बीएलओ और आम जनता पर बढ़ता दबाव, भाकपा-माले का तीखा विरोध
तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना,14 जुलाई 2025 :बिहार में चुनाव आयोग द्वारा चलाया जा रहा SIR (Special Intense Revision) यानी विशेष गहन पुनरीक्षण का काम अब विवादों में लगातार घिरता जा रहा है. प्रशासन का कहना है कि यह प्रक्रिया वोटर लिस्ट को ज़्यादा साफ़, सही और अपडेट करने के लिए किया जा है है. लेकिन दूसरी तरफ ज़मीनी स्तर पर जो हालात हैं वह कुछ और ही कहानी बता रहा है और कई गड़बड़ियों की ओर इशारा कर रहा है.
भाकपा-माले ने SIR प्रक्रिया को बताया अराजक
भाकपा-माले के राज्य सचिव कुणाल ने इस पूरी प्रक्रिया को अव्यवस्थित, अमानवीय और बिना तैयारी के थोपी गई नियमावली” करार देते हुए कहा कि इससे न सिर्फ आम जनता परेशान है.बल्कि बीएलओ कर्मी भी भारी मानसिक और शारीरिक दबाव झेल रहे हैं.
कुणाल ने आरोप लगाया किबीएलओ से लगातार 12-12 घंटे काम कराया जा रहा है. चुनाव आयोग द्वारा दिए गए अतार्किक टारगेट उन्हें मानसिक रूप से तोड़ रहा है. स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि एक बीएलओ की मौत की खबर सामने आई है, जबकि बारसोई के बीडीओ ने इस्तीफ़ा दे दिया है.
बीएलओ बने निशाना, संवेदनहीन रवैये पर माले का आक्रोश
सबसे चिंताजनक बात यह है कि जब बीएलओ अपनी समस्याएं सामने ला रहे हैं. तो उसे ही टारगेट किया जा रहा है. बेगूसराय का ताजा मामला इसका उदाहरण है. जहां एक बीएलओ पर यह आरोप लगा कि उन्होंने मीडिया को ‘भ्रामक जानकारी’ दिया है. माले ने इसे प्रशासन की दमनकारी कार्रवाई करार देते हुए तीखी निंदा किया है.
फॉर्म की गड़बड़ियों से बढ़ी भ्रम की स्थिति
प्रक्रिया के दौरान मतदाता गणना फॉर्म को लेकर भी व्यापक भ्रम फैला हुआ है.चुनाव आयोग का दावा है कि प्रत्येक मतदाता के लिए दो फॉर्म उपलब्ध हैं. एक बीएलओ के लिए और एक रिसीविंग के तौर पर मतदाता को दिया जाना है. लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि बीएलओ के पास केवल एक ही फॉर्म उपलब्ध कराया जा रहा है. ऐसे में मतदाता जब रिसीविंग मांगते हैं. तो बीएलओ के पास उन्हें देने को कुछ नहीं होता है.
मतदाता की सहमति के बिना भरे जा रहे फॉर्म
चौंकाने वाली बात यह भी है कि कई जगहों पर बिना मतदाता के जानकारी और अनुमति के फॉर्म भरने की शिकायतें आई हैं. जिससे पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता और वैधता पर सवाल उठने लगा है.
माले की चेतावनी: लोकतंत्र को डर के माहौल में नहीं चलाया जा सकता
भाकपा-माले ने स्पष्ट किया है कि वह बेगूसराय के बीएलओ पर की गई कार्रवाई को वापस लेने की मांग करता है.और चेतावनी देती है कि यदि चुनाव आयोग ने अपना रवैया नहीं बदला.तो पार्टी इस अन्याय और दमन के खिलाफ हर स्तर पर आंदोलन करेगा.
निष्कर्ष
SIR प्रक्रिया के कार्यो में जिस प्रकार की अव्यवस्था, दबाव और असंतोष की स्थितियाँ उभरकर सामने आया हैं वह स्पष्ट संकेत देता हैं कि किसी भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया को जल्दबाज़ी में और जन-संवाद के अभाव में संचालित करना व्यावहारिक और न्यायसंगत नहीं होता है.इस पूरी प्रणाली की मूल धुरी बीएलओ (बूथ लेवल ऑफिसर) हैं.और यदि उन्हीं को निरंतर दबाव और संकट की स्थिति में रखा जायेगा तो यह लोकतंत्र की जड़ों को कमज़ोर कर देगा.अतः आवश्यक है कि इस प्रक्रिया को पुनर्विचार और व्यापक संवाद के साथ आगे बढ़ाया जाए ताकि लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा किया जा सके.
यह लेख बिहार की जमीनी हकीकत और चुनावी व्यवस्थाओं की कार्यप्रणाली को उजागर करता है.यदि आपके पास इस मुद्दे पर कोई अनुभव या विचार हैं. तो आप हमें कॉमेंट सेक्शन में ज़रूर बताएं.

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