12 घंटे काम और छुट्टी नहीं मिलने की शिकायतों के बीच बिहार के मजदूरों की वापसी पर भाकपा-माले ने जताई चिंता
तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना, 12 अक्टूबर 2026: गुजरात के सूरत में टेक्सटाइल फैक्ट्रियों में काम करने वाले मजदूरों के बड़ी संख्या में घर लौटने की खबरों के बीच भाकपा-माले ने केंद्र और बिहार सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है.पार्टी के बिहार राज्य सचिव कुणाल ने मजदूरों के पलायन को फैक्ट्री मालिकों के कथित उत्पीड़न, श्रम अधिकारों पर हमले और रोजगार के संकट से जुड़ा गंभीर मामला बताया है.उन्होंने केंद्र सरकार से चारों लेबर कोड वापस लेने तथा बिहार सरकार से प्रवासी मजदूरों के रोजगार, आजीविका और सामाजिक सुरक्षा के लिए ठोस कदम उठाने की मांग की.
सूरत से मजदूरों की वापसी पर भाकपा-माले ने जताई चिंता
भाकपा-माले की ओर से 12 अक्टूबर 2026 को जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, सूरत की टेक्सटाइल फैक्ट्रियों में काम करने वाले मजदूर छुट्टी नहीं मिलने और प्रतिदिन 12 घंटे काम करने की शिकायतों से परेशान होकर अपने घर लौट रहे हैं.विज्ञप्ति में इस वापसी को गांव चलो आंदोलन का रूप लेने वाला बताया गया है.इसमें कहा गया है कि घर लौटने वाले मजदूरों की संख्या बढ़ रही है और रेलवे स्टेशनों पर भीड़ दिखाई दे रही है. वापस लौटने वालों में बिहार के मजदूरों की बड़ी संख्या होने की बात भी कही गई .
कुणाल ने इन खबरों पर चिंता जताते हुए कहा कि फैक्ट्री मालिकों के कथित उत्पीड़न से परेशान होकर मजदूरों का लौटना देश में श्रमिकों की स्थिति, उनके अधिकारों और रोजगार की उपलब्धता से जुड़े गंभीर सवाल खड़े करता है.
हालांकि, प्रेस विज्ञप्ति में लौटने वाले मजदूरों की कुल संख्या, प्रभावित फैक्ट्रियों की संख्या और संबंधित श्रमिकों की शिकायतों का विस्तृत आंकड़ा नहीं दिया गया है. इसलिए इन परिस्थितियों की व्यापकता का स्वतंत्र आकलन करने के लिए संबंधित प्रशासन और श्रम विभाग की जानकारी भी महत्वपूर्ण होगी.
केंद्र सरकार से श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा की मांग
कुणाल ने केंद्र सरकार से मांग की कि फैक्ट्री मालिकों द्वारा मजदूरों के कथित उत्पीड़न पर तत्काल रोक लगाई जाए. साथ ही, श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करने और यदि जांच में दोषी पाए जाएं तो संबंधित मालिकों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने के लिए प्रभावी कदम उठाए जाएं.
उन्होंने कहा कि मजदूर देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, लेकिन उन्हें सम्मानजनक कामकाजी परिस्थितियां, उचित मजदूरी और सुरक्षा मिलने के बजाय शोषण तथा असुरक्षा का सामना करना पड़ रहा है.
यह मुद्दा केवल काम के घंटों तक सीमित नहीं है. श्रमिकों के लिए समय पर वेतन, साप्ताहिक अवकाश, कार्यस्थल की सुरक्षा और शिकायतों के समाधान की प्रभावी व्यवस्था भी महत्वपूर्ण है। इन अधिकारों का वास्तविक क्रियान्वयन सुनिश्चित करना संबंधित सरकारों, श्रम विभागों और नियोक्ताओं की जिम्मेदारी है.
चारों लेबर कोड वापस लेने की मांग क्यों उठा रही है भाकपा-माले?
भाकपा-माले के बिहार राज्य सचिव कुणाल ने केंद्र सरकार द्वारा लागू किए गए चार श्रम संहिताओं यानी लेबर कोड का विरोध करते हुए उन्हें मजदूर-विरोधी बताया है. उनका आरोप है कि इन संहिताओं से पूंजीपतियों और कॉरपोरेट घरानों को श्रमिकों के अधिकारों को कमजोर करने का अधिक अवसर मिलता है.
पार्टी की मांग है कि चारों लेबर कोड वापस लिए जाएं और मजदूरों के लंबे संघर्षों से हासिल अधिकारों की रक्षा की जाए. कुणाल ने श्रमिकों की संगठित होकर अपने हितों की रक्षा करने की क्षमता कमजोर किए जाने पर भी चिंता जताई.
