खरगे के 1,000 करोड़ रुपये के दावे और सरकारी विज्ञापन खर्च के आंकड़ों की पड़ताल
तीसरा पक्ष ब्यूरो नई दिल्लीः कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने उत्तराखंड के हल्द्वानी में भारतीय जनता पार्टी की डबल इंजन सरकार पर सरकारी धन के इस्तेमाल को लेकर गंभीर सवाल उठाए है. खरगे ने आरोप लगाया कि उत्तराखंड सरकार हर साल करीब 1,000 करोड़ रुपये प्रचार-प्रसार पर खर्च कर रही है और जनता के टैक्स के पैसे का इस्तेमाल सरकार तथा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीरों को चमकाने के लिए किया जा रहा है.
खरगे का यह बयान राजनीतिक बहस का हिस्सा है, लेकिन उनके दावे को उपलब्ध सरकारी और स्वतंत्र रिपोर्टों में सामने आए आंकड़ों के साथ देखने पर तस्वीर कुछ अलग दिखाई देती है. उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक उत्तराखंड सरकार ने वित्तीय वर्ष 2020-21 से 2024-25 के बीच विज्ञापन और प्रचार पर करीब 1,001 करोड़ रुपये खर्च किए. यानी 1,000 करोड़ रुपये का आंकड़ा लगभग पांच वर्षों के कुल खर्च के बराबर बैठता है, न कि प्रत्येक वर्ष के खर्च के.
उत्तराखंड में पांच साल में कितना हुआ विज्ञापन खर्च?
उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार उत्तराखंड सरकार के विज्ञापन और प्रचार खर्च में पिछले कुछ वर्षों के दौरान उल्लेखनीय वृद्धि हुई है. वित्तीय वर्ष 2020-21 में यह खर्च करीब 77 करोड़ रुपये बताया गया, जबकि इसके बाद इसमें तेजी देखी गई.
वर्ष 2021-22 में यह राशि बढ़कर लगभग 227 करोड़ रुपये हो गई. इसके बाद भी विज्ञापन और प्रचार पर सरकारी खर्च जारी रहा और 2024-25 में यह करीब 290 करोड़ रुपये तक पहुंच गया.
इस तरह पांच वित्तीय वर्षों में कुल खर्च लगभग 1,001 करोड़ रुपये बताया गया है.
आंकड़ों को रोजाना औसत में देखें तो यह खर्च करीब 55 लाख रुपये प्रतिदिन बैठता है. हालांकि अलग-अलग वित्तीय वर्षों में खर्च समान नहीं रहा और इसलिए दैनिक औसत को केवल एक व्यापक औसत के रूप में देखना चाहिए.
धामी सरकार के कार्यकाल में कितना खर्च हुआ?
उपलब्ध रिपोर्टिंग के मुताबिक 2020-21 में उत्तराखंड में त्रिवेंद्र सिंह रावत मुख्यमंत्री थे. जुलाई 2021 में पुष्कर सिंह धामी के मुख्यमंत्री बनने के बाद विज्ञापन और प्रचार पर खर्च में काफी वृद्धि हुई.
रिपोर्टों में 2021-22 से 2024-25 तक धामी सरकार के कार्यकाल के दौरान विज्ञापन और प्रचार पर करीब 923 करोड़ रुपये खर्च होने की बात सामने आई है.
यही आंकड़ा विपक्ष के राजनीतिक हमले का एक प्रमुख आधार बनता है. हालांकि किसी सरकार के कार्यकाल में अधिक विज्ञापन खर्च होना अपने आप में यह साबित नहीं करता है कि पूरा खर्च केवल मुख्यमंत्री या किसी राजनीतिक नेता की व्यक्तिगत छवि चमकाने के लिए किया गया.
इसके लिए विज्ञापनों की प्रकृति, उद्देश्य, माध्यम, सामग्री और भुगतान का विस्तृत विश्लेषण जरूरी है.
1,000 करोड़ रुपये हर साल या पांच साल में?
यह इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण तथ्यात्मक पहलू है।
खरगे के बयान में करीब 1,000 करोड़ रुपये सालाना खर्च का दावा सामने आता है. दूसरी ओर उपलब्ध रिपोर्टों में 2020-21 से 2024-25 के बीच करीब 1,001 करोड़ रुपये के कुल खर्च का उल्लेख है.
