गांधी जयंती पर दीपंकर का SIR और चुनाव आयोग पर बड़ा हमला

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Ajit Kumar

बिहार
गांधी मैदान में लोकतंत्र बचाओ मार्च के दौरान दीपंकर भट्टाचार्य

पटना में लोकतंत्र बचाओ मार्च के दौरान मतदाता सूची, SIR और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए

तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना: गांधी जयंती के मौके पर पटना में आयोजित लोकतंत्र बचाओ मार्च के दौरान भाकपा माले महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR, चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर कई गंभीर सवाल उठाए. उन्होंने आरोप लगाया कि देश में नागरिकों के मताधिकार पर हमला हो रहा है और बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम सूची से हटाए जाने को लेकर पारदर्शिता जरूरी है.

2 अक्टूबर 2026 को जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, दीपंकर भट्टाचार्य ने पटना के गांधी मैदान स्थित गांधी मूर्ति पर महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि अर्पित करने के बाद इंडिया गठबंधन के आह्वान पर आयोजित लोकतंत्र बचाओ मार्च को संबोधित किया. कार्यक्रम में भाकपा माले के राज्य सचिव कुणाल, पोलित ब्यूरो सदस्य मीना तिवारी, विधान परिषद सदस्य शशि यादव सहित गठबंधन से जुड़े विभिन्न दलों के नेता और कार्यकर्ता मौजूद रहे.

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SIR को लेकर क्या बोले दीपंकर भट्टाचार्य?

दीपंकर भट्टाचार्य ने अपने संबोधन में SIR को केवल मतदाता सूची के प्रशासनिक पुनरीक्षण का विषय मानने के बजाय इसे नागरिकों के मताधिकार से जोड़कर देखने की बात कही. उनका दावा था कि बड़ी संख्या में लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं और ऐसे लोगों के नाम वापस जोड़े जाने चाहिए, जो पात्र मतदाता हैं.

SIR यानी Special Intensive Revision को लेकर पिछले कुछ समय से राजनीतिक दलों के बीच तीखी बहस चल रही है. इस बहस का केंद्र यह सवाल है कि मतदाता सूची को संशोधित करते समय वास्तविक मतदाताओं के अधिकारों की पर्याप्त सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाए.

हालिया रिपोर्टों में भी चुनाव आयोग के भीतर SIR से जुड़े कुछ निर्णयों और प्रक्रियाओं को लेकर मतभेद सामने आने की बात कही गई है. द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 मौकों पर कुछ फैसलों को लेकर लिखित आपत्तियां दर्ज की थीं. रिपोर्ट में Form 6, मतदाता नाम जोड़ने-हटाने और SIR से जुड़े कुछ निर्णयों का उल्लेख किया गया है.

हालांकि, चुनाव आयोग ने इन मतभेदों की अलग व्याख्या करते हुए कहा है कि अलग-अलग राय निर्णय लेने की प्रक्रिया का हिस्सा हो सकती है और आयोग के अनुसार पिछले एक साल के निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए.

यही वजह है कि SIR को लेकर विवाद केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं है, बल्कि चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया और मतदाता सूची की विश्वसनीयता से जुड़े सवालों तक पहुंच गया है.

ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग

दीपंकर भट्टाचार्य ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग भी दोहराई. प्रेस विज्ञप्ति के मुताबिक उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग को पूरी तरह स्वतंत्र और जवाबदेह बनाया जाना चाहिए तथा चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया में बदलाव किया जाना चाहिए.

यह मांग ऐसे समय सामने आई है जब चुनाव आयोग के कामकाज और SIR को लेकर विपक्षी दलों की ओर से लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं. 2 अक्टूबर को दिल्ली के जंतर-मंतर और देश के अन्य हिस्सों में भी चुनाव आयोग तथा मुख्य चुनाव आयुक्त को लेकर विरोध प्रदर्शन हुए.द इंडियन एक्सप्रेस ने दिल्ली में प्रदर्शन और हिरासत में लिए गए नेताओं से संबंधित घटनाक्रम की रिपोर्ट की है.

दीपंकर ने विशेष रूप से उन नागरिकों के नाम मतदाता सूची में वापस जोड़ने की मांग की, जिनके नाम हटाए गए हैं. इसके साथ उन्होंने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति व्यवस्था को अधिक पारदर्शी बनाने की आवश्यकता बताई.

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2023 के कानून पर भी सवाल

अपने संबोधन में दीपंकर भट्टाचार्य ने 2023 में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से संबंधित कानून में किए गए बदलाव का भी उल्लेख किया. Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners (Appointment, Conditions of Service and Term of Office) Act, 2023 संसद द्वारा पारित कानून है, जो मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति, सेवा शर्तों और कार्यकाल से संबंधित व्यवस्था निर्धारित करता है.

कानून में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए Selection Committee की व्यवस्था की गई है. इसी कानून में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों के लिए Protection से संबंधित प्रावधान भी मौजूद है.

विपक्षी दलों की आपत्ति यह है कि नियुक्ति व्यवस्था में सरकार की भूमिका बढ़ने से चुनाव आयोग की संस्थागत स्वतंत्रता को लेकर सवाल पैदा हो सकते हैं.दूसरी ओर, कानून स्वयं संसद द्वारा बनाया गया वैधानिक ढांचा है और इसके प्रावधानों को लेकर संवैधानिक तथा कानूनी बहस अलग विषय है. इसलिए इस मुद्दे पर राजनीतिक दावों और कानून में वास्तविक रूप से मौजूद प्रावधानों के बीच अंतर करना महत्वपूर्ण है.

