदेश लिखा था,
कभी नदी में किस्मत तलाशने वाला निषाद समाज, अब सत्ता की चाबी अपने हाथ में रखता है! कभी नदी की लहरों में अपनी किस्मत ढूंढता निषाद समाज, आज सत्ता की दिशा और दशा तय करने वाली चाबी अपने हाथ में लिए खड़ा है.

यह महज एक पोस्ट नहीं, बल्कि एक आंदोलन की गूंज है. इस वीडियो में निषाद समुदाय की पारंपरिक जीवनशैली – नाव, मछली पकड़ने की प्रक्रिया और ग्रामीण जीवन के दृश्यों के साथ-साथ उनके राजनीतिक जागरण को दिखाया गया है. जहां एक ओर नदी की लहरों पर संघर्ष दिखता है, वहीं दूसरी ओर मंचों से गूंजते नारों में आत्मविश्वास झलकता है.

वीआईपी पार्टी: निषाद समाज की आवाज

2018 में वीआईपी पार्टी की स्थापना के साथ मुकेश सहानी ने निषाद समाज के राजनीतिक एकीकरण की दिशा में बड़ा कदम उठाया है. एक समय बॉलीवुड में सेट डिज़ाइनर के रूप में काम कर चुके सहानी ने बिहार की सियासत में उतरकर उस वर्ग की आवाज़ उठाई, जो दशकों से हाशिए पर था.

2020 के विधानसभा चुनाव में वीआईपी ने गठबंधन की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाई. और सहानी खुद बिहार सरकार में पशुपालन और मत्स्य पालन मंत्री बने. अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने निषाद समाज को आरक्षण, सरकारी योजनाओं और सामाजिक मान्यता दिलाने के लिए कई प्रयास किए.

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राजनीतिक सौदेबाज़ी में ताक़तवर बनता निषाद वोट बैंक

बिहार में निषाद समाज की आबादी भले ही 2-3% के आसपास हो, लेकिन कई विधानसभा सीटों पर यह समुदाय निर्णायक भूमिका निभाता है. यही कारण है कि 2025 के विधानसभा चुनाव से पहले सहानी ने 60 सीटों और उप-मुख्यमंत्री पद की मांग रखकर राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है.

बीते वर्षों में वे एनडीए और इंडिया गठबंधन दोनों का हिस्सा रहे हैं.लेकिन हालिया बयानों में भाजपा पर निशाना साधते हुए उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया है कि अब वीआईपी पार्टी अपने दम पर समुदाय के हक के लिए खड़ी है.

सोशल मीडिया पर भी दिख रहा है असर

मुकेश सहानी की पोस्ट को अब तक अच्छे संख्या में लाइक्स और रीपोस्ट मिल चुके हैं, युवा वर्ग और निषाद समाज के बीच यह पोस्ट उम्मीद और आत्मबल का प्रतीक बन गया है.

निष्कर्ष: सामाजिक न्याय की नई सुबह

बिहार की राजनीति में यह बदलाव महज सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की ओर बढ़ता कदम है. मुकेश सहानी की पहल निषाद समाज के साथ-साथ अन्य वंचित समुदायों को भी एक नई दिशा देने का काम कर रही है.आज निषाद समाज सिर्फ नाव नहीं चला रहा – अब वह बिहार की राजनीतिक नैया के भी खेवनहार बन रहा है.

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