राज्यसभा में सरकार के जवाब के बाद न्यायपालिका में सामाजिक विविधता और सुधार पर बहस तेज
तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना :भारत की न्यायपालिका लोकतंत्र के सबसे महत्वपूर्ण स्तंभों में से एक माना जाता है. न्यायपालिका की निष्पक्षता, स्वतंत्रता और विश्वसनीयता पर ही आम नागरिकों का भरोसा टिका होता है.लेकिन पिछले कुछ वर्षों से एक सवाल लगातार उठता रहा है कि क्या देश की उच्च न्यायपालिका वास्तव में भारतीय समाज की सामाजिक विविधता को प्रतिबिंबित करती है? अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) और अल्पसंख्यक समुदायों का उच्च न्यायालयों में प्रतिनिधित्व कितना है, यह विषय एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है.
हाल ही में राज्यसभा में राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के सांसद मनोज कुमार झा द्वारा पूछे गए प्रश्न के जवाब में विधि एवं न्याय राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने सरकार का पक्ष रखा. सरकार के उत्तर के बाद विपक्ष ने न्यायपालिका में सामाजिक प्रतिनिधित्व को लेकर सरकार की नीति पर सवाल उठाए. इस मुद्दे ने केवल राजनीतिक बहस ही नहीं, बल्कि न्यायपालिका में सामाजिक न्याय और संस्थागत सुधार पर भी व्यापक चर्चा शुरू कर दिया है.

राज्यसभा में क्या पूछा गया?
राज्यसभा में सांसद मनोज कुमार झा ने जानना चाहा कि क्या केंद्र सरकार उच्च न्यायालयों में SC, ST, OBC और अल्पसंख्यक समुदायों के प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने के लिए कोई ठोस नीति अपना रही है. इसके जवाब में सरकार ने बताया कि समय-समय पर सभी उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों को पत्र भेजे जाते हैं.
इन पत्रों में अनुरोध किया जाता है कि यदि इन वर्गों से योग्य और सक्षम अधिवक्ता उपलब्ध हों तो उनके नाम न्यायाधीश नियुक्ति की सिफारिश में शामिल किए जाएं. सरकार का कहना है कि वह न्यायपालिका में सामाजिक विविधता बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है और इसी उद्देश्य से यह प्रक्रिया अपनाई जाती है.
हालांकि विपक्ष का कहना है कि केवल अनुरोध करना पर्याप्त नहीं है. उनका तर्क है कि यदि सामाजिक न्याय सरकार की प्राथमिकता है तो इसके लिए स्पष्ट नीतिगत सुधार और संस्थागत व्यवस्था बनाया जाना चाहिये.
न्यायपालिका में प्रतिनिधित्व के आधिकारिक आंकड़े
सरकार द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2018 से जनवरी 2026 तक देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों में कुल 847 न्यायाधीशों की नियुक्ति हुई.
इनमें,
अनुसूचित जाति (SC) – 33 न्यायाधीश (लगभग 4%)
अनुसूचित जनजाति (ST) – 17 न्यायाधीश (लगभग 2%)
अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) – 104 न्यायाधीश (लगभग 12%)
अल्पसंख्यक समुदाय – 46 न्यायाधीश
महिला न्यायाधीश – 130
ये आंकड़ा बताता हैं कि सामाजिक रूप से वंचित वर्गों का प्रतिनिधित्व उनकी जनसंख्या के अनुपात की तुलना में काफी कम है. यही कारण है कि इस विषय पर लगातार बहस होता रहा है.
संविधान क्या कहता है?
भारत के संविधान के अनुच्छेद 124, 217 और 224 सर्वोच्च न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति से संबंधित हैं. इन प्रावधानों में किसी भी सामाजिक वर्ग के लिए आरक्षण का स्पष्ट प्रावधान नहीं है.
यही वजह है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति सामान्य सरकारी नौकरियों की तरह आरक्षण नीति के आधार पर नहीं होता है. नियुक्ति प्रक्रिया में योग्यता, अनुभव, ईमानदारी और न्यायिक क्षमता को प्रमुख आधार माना जाता है.
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि वर्ष 2018 से पहले न्यायाधीशों की सामाजिक पृष्ठभूमि का कोई केंद्रीय रिकॉर्ड व्यवस्थित रूप से उपलब्ध नहीं था. बाद में सिफारिश किए जाने वाले उम्मीदवारों से सामाजिक पृष्ठभूमि का विवरण लिया जाने लगा, जिससे यह डेटा तैयार किया गया.
कैसे होती है उच्च न्यायालयों में नियुक्ति?
भारत में उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति मुख्य रूप से कोलेजियम प्रणाली के माध्यम से होता है.
इस प्रक्रिया में,
संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश प्रस्ताव तैयार करते हैं.
दो वरिष्ठतम न्यायाधीशों से परामर्श लिया जाता है.
प्रस्ताव राज्य सरकार के माध्यम से केंद्र सरकार तक पहुंचता है.
इसके बाद सर्वोच्च न्यायालय का कोलेजियम अंतिम सिफारिश करता है.
राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद नियुक्ति होती है.