2020 बिहार और 2024 लोकसभा चुनाव को SIR से जोड़ने का दावा

दीपंकर भट्टाचार्य ने SIR की राजनीतिक पृष्ठभूमि पर भी सवाल उठाते हुए 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव का संदर्भ दिया. उनका दावा है कि इन चुनावों के बाद मतदाता सूची और वोट के अधिकार को लेकर विवादों का नया दौर शुरू हुआ.

यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद SIR शुरू होने के बीच राजनीतिक संबंध होने का दावा दीपंकर भट्टाचार्य का राजनीतिक विश्लेषण है, जिसे स्वतंत्र रूप से स्थापित तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता.

SIR की मौजूदा प्रक्रिया का विस्तार और उसका राजनीतिक प्रभाव अलग-अलग स्तर पर चर्चा का विषय रहा है. द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक बिहार में SIR की प्रक्रिया जून 2025 में शुरू हुई थी और बाद में इसे अन्य राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों तक विस्तारित किया गया.

इसी मुद्दे पर चुनाव आयोग की ओर से भी मतदाता सूची में छूटे नामों को लेकर सुधारात्मक कदमों की जानकारी दी गई है. हालिया रिपोर्ट के अनुसार, आयोग ने 20 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में ऐसे मतदाताओं के नाम जोड़ने के लिए विशेष अभियान की बात कही है, जिनके नाम प्रक्रिया के दौरान छूट गए हों. इसके लिए Form 6 समेत निर्धारित प्रक्रियाओं का इस्तेमाल किया जाना है.

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जंतर-मंतर की घटना ने बढ़ाई बहस

दीपंकर भट्टाचार्य ने अपने भाषण में दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों की हिरासत का मुद्दा भी उठाया. उन्होंने कहा कि जब जंतर-मंतर को प्रदर्शन के लिए निर्धारित स्थान के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, तब शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वालों को रोकना नागरिक अधिकारों से जुड़ा गंभीर प्रश्न है.

2 अक्टूबर को दिल्ली में चुनाव आयोग के खिलाफ प्रदर्शन को लेकर पुलिस की तैनाती और प्रदर्शनकारियों की हिरासत की रिपोर्टें सामने आईं. इन घटनाओं के राजनीतिक और कानूनी पहलुओं पर अलग-अलग पक्षों के अलग-अलग मत हैं.

असली सवाल मतदाता के अधिकार का

SIR विवाद के केंद्र में अंततः एक बुनियादी सवाल है—क्या पात्र नागरिक का नाम मतदाता सूची में सुरक्षित तरीके से बना रहना सुनिश्चित किया जा रहा है और यदि किसी वास्तविक मतदाता का नाम छूट जाता है तो उसे वापस जोड़ने की प्रक्रिया कितनी आसान, पारदर्शी और समयबद्ध है?

चुनाव आयोग के लिए मतदाता सूची को अद्यतन रखना जरूरी है, क्योंकि इसमें मृत व्यक्तियों, डुप्लीकेट प्रविष्टियों, स्थान बदल चुके मतदाताओं और नए पात्र मतदाताओं से जुड़े बदलाव होते रहते हैं.लेकिन इसी प्रक्रिया के साथ यह भी महत्वपूर्ण है कि पात्र मतदाता का नाम गलती से हटने पर उसे सुधार का प्रभावी अवसर मिले.

यही कारण है कि SIR से जुड़ी बहस को केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित रखने के बजाय मतदाता सूची के आंकड़ों, नाम हटाने के कारणों, दावों-आपत्तियों की संख्या और बहाली की प्रक्रिया के आधार पर देखना अधिक उपयोगी होगा.

आगे की लड़ाई का ऐलान

दीपंकर भट्टाचार्य ने गांधी जयंती के मौके पर कहा कि मताधिकार और लोकतंत्र की रक्षा की लड़ाई आगे भी जारी रहेगी. उन्होंने मतदाता सूची में नामों की बहाली, मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया में बदलाव की मांग दोहराई.

इस पूरे विवाद में एक तरफ विपक्षी दल चुनाव आयोग की पारदर्शिता और स्वतंत्रता पर सवाल उठा रहे हैं, जबकि दूसरी तरफ चुनाव आयोग अपने निर्णयों और प्रक्रियाओं को संस्थागत व्यवस्था के तहत सही ठहरा रहा है. हालिया रिपोर्टों में आयोग की ओर से SIR से जुड़े सुधारात्मक फैसलों और छूटे मतदाताओं के नाम जोड़ने के प्रयासों का भी उल्लेख है.

इसलिए आने वाले समय में सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि मतदाता सूची में वास्तविक बदलाव कितने हुए, कितने नाम वापस जोड़े गए, कितनी आपत्तियां स्वीकार की गईं और चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया को लेकर उठे सवालों का संस्थागत और न्यायिक स्तर पर क्या जवाब सामने आता है.

स्रोत: 2 अक्टूबर 2026 की भाकपा माले की प्रेस विज्ञप्ति; संबंधित सार्वजनिक रिपोर्टों और आधिकारिक कानून दस्तावेजों के आधार पर संदर्भित तथ्य.

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