इसका अर्थ है कि दोनों आंकड़ों में बड़ा अंतर है.
यदि पांच साल के कुल खर्च को आधार माना जाए तो उत्तराखंड में औसतन करीब 200 करोड़ रुपये सालाना खर्च हुआ. 2024-25 में खर्च लगभग 290 करोड़ रुपये रहा, जो पांच साल के औसत से अधिक है.
इसलिए उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर यह कहना अधिक सटीक होगा कि उत्तराखंड सरकार ने पांच वर्षों में करीब 1,000 करोड़ रुपये विज्ञापन और प्रचार पर खर्च किए, जबकि इसे हर साल 1,000 करोड़ रुपये खर्च के रूप में प्रस्तुत करना उपलब्ध आंकड़ों से मेल नहीं खाता.
पैसा किन माध्यमों पर खर्च हुआ?
सरकारी प्रचार केवल अखबारों तक सीमित नहीं रहता. उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार उत्तराखंड में विज्ञापन खर्च का एक बड़ा हिस्सा टेलीविजन, प्रिंट मीडिया, डिजिटल प्लेटफॉर्म, आउटडोर होर्डिंग, रेडियो और एसएमएस जैसे माध्यमों पर गया.
टेलीविजन विज्ञापनों पर खर्च विशेष रूप से बड़ा बताया गया है, जबकि प्रिंट और डिजिटल मीडिया भी सरकारी प्रचार अभियान का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं.
सरकार की ओर से ऐसे खर्चों को आम तौर पर योजनाओं और सरकारी उपलब्धियों की जानकारी जनता तक पहुंचाने का माध्यम बताया जाता है.पर्यटन, निवेश, सरकारी योजनाएं, बड़े आयोजन और राज्य की उपलब्धियां भी प्रचार अभियानों में शामिल रहती हैं.
सरकार का तर्क क्या है?
सरकारी विज्ञापन खर्च पर उठ रहे सवालों के बीच सरकार का तर्क है कि सूचना एवं जनसंपर्क पर होने वाला खर्च राज्य के कुल बजट की तुलना में बहुत छोटा हिस्सा है.
सरकार का कहना है कि विज्ञापन का उद्देश्य केवल राजनीतिक प्रचार नहीं बल्कि नागरिकों को सरकारी योजनाओं और सेवाओं की जानकारी देना भी है. उत्तराखंड जैसे पर्यटन-प्रधान राज्य के लिए पर्यटन को बढ़ावा देना और निवेश आकर्षित करना भी सरकारी संचार नीति का हिस्सा हो सकता है।
इसके अलावा चारधाम यात्रा, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के आयोजन, निवेश सम्मेलन तथा अन्य बड़े कार्यक्रमों के दौरान प्रचार को सरकार अपनी व्यापक सूचना रणनीति का हिस्सा बताती है.
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विपक्ष क्यों उठा रहा है सवाल?
विपक्ष का सवाल खर्च की केवल कुल राशि पर नहीं बल्कि सरकारी विज्ञापनों की प्रकृति और प्राथमिकता पर भी है.
आलोचकों का तर्क है कि जब किसी विज्ञापन में सरकारी योजना की जानकारी देने के बजाय मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री की तस्वीर और राजनीतिक संदेश प्रमुख हो जाएं, तो सरकारी विज्ञापन और राजनीतिक ब्रांडिंग के बीच अंतर धुंधला हो सकता है.
विपक्ष यह भी सवाल उठाता रहा है कि स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, आपदा प्रबंधन और बुनियादी सुविधाओं जैसी जरूरतों वाले राज्य में सरकारी धन का कितना हिस्सा प्रचार पर खर्च किया जाना चाहिए.
हालांकि इन सवालों का जवाब केवल कुल खर्च देखकर नहीं दिया जा सकता। इसके लिए यह देखना जरूरी है कि विज्ञापनों से क्या जानकारी दी गई, किस उद्देश्य से अभियान चलाया गया और उसके परिणाम क्या रहे.
दूसरे राज्यों और केंद्र से तुलना क्यों जरूरी है?
सरकारी विज्ञापन खर्च केवल उत्तराखंड तक सीमित मुद्दा नहीं है.केंद्र और कई बड़े राज्यों में भी सरकारी योजनाओं तथा कार्यक्रमों के प्रचार पर बड़ी रकम खर्च होती रही है.