इस पूरी प्रक्रिया में कार्यपालिका की भूमिका सीमित होती है, जबकि अंतिम निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय के कोलेजियम की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है.
विपक्ष की आपत्ति क्या है?
RJD सहित कई विपक्षी दलों का कहना है कि यदि सरकार वास्तव में सामाजिक प्रतिनिधित्व बढ़ाना चाहती है तो केवल मुख्य न्यायाधीशों को पत्र भेजना पर्याप्त नहीं है.उनका तर्क है कि,
सामाजिक विविधता सुनिश्चित करने के लिए स्पष्ट नीति हो.
नियुक्ति प्रक्रिया अधिक पारदर्शी बने.
सामाजिक पृष्ठभूमि के आंकड़े नियमित रूप से सार्वजनिक किए जाएं.
योग्य उम्मीदवारों की पहचान और प्रोत्साहन के लिए संस्थागत व्यवस्था विकसित की जाए.
विपक्ष का यह भी कहना है कि सामाजिक न्याय केवल चुनावी मुद्दा नहीं बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता से जुड़ा प्रश्न है.
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सरकार का पक्ष
सरकार का कहना है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता भारतीय लोकतंत्र की मूल भावना है.इसलिए नियुक्ति प्रक्रिया में कार्यपालिका का अत्यधिक हस्तक्षेप उचित नहीं माना जा सकता है.
सरकार का तर्क है कि,
योग्य उम्मीदवारों को प्राथमिकता देना आवश्यक है.
सामाजिक विविधता बढ़ाने का प्रयास लगातार जारी है.
मुख्य न्यायाधीशों को नियमित रूप से इस विषय में संवेदनशील बनाया जाता है.
संविधान में आरक्षण का प्रावधान नहीं होने के कारण सीमाएं भी मौजूद हैं.
सरकार यह भी मानती है कि न्यायपालिका में विविधता महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे संवैधानिक व्यवस्था और न्यायपालिका की स्वतंत्रता के अनुरूप ही आगे बढ़ाया जा सकता है.
क्या केवल मेरिट ही पर्याप्त है?
इस बहस का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि क्या केवल मेरिट के आधार पर नियुक्तियां पर्याप्त हैं, या फिर सामाजिक प्रतिनिधित्व भी उतना ही आवश्यक है?
विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों के बीच संतुलन बनाना जरूरी है. न्यायपालिका में विभिन्न सामाजिक पृष्ठभूमि के लोगों की भागीदारी बढ़ने से न्याय व्यवस्था पर समाज का विश्वास मजबूत होता है.अलग-अलग समुदायों के अनुभव और दृष्टिकोण न्यायिक विमर्श को अधिक व्यापक बना सकते हैं.
हालांकि यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि किसी भी नियुक्ति में न्यायिक योग्यता, निष्पक्षता और संवैधानिक मूल्यों से समझौता न हो.
आगे की राह क्या हो सकती है?
विशेषज्ञों के अनुसार इस दिशा में कई व्यावहारिक सुधार किए जा सकते हैं, जैसे,
कोलेजियम प्रक्रिया में अधिक पारदर्शिता.
नियुक्ति संबंधी आंकड़ों का नियमित सार्वजनिक प्रकाशन.
योग्य अधिवक्ताओं और न्यायिक अधिकारियों के लिए मेंटरशिप कार्यक्रम.
बार काउंसिल, उच्च न्यायालयों और राज्य सरकारों के बीच बेहतर समन्वय.
सामाजिक विविधता को प्रोत्साहित करने वाले संस्थागत उपाय.
इन सुधारों से बिना संवैधानिक ढांचे को बदले भी न्यायपालिका में व्यापक प्रतिनिधित्व की दिशा में सकारात्मक बदलाव संभव हो सकता हैं.
निष्कर्ष
उच्च न्यायालयों में SC, ST, OBC और अल्पसंख्यक समुदायों के प्रतिनिधित्व का मुद्दा केवल राजनीतिक बहस नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र, न्यायपालिका की विश्वसनीयता और सामाजिक न्याय से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय है. सरकार का कहना है कि वह सामाजिक विविधता बढ़ाने के लिए लगातार प्रयास कर रही है, जबकि विपक्ष इसे अपर्याप्त मानते हुए नीतिगत सुधार की मांग कर रहा है.
फिलहाल उपलब्ध आंकड़े यह संकेत देते हैं कि उच्च न्यायपालिका में इन वर्गों का प्रतिनिधित्व अभी भी सीमित है. ऐसे में भविष्य की बहस केवल इस बात पर नहीं होगी कि कितने पत्र भेजे गए, बल्कि इस पर होगी कि न्यायपालिका में विविधता बढ़ाने के लिए कौन से व्यावहारिक, पारदर्शी और संवैधानिक कदम उठाए जाते हैं। लोकतंत्र की मजबूती तभी सुनिश्चित होगी जब न्याय व्यवस्था पर हर वर्ग का समान विश्वास बना रहे.
नोट : राष्ट्रीय जनता दल (RJD) का आधिकारिक X (पूर्व ट्विटर) हैंडल – @RJDforIndiaके आधार पर आधारित विश्लेषण

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