देशभर में मचा हंगामा, मायावती ने जताई नाराज़गी
शिक्षा जगत में मचा हड़कंप, सवालों के घेरे में पारदर्शिता
तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना, 4 जुलाई : बिहार के प्रतिष्ठित पटना विश्वविद्यालय में प्राचार्यों की नियुक्ति के लिए ‘लॉटरी सिस्टम’ लागू करने पर देशभर में बहस तेज हो गई है. इस नई व्यवस्था के तहत पांच प्रमुख कॉलेजों में बिना विषय विशेषज्ञता देखे प्राचार्य बनाए गए हैं, जिससे शैक्षिक और राजनीतिक हलकों में चिंता बढ़ गई है.
बहुजन समाज पार्टी (बसपा) सुप्रीमो मायावती ने अपने आधिकारिक एक्स ट्विटर हैंडल पर इस प्रक्रिया की आलोचना करते हुए कहा कि”लॉटरी के माध्यम से की गई प्राचार्यों की नियुक्ति पारदर्शिता का नाम लेकर शिक्षा व्यवस्था के साथ मजाक है.”
पारदर्शिता या प्रयोगात्मक असफलता?
बिहार सरकार और राज्य के चांसलर द्वारा इसे “पारदर्शिता और निष्पक्षता” की दिशा में कदम बताया जा रहा है. लेकिन शिक्षाविदों और राजनीतिक दलों की राय इससे अलग है. बसपा प्रमुख मायावती के आधिकारिक एक्स अकाउंट से साझा एक बयान में इस निर्णय को “उच्च शिक्षा व्यवस्था को कमजोर करने वाला घातक प्रयोग” बताया गया है.
उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि यदि इसी प्रणाली को आगे चलकर मेडिकल कॉलेज, IITs, या अंतरिक्ष विज्ञान संस्थानों में लागू किया गया तो क्या यह देश की प्रतिभा और विशेषज्ञता को पीछे नहीं धकेल देगा?
कला शिक्षक बने साइंस कॉलेज के प्राचार्य
1863 में स्थापित पटना कॉलेज, जो केवल आर्ट्स विषयों के लिए जाना जाता है, वहाँ कैमिस्ट्री के प्रो. अनिल कुमार को प्राचार्य बना दिया गया. वहीं, गृह विज्ञान की विशेषज्ञ प्रो. अल्का यादव को पटना साइंस कॉलेज, जो विज्ञान की उच्च शिक्षा के लिए प्रसिद्ध है, का प्रिंसिपल नियुक्त किया गया है.
वाणिज्य कॉलेज में आर्ट्स की प्रोफेसर
इस अनोखी व्यवस्था के तहत कॉमर्स कॉलेज में भी पहली बार एक कला संकाय की महिला शिक्षक डा. सुहेली मेहता को प्राचार्य बना दिया गया, जबकि उनके विषय की पढ़ाई कॉलेज में होती ही नहीं है.
महिला कॉलेज को मिले पुरुष प्राचार्य
महिला शिक्षा के क्षेत्र में प्रसिद्ध मगध महिला कॉलेज को इस बार दूसरी बार एक पुरुष प्राचार्य मिला है.प्रो. एन. पी. वर्मा यहाँ नए प्राचार्य होंगे, जबकि प्रो. योगेन्द्र कुमार वर्मा को पटना लॉ कॉलेज का प्रमुख नियुक्त किया गया है.
क्या यह मॉडल दूसरे राज्यों में भी लागू होगा?
बहस अब इस बिंदु पर पहुँच गई है कि क्या यह विवादित मॉडल अन्य भाजपा-शासित राज्यों में भी अपनाया जाएगा.कई विशेषज्ञों का मानना है कि यदि विशेषज्ञता की अनदेखी कर इस तरह की नियुक्तियाँ होती रहीं तो यह भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था के लिए खतरे की घंटी साबित हो सकती है.
मायावती ने केंद्र सरकार से मांग की है कि वह इस “विकृत प्रयोग” का संज्ञान लेते हुए जल्द से जल्द उचित कार्रवाई करे, ताकि यह प्रणाली आगे चलकर मेडिकल, आईआईटी या अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थानों तक न पहुँच जाए.
निष्कर्ष
प्राचार्य जैसे निर्णायक पदों पर योग्यता के बजाय किस्मत के सहारे नियुक्ति की यह व्यवस्था न केवल छात्रों की शिक्षा गुणवत्ता पर प्रभाव डालेगी, बल्कि शिक्षकों और संस्थानों की साख पर भी सवाल खड़े करती है.
अब निगाहें केंद्र सरकार पर टिकी हैं, जो इस मुद्दे को राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत कैसे लेती है और क्या कोई दखल देती है.

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