अडानी को एक रुपये में 1050 एकड़ जमीन?

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Ajit Kumar

बिहार
1050 एकड़ उपजाऊ जमीन सिर्फ एक रुपये में – किसानों का गुस्सा क्यों फूटा?

किसानों की पीड़ा और बिहार में जमीन लूट का नया अध्याय

तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना, 16 सितंबर 2025 – बिहार की राजनीति और जनजीवन इस समय एक बार फिर जमीन अधिग्रहण के सवाल पर गरमा गया है.भाकपा-माले राज्य सचिव कुणाल और अखिल भारतीय किसान महासभा के राज्य सचिव उमेश सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि सरकार ने अपने खास पूंजीपति मित्र अडानी को मात्र एक रुपये प्रति एकड़ की दर से 1050 एकड़ उपजाऊ जमीन सौंप दी है. यह जमीन भागलपुर जिले के पीरपैंती में पावर प्लांट परियोजना के नाम पर दी जा रही है.

नेताओं का कहना है कि यह सौदा न सिर्फ किसानों के साथ अन्याय है, बल्कि बिहार की भूमि नीति और न्याय व्यवस्था पर भी सवाल खड़ा करता है.उन्होंने स्पष्ट शब्दों में आरोप लगाया – भूमिहीनों के आवास, स्कूल, अस्पताल और विकास परियोजनाओं के लिए सरकार के पास जमीन नहीं है.लेकिन अडानी जैसे पूंजीपतियों के लिए जमीन पर जमीन मौजूद है.

उपजाऊ जमीन को बताया बंजर, 10 लाख पेड़ों पर संकट

भाकपा-माले और किसान महासभा ने यह भी दावा किया कि सरकार ने इस जमीन को कागज़ पर बंजर बताया है. जबकि हकीकत यह है कि यह उपजाऊ खेती योग्य भूमि है. इस पर करीब 10 लाख से अधिक हरे-भरे पेड़ मौजूद हैं, जिन्हें काटे जाने की तैयारी है.
नेताओं ने चेतावनी दी कि यह कदम न सिर्फ किसानों की आजीविका पर चोट करेगा, बल्कि पर्यावरणीय संकट को भी जन्म देगा,किसानों को बिजली महंगी, अडानी को जमीन सस्ती!

किसान नेताओं ने तंज कसते हुए कहा कि विडंबना यह है कि जिस पावर प्लांट के नाम पर किसानों की जमीन छीनी जा रही है.उसी बिजली को किसानों को 6.5 रुपये प्रति यूनिट की दर से खरीदना पड़ेगा.
यानी एक तरफ किसानों की जमीन और पेड़ छीने जाएंगे, दूसरी तरफ उन्हीं को महंगी बिजली बेचकर फायदा उठाया जाएगा.यह सीधा-सीधा कॉरपोरेट मित्रता का उदाहरण बताया जा रहा है.

भूमि अधिग्रहण में लगातार अन्याय

बिहार में जमीन अधिग्रहण से जुड़ी शिकायतें नई नहीं हैं. हाल ही में पूर्णिया एयरपोर्ट का उद्घाटन प्रधानमंत्री मोदी ने किया था, लेकिन वहां भी किसानों को उचित मुआवजा नहीं मिला. आवासीय जमीन को कृषि भूमि बताकर किसानों को बेहद कम राशि दी गई.

इसी तरह, राम-जानकी पथ के तहत सिवान जिले में घनी आबादी वाले इलाकों की जमीन को कृषि भूमि बताकर अधिग्रहण कर लिया गया.
भारतमाला परियोजना के दौरान फतुहा, वाजितपुर, सैदनपुर, रबियाचक और पश्चिम चंपारण के सिकटा जैसे इलाकों में भी किसानों को आधा-अधूरा मुआवजा दिया गया.

नवादा के नादरीगंज में तो दो गांवों की जमीन बिना किसी मुआवजे के अधिग्रहित कर ली गई.वहीं बक्सर के चौसा में किसानों को मुआवजे की जगह पुलिस की लाठियां मिलीं.

इन घटनाओं से साफ झलकता है कि जमीन अधिग्रहण की हर प्रक्रिया में किसानों के हितों को दरकिनार कर कॉरपोरेट और बड़े ठेकेदारों को प्राथमिकता दी जा रही है.

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भूमिहीनता और विस्थापन का संकट

बिहार पहले से ही भूमिहीनता की समस्या से जूझ रहा है. बड़ी संख्या में किसान भूमिहीन हैं या फिर उनके पास बेहद छोटी जोत की जमीन है. ऐसे हालात में जब सरकार उपजाऊ जमीन को भी कॉरपोरेट्स के हवाले कर रही है, तो विस्थापन और बेरोजगारी की समस्या और गहराने की आशंका है।
किसानों का कहना है कि यह,भूमि सुधार नहीं बल्कि भूमि लूट है.

विपक्ष का रुख और आगामी संघर्ष

भाकपा-माले ने ऐलान किया है कि वह इस पूरे मामले की जांच के लिए एक टीम पीरपैंती भेजेगी.पार्टी की मांग है कि अडानी को जमीन देने का यह फैसला तत्काल रद्द किया जाए.
नेताओं ने चेतावनी दी है कि अगर सरकार पीछे नहीं हटती तो किसान सड़कों पर उतरकर जोरदार आंदोलन करेंगे.

निष्कर्ष

यह मामला सिर्फ जमीन अधिग्रहण का विवाद नहीं, बल्कि किसानों और भूमिहीनों के भविष्य से जुड़ा बड़ा सवाल है.जब सरकार भूमिहीनों और आम जनता के लिए जमीन उपलब्ध नहीं कर पाती, लेकिन कॉरपोरेट्स के लिए हजारों एकड़ जमीन एक रुपये प्रति एकड़ की दर से देने में तत्पर रहती है. तो यह ,डबल इंजन सरकार की प्राथमिकताओं को उजागर करता है.

अब देखना यह है कि बिहार के किसान और आम जनता इस फैसले पर किस तरह प्रतिक्रिया देते हैं और आने वाले दिनों में यह संघर्ष किस दिशा में जाता है.

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