पटना विश्वविद्यालय अधिनियम पर आइसा का विरोध, 22 जुलाई को राजभवन मार्च

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Ajit Kumar

बिहार
पटना विश्वविद्यालय में अधिनियम, 1976 के विरोध में आयोजित संयुक्त धरने में शामिल शिक्षक, कर्मचारी और आइसा के छात्र कार्यकर्ता.

संयुक्त धरने में विश्वविद्यालय की स्वायत्तता बचाने की मांग, छात्रों से मार्च में शामिल होने की अपील

तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना, 21 जुलाई 2026: पटना विश्वविद्यालय अधिनियम, 1976 को समाप्त किए जाने की संभावित कोशिशों के विरोध में पटना विश्वविद्यालय परिसर में शिक्षकों, कर्मचारियों और छात्र संगठनों ने संयुक्त रूप से एक दिवसीय धरना आयोजित किया.इस कार्यक्रम में अखिल भारतीय छात्र संघ (आइसा) की पटना विश्वविद्यालय इकाई ने सक्रिय भागीदारी करते हुए विश्वविद्यालय की स्वायत्तता की रक्षा की मांग को प्रमुखता से उठाया.

धरना का आयोजन पटना विश्वविद्यालय शिक्षक संघ, पटना विश्वविद्यालय कर्मचारी संघ तथा पटना विश्वविद्यालय कॉलेज कर्मचारी संघ के संयुक्त आह्वान पर किया गया। प्रदर्शन के दौरान वक्ताओं ने विश्वविद्यालय की ऐतिहासिक पहचान, प्रशासनिक स्वतंत्रता और अकादमिक स्वायत्तता से जुड़े मुद्दों पर चिंता व्यक्त की.

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आइसा ने इसे विश्वविद्यालय की स्वायत्तता पर हमला बताया

धरना को संबोधित करते हुए आइसा पटना विश्वविद्यालय इकाई की सचिव कॉमरेड सबा आफ़रीन ने कहा कि यदि पटना विश्वविद्यालय अधिनियम, 1976 को समाप्त किया जाता है, तो यह विश्वविद्यालय की स्वायत्तता पर सीधा आघात होगा.उनके अनुसार, स्थापना काल से ही पटना विश्वविद्यालय अपने विशेष अधिनियम के तहत संचालित होता आया है और यही व्यवस्था उसकी स्वतंत्र प्रशासनिक एवं शैक्षणिक पहचान का आधार रही है.

उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय केवल डिग्री प्रदान करने वाली संस्था नहीं है, बल्कि यह विचार-विमर्श, लोकतांत्रिक संवाद, असहमति और बौद्धिक बहस का केंद्र होता है. यदि इसकी स्वायत्तता कमजोर होती है तो इसका प्रभाव शिक्षकों, छात्रों और कर्मचारियों के लोकतांत्रिक अधिकारों के साथ-साथ पूरे अकादमिक वातावरण पर पड़ेगा.

धरना में बड़ी संख्या में छात्र हुए शामिल

संयुक्त धरना में आइसा पटना विश्वविद्यालय इकाई के अध्यक्ष कॉमरेड नितीश, सचिव कॉमरेड सबा आफ़रीन, उपाध्यक्ष कॉमरेड आशीष, कॉमरेड आज़ाद, कॉमरेड शंकर सहित बड़ी संख्या में छात्र मौजूद रहे.प्रतिभागियों ने विश्वविद्यालय की ऐतिहासिक पहचान को बनाए रखने और स्वायत्तता की रक्षा के लिए एकजुट रहने की बात कही.

धरना के दौरान विभिन्न छात्र नेताओं और प्रतिनिधियों ने भी विश्वविद्यालय प्रशासन एवं राज्य सरकार से उच्च शिक्षा संस्थानों की स्वायत्त संरचना को सुरक्षित रखने की अपील की है .

उच्च शिक्षा संस्थानों की स्वायत्तता पर उठे सवाल

आइसा का कहना है कि राज्य सरकार का यह कदम केवल पटना विश्वविद्यालय तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे उच्च शिक्षा संस्थानों पर प्रशासनिक नियंत्रण बढ़ाने की व्यापक प्रक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए. संगठन का आरोप है कि यदि विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता कम होती है तो शैक्षणिक निर्णयों, शोध, छात्र गतिविधियों और लोकतांत्रिक माहौल पर भी असर पड़ सकता है.

हालांकि, राज्य सरकार की ओर से इस संबंध में विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है. ऐसे में इस मुद्दे पर विभिन्न पक्षों के बीच आगे भी चर्चा और बहस जारी रहने की संभावना है.

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22 जुलाई को राजभवन मार्च का आह्वान

धरना के समापन पर आइसा बिहार ने 22 जुलाई को राजभवन मार्च आयोजित करने की घोषणा की.संगठन ने पटना विश्वविद्यालय के छात्रों से बड़ी संख्या में इस मार्च में शामिल होने की अपील की है.

आइसा ने यह भी कहा कि आने वाले दिनों में विश्वविद्यालय परिसर और विभिन्न कॉलेजों में छात्र संपर्क अभियान चलाया जाएगा, ताकि अधिक से अधिक छात्रों को इस मुद्दे से जोड़ा जा सके और स्वायत्तता की रक्षा के लिए व्यापक छात्र आंदोलन खड़ा किया जा सके.

पटना विश्वविद्यालय अधिनियम क्यों है महत्वपूर्ण?

पटना विश्वविद्यालय बिहार के सबसे पुराने और प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में से एक है. वर्षों से इसकी प्रशासनिक व्यवस्था विशेष अधिनियम के तहत संचालित होती रही है.विश्वविद्यालय की स्वायत्तता को लेकर समय-समय पर छात्र संगठनों, शिक्षक संघों और कर्मचारी संगठनों ने अपनी राय रखी है.

शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता, पारदर्शी प्रशासन और अकादमिक स्वतंत्रता उच्च शिक्षा की गुणवत्ता बनाए रखने के महत्वपूर्ण तत्व हैं.वहीं सरकारें प्रशासनिक सुधार और बेहतर प्रबंधन के पक्ष में विभिन्न कदम उठाने की बात करती रही हैं। ऐसे में किसी भी बदलाव पर व्यापक विमर्श और सभी हितधारकों की भागीदारी महत्वपूर्ण मानी जाती है.

निष्कर्ष

पटना विश्वविद्यालय अधिनियम, 1976 को लेकर उठा विवाद अब छात्र राजनीति और उच्च शिक्षा के व्यापक विमर्श का विषय बनता दिखाई दे रहा है. आइसा और अन्य संगठनों ने इसे विश्वविद्यालय की स्वायत्तता से जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा बताते हुए आंदोलन तेज करने का संकेत दिया है। दूसरी ओर, इस विषय पर सरकार की आधिकारिक स्थिति और आगे की प्रक्रिया पर सभी की निगाहें टिकी रहेंगी. आने वाले दिनों में प्रस्तावित राजभवन मार्च और इससे जुड़ी गतिविधियां इस बहस को और गति दे सकती हैं.

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