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि लेबर कोड के प्रभाव और उनके क्रियान्वयन को लेकर राजनीतिक दलों तथा श्रमिक संगठनों के अपने-अपने दृष्टिकोण हैं. भाकपा-माले का विरोध पार्टी का राजनीतिक रुख है.इन संहिताओं के वास्तविक प्रभाव का आकलन उनके प्रावधानों, लागू नियमों और जमीनी क्रियान्वयन के आधार पर किया जाना चाहिए
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बिहार सरकार से प्रवासी मजदूरों के लिए तत्काल पहल की मांग
कुणाल ने बिहार सरकार से सूरत से लौट रहे मजदूरों की स्थिति का पता लगाने और उनकी समस्याओं के समाधान के लिए विशेष कदम उठाने की मांग की.उन्होंने कहा कि सरकार को लौटने वाले श्रमिकों की रोजगार, आजीविका और सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी जरूरतों पर ध्यान देना चाहिए.
प्रवासी मजदूरों के सामने घर लौटने के बाद रोजगार और नियमित आय का सवाल भी खड़ा हो सकता है. यदि किसी श्रमिक को काम छोड़कर वापस आना पड़ता है, तो उसके परिवार की आर्थिक स्थिति प्रभावित होने की आशंका रहती है. ऐसे में जरूरतमंद परिवारों की पहचान, रोजगार से जोड़ने की व्यवस्था और पात्र श्रमिकों तक उपलब्ध सरकारी सहायता पहुंचाना महत्वपूर्ण हो सकता है.
भाकपा-माले का कहना है कि बिहार के मजदूर रोजी-रोटी की तलाश में दूसरे राज्यों में जाने के लिए मजबूर होते हैं और वहां उन्हें अपमान, शोषण तथा असुरक्षा का सामना करना पड़ता है.पार्टी ने इसे राज्य में पर्याप्त रोजगार के अवसरों की कमी से जुड़ी समस्या बताया है.
बिहार में स्थायी रोजगार के अवसर पैदा करने पर जोर
कुणाल ने बिहार सरकार से कृषि, उद्योग और अन्य क्षेत्रों में स्थायी रोजगार के अवसर पैदा करने के लिए ठोस योजना बनाने की मांग की. उनका कहना है कि राज्य में पर्याप्त रोजगार उपलब्ध होने से मजदूरों को मजबूरी में दूसरे राज्यों की ओर पलायन नहीं करना पड़ेगा.
बिहार से बाहर काम करने वाले श्रमिकों के हितों की रक्षा के लिए राज्य सरकार के स्तर पर समन्वय, श्रमिकों की शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं तक उनकी पहुंच महत्वपूर्ण हो सकती है. वहीं, राज्य में रोजगार के स्थायी अवसर विकसित करने के लिए कृषि आधारित उद्योगों, स्थानीय उद्यमों और औद्योगिक गतिविधियों को बढ़ावा देना भी जरूरी है.
हालांकि, सूरत से मजदूरों की वापसी की खबरों और बिहार में रोजगार की स्थिति के बीच संबंधों का आकलन करने के लिए श्रमिकों की संख्या, उनकी वापसी के कारणों और रोजगार संबंधी आंकड़ों की विस्तृत जानकारी आवश्यक होगी.
मजदूरों के पलायन ने खड़े किए कई सवाल
सूरत से बिहार लौट रहे मजदूरों का मामला कामकाजी परिस्थितियों, श्रमिक अधिकारों और अपने गृह राज्य में रोजगार की उपलब्धता जैसे मुद्दों को सामने लाता है. यदि मजदूरों को छुट्टी नहीं मिलने और लंबे समय तक काम करने जैसी समस्याओं के कारण नौकरी छोड़नी पड़ रही है, तो इन शिकायतों की निष्पक्ष जांच और प्रभावी समाधान जरूरी है.
साथ ही, बिहार सरकार के सामने यह चुनौती है कि दूसरे राज्यों से लौटने वाले श्रमिकों को आजीविका के अवसर उपलब्ध कराने के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं.केंद्र सरकार और संबंधित राज्य सरकारों के बीच समन्वय भी प्रवासी श्रमिकों की समस्याओं के समाधान में अहम भूमिका निभा सकता है.
भाकपा-माले ने इस मुद्दे पर केंद्र सरकार से चारों लेबर कोड वापस लेने और श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा करने की मांग की है. वहीं, बिहार सरकार से लौटने वाले मजदूरों के लिए तत्काल सहायता और राज्य में स्थायी रोजगार के अवसर पैदा करने की अपील की है.
निष्कर्ष: सूरत से मजदूरों की वापसी की खबरें श्रमिकों की कामकाजी परिस्थितियों और रोजगार की सुरक्षा पर गंभीर चर्चा की जरूरत को रेखांकित करती हैं.अब महत्वपूर्ण यह होगा कि मजदूरों की शिकायतों की जांच, उनके अधिकारों की सुरक्षा और बिहार में रोजगार के अवसर बढ़ाने के लिए संबंधित सरकारें क्या ठोस कदम उठाती हैं.
स्रोत: भाकपा-माले की प्रेस विज्ञप्ति, 12 अक्टूबर 2026; बिहार राज्य सचिव कुणाल के बयान के आधार पर.

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