संकर्षण ठाकुर: निडर पत्रकारिता का एक स्तंभ अब हमारे बीच नहीं

| BY

Ajit Kumar

बिहार
संकर्षण ठाकुर: निडर पत्रकारिता का एक स्तंभ अब हमारे बीच नहीं

पत्रकारिता का एक साहसी अध्याय हुआ समाप्त

तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना, 8 सितंबर 2025 — भारतीय पत्रकारिता जगत ने आज एक अपूरणीय क्षति झेली है.प्रख्यात पत्रकार, लेखक और द टेलीग्राफ के संपादक संकर्षण ठाकुर का आज एक लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया है .उनकी विदाई ने न केवल मीडिया जगत को झकझोर कर रख दिया है, बल्कि लोकतांत्रिक भारत के भविष्य और उसकी बुनियादी सोच के लिए भी यह एक गहरा आघात लगा है.

भाकपा-माले के महासचिव का. दीपंकर भट्टाचार्य ने उनके निधन पर शोक व्यक्त करते हुए कहा कि ठाकुर साहब की पत्रकारिता ,सत्ता की चकाचौंध से दूर, सच और जनपक्षधरता के प्रति अटूट प्रतिबद्धता का प्रतीक थी.

सत्ता से समझौता नहीं, सच का साहस

संकर्षण ठाकुर ने अपने करियर में बार-बार यह साबित किया कि पत्रकारिता महज खबरों का कारोबार नहीं, बल्कि लोकतंत्र को जीवंत रखने का एक सामाजिक दायित्व है.ऐसे समय में जब मीडिया का बड़ा हिस्सा सत्ता की भाषा बोल रहा है, ठाकुर सच को बेखौफ होकर सामने लाते रहे.उनका लेखन और विश्लेषण इस बात का प्रमाण है कि पत्रकारिता में संवेदनशीलता और निर्भीकता एक साथ संभव है.

बिहार और कश्मीर पर गहरी पकड़

ठाकुर न केवल बिहार की सामाजिक-राजनीतिक जटिलताओं को गहराई से समझते थे. बल्कि कश्मीर के सवालों पर उनकी दृष्टि हमेशा मौलिक और व्यापक रही.उनके लेख और किताबें आने वाली पीढ़ियों के लिए भारतीय लोकतंत्र के बदलते स्वरूप को समझने का महत्वपूर्ण दस्तावेज बनी रहेंगी.

लोकतांत्रिक भारत की आवाज

दीपंकर भट्टाचार्य ने कहा, “संकर्षण ठाकुर का जाना केवल पत्रकारिता की हानि नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक भारत के विचार की भी बड़ी क्षति है.उन्होंने दिखाया कि पत्रकारिता सत्ता के दबावों और प्रलोभनों से परे रहकर भी समाज की सच्ची आवाज बन सकती है.

स्मृति बनेगी प्रेरणा

उनके निधन पर गहरी संवेदनाएं व्यक्त करते हुए माले महासचिव ने कहा कि संकर्षण ठाकुर की स्मृति और संघर्ष आने वाले समय में जनआंदोलनों को नई ऊर्जा और दिशा देंगे. उनके परिवार और मित्रों के साथ खड़ा होना इस कठिन समय में पूरे पत्रकारिता जगत और लोकतांत्रिक समाज की जिम्मेदारी है.

निष्कर्ष

संकर्षण ठाकुर अब हमारे बीच भले न हों, लेकिन उनकी निडर पत्रकारिता, गहन विश्लेषण और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति अडिग प्रतिबद्धता हमेशा जीवित रहेगी. वे उन चंद पत्रकारों में थे जिन्होंने शब्दों से ही नहीं, बल्कि अपने पूरे जीवन से दिखाया कि पत्रकारिता का असली धर्म जनपक्षधरता और सच बोलने का साहस है.

Trending news

Leave a Comment