सत्ता एकाधिकार के रूप में सिमटती चली गई :मनोहर लाल खट्टर
तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना,24 जून :बिहार विधानसभा के विस्तारित भवन स्थित सभागार में आज “आपातकाल: लोकतंत्र का काला अध्याय” विषय पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया. इस अवसर पर विभिन्न वक्ताओं ने आपातकाल के संदर्भ में अपने विचार साझा किए और इसे भारतीय लोकतंत्र पर एक गहरा आघात बताया.

कार्यक्रम में उपस्थित केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल खट्टर ने आपातकाल की पृष्ठभूमि और इसके प्रभावों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देश में सत्ता एकाधिकार के रूप में सिमटती चली गई. इसी के विरोध में जनसंघ की स्थापना की गई, जिसका मूल उद्देश्य एक सशक्त विपक्ष की नींव रखना था.
उन्होंने कहा कि 1967 के आम चुनावों ने यह साबित किया कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया के जरिए सत्ता परिवर्तन संभव है. हालांकि 1971 में कांग्रेस द्वारा ‘गरीबी हटाओ’ का नारा दिया गया, जो असल में एक तरह की प्रपंच राजनीति का हिस्सा था.इसके बाद देश में एक तानाशाही सोच हावी हुई और आपातकाल थोप दिया गया.

खट्टर ने कहा कि आपातकाल के दौरान विपक्ष को पूरी तरह से दबा दिया गया, मीडिया की स्वतंत्रता छीन ली गई और लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों का गला घोंट दिया गया.यह दौर भारतीय राजनीति में काले अध्याय के रूप में दर्ज है, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता.
संगोष्ठी में डॉ. दिलीप जायसवाल ने आपातकाल को बताया लोकतंत्र का काला दौर
भारतीय जनता पार्टी के बिहार प्रदेश अध्यक्ष डॉ. दिलीप जायसवाल ने एक संगोष्ठी के दौरान आपातकाल को भारतीय लोकतंत्र पर गहरे आघात के रूप में वर्णित किया. उन्होंने कहा कि यह कार्यक्रम युवाओं को इतिहास के उस भयावह दौर से अवगत कराने में सहायक सिद्ध हो रहा है, जब देश के संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों को कुचलने का प्रयास किया गया था.

डॉ. जायसवाल ने आपातकाल को कांग्रेस के शासन का एक काला अध्याय बताते हुए कहा कि उस समय लोकतंत्र की मूल आत्मा को कैद कर लिया गया था. उन्होंने कहा कि उस दौर की घटनाओं को सुनकर आज भी लोगों की रूह कांप जाती है, और इससे स्पष्ट होता है कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में सत्ता किस हद तक निरंकुश हो सकती है.
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उन्होंने आरोप लगाया कि आपातकाल के समय कांग्रेस ने अपने राजनीतिक स्वार्थों के लिए देश की संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर किया, प्रेस की स्वतंत्रता को बाधित किया, न्यायपालिका की उपेक्षा की और नागरिक अधिकारों को बर्बरतापूर्वक दबाया गया.
डॉ. जायसवाल ने कहा कि उस समय की सत्ता ने लोकतंत्र की जगह तानाशाही को स्थापित करने का प्रयास किया. उन्होंने यह भी जोड़ा कि आज की यह संगोष्ठी हमें उस समय की गंभीर परिस्थितियों पर विचार करने और लोकतंत्र की रक्षा के प्रति सजग रहने की प्रेरणा देती है.

राजनीतिक संगोष्ठी में दिखा सियासी एकजुटता का नज़ारा, उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी समेत कई दिग्गज हुए शामिल
संगोष्ठी में बिहार की सियासत का एकजुट चेहरा देखने को मिला, जब उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा ने कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई.इस दौरान बिहार विधानसभा अध्यक्ष नंद किशोर यादव की भी गरिमामयी उपस्थिति रही.
कार्यक्रम में कई सांसदों और विधायकों की मौजूदगी ने आयोजन को राजनीतिक रूप से और अधिक महत्वपूर्ण बना दिया.सांसद भीम सिंह, धर्मशीला गुप्ता, पूर्व सांसद रामकृपाल यादव और विधायक संजीव चौरसिया की भागीदारी उल्लेखनीय रही.

भाजपा के प्रदेश संगठन से भी कई वरिष्ठ नेता कार्यक्रम में शामिल हुए, जिनमें प्रदेश उपाध्यक्ष अमृता भूषण राठौर, संजय खंडेलिया, प्रदेश मंत्री धनराज शर्मा, त्रिविक्रम नारायण सिंह, सुधा सिंह प्रमुख हैं.
इस मौके पर पटना महानगर अध्यक्ष रूप नारायण मेहता और पटना ग्रामीण अध्यक्ष रजनीश कुमार के नेतृत्व में बड़ी संख्या में पार्टी कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों की उपस्थिति ने आयोजन को जीवंत बना दिया.
यह संगोष्ठी न केवल राजनीतिक संवाद का मंच बनी, बल्कि पार्टी के अंदरूनी एकजुटता और संगठनात्मक ताकत का भी प्रतीक रही.

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