केंद्र सरकार के विज्ञापन खर्च को लेकर भी समय-समय पर आरटीआई और संसदीय जवाबों के आधार पर आंकड़े सार्वजनिक हुए हैं. इसी तरह उत्तर प्रदेश में भी पिछले वर्षों के दौरान विज्ञापन और प्रचार पर हजारों करोड़ रुपये खर्च होने की रिपोर्टें सामने आई हैं.
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है—सरकारी विज्ञापन खर्च और राजनीतिक दल का चुनावी प्रचार खर्च एक ही चीज नहीं हैं.
सरकार का विज्ञापन खर्च सरकारी बजट से होता है, जबकि किसी राजनीतिक दल का चुनावी या संगठनात्मक प्रचार पार्टी फंड से होता है. दोनों को एक साथ रखकर तुलना करने से वास्तविक तस्वीर भ्रमित हो सकती है.
सरकारी विज्ञापन पर असली बहस क्या होनी चाहिए?
लोकतंत्र में सरकारों को अपनी योजनाओं और नीतियों की जानकारी जनता तक पहुंचाने का अधिकार और जिम्मेदारी दोनों हैं. नागरिकों को यह जानना जरूरी है कि उन्हें कौन-सी सरकारी सुविधा मिल सकती है, आवेदन कैसे करना है और किसी योजना का लाभ किसे मिलेगा.
समस्या तब पैदा होती है जब सरकारी सूचना और राजनीतिक प्रचार के बीच स्पष्ट सीमा दिखाई न दे.
इसलिए सरकारी विज्ञापन खर्च की समीक्षा करते समय केवल यह सवाल पर्याप्त नहीं है कि कितना पैसा खर्च हुआ?
इसके साथ यह भी पूछा जाना चाहिए,
पैसा किस अभियान पर खर्च हुआ?
विज्ञापन का उद्देश्य क्या था?
किस मीडिया संस्थान या माध्यम को कितना भुगतान हुआ?
क्या सरकारी योजनाओं की वास्तविक जानकारी दी गई?
विज्ञापन का नागरिकों पर क्या प्रभाव पड़ा?
क्या खर्च के लिए पारदर्शी नियमों का पालन हुआ?
इन सवालों के जवाब सरकारी बजट, सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के रिकॉर्ड, आरटीआई और अन्य सार्वजनिक दस्तावेजों से निकाले जा सकते हैं.
जनता के टैक्स के पैसे पर जवाबदेही जरूरी
सरकारी विज्ञापन अंततः सार्वजनिक धन से ही संचालित होते हैं. इसलिए चाहे सरकार किसी भी राजनीतिक दल की हो, विज्ञापन खर्च में पारदर्शिता और जवाबदेही लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है.
उत्तराखंड के मामले में उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि 2020-21 से 2024-25 के बीच विज्ञापन और प्रचार पर करीब 1,001 करोड़ रुपये खर्च हुए और धामी सरकार के कार्यकाल में इसका बड़ा हिस्सा खर्च हुआ.
लेकिन खर्गे द्वारा कही गई हर साल 1,000 करोड़ रुपये खर्च वाली बात उपलब्ध पांच-वर्षीय आंकड़ों से मेल नहीं खाती. इसलिए इस राजनीतिक दावे को उसी संदर्भ में देखना जरूरी है.
आखिरकार बहस केवल भाजपा या कांग्रेस की नहीं होनी चाहिए. सवाल यह होना चाहिए कि सरकारी विज्ञापन जनता को सूचना देने का प्रभावी माध्यम हैं या राजनीतिक छवि निर्माण का साधन?
इसका जवाब आंकड़ों, विज्ञापनों की सामग्री और खर्च की पारदर्शिता की स्वतंत्र जांच से ही मिल सकता है. यही दृष्टिकोण सरकारी धन के इस्तेमाल पर होने वाली राजनीतिक बहस को आरोप-प्रत्यारोप से निकालकर तथ्य और जवाबदेही के स्तर तक ले जा सकता है.
स्रोत: विभिन्न समाचार वेबसाइटों, पत्रिकाओं, सार्वजनिक दस्तावेजों एवं उपलब्ध रिपोर्टों में प्रकाशित तथ्यों के आधार पर। लेख में कांग्रेस अध्यक्ष श्री मल्लिकार्जुन खर्गे के बयान को भी शामिल किया गया